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आस्था का केंद्र है धर्मापुर का ऐतिहासिक शिवमंदिर
Updated Tue, 14 Aug 2018 12:36 AM IST
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धर्मापुर। जौनपुर के प्राचीन मंदिरों की फेहरिस्त में प्रमुख स्थान रखने वाला भव्य धर्मापुर के ऐतिहासिक शिव मंदिर पर पुरातत्व विभाग की कब नजर-ए-इनायत होगी। जौनपुर-गाजीपुर मार्ग पर जनपद मुख्यालय से सात किलोमीटर पूरब सड़क के दक्षिण तरफ धर्मापुर बाजार स्थित शिव मंदिर अपनी सुंदरता, भव्यता के चलते तो ध्यान खींचता ही है, इस मंदिर में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था भी है। इसे अर्से से पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कोही रही है।
जौनपुर नरेश दिवंगत राजा कृष्णदत्त दुबे ने असीम श्रद्धा से 1943 में धर्मापुर में शिवालय का निर्माण कराया था। शिव मंदिर का निर्माण ग्रामीणों ने श्रमदान से किया था। मंदिर को सुंदर व भव्य ढंग से बनवाने हेतु राजा कृष्णदत्त ने लखनऊ से वास्तुविद को बुलवाया था। एक वर्ष लगातार निर्माण कार्य चलता रहा, जिसमें 70 मजदूरों ने श्रद्धाभाव से जुटे रहे। राजा जौनपुर मंदिर निर्माण कार्य प्रगति देखने प्रतिदिन आते थे। दो बीघे क्षेत्रफल में बने शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बनारस से लाया गया था। शिवलिंग के ऊपर खूबसूरत चांदी का सर्प लिपटा था, जिसको चोरों ने वर्ष 1970 में चुरा लिया। मंदिर के चारों तरफ जल आच्छादित पक्का सरोवर, मंदिर में जाने हेतु छोटा सा सुंदर पुल, पुल के समाप्ति व मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने पूजा-अर्चना की मुद्रा वाली दो महिलाओं की सुंदर मूर्तियां व प्रवेश द्वार के ठीक सामने संगमरमर के नंदी बैल की आकृति बिठाई गई है। मंदिर की दीवारों एवं जानवरों की आकृतियों को उकेरा गया है। इस मंदिर के पुजारी रामदुलार यादव इसकी देखरेख करते हैं। जौनपुर ही नहीं आस-पास के जनपदों में इतना सुंदर मंदिर नहीं है।
जौनपुर नरेश दिवंगत राजा कृष्णदत्त दुबे ने असीम श्रद्धा से 1943 में धर्मापुर में शिवालय का निर्माण कराया था। शिव मंदिर का निर्माण ग्रामीणों ने श्रमदान से किया था। मंदिर को सुंदर व भव्य ढंग से बनवाने हेतु राजा कृष्णदत्त ने लखनऊ से वास्तुविद को बुलवाया था। एक वर्ष लगातार निर्माण कार्य चलता रहा, जिसमें 70 मजदूरों ने श्रद्धाभाव से जुटे रहे। राजा जौनपुर मंदिर निर्माण कार्य प्रगति देखने प्रतिदिन आते थे। दो बीघे क्षेत्रफल में बने शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बनारस से लाया गया था। शिवलिंग के ऊपर खूबसूरत चांदी का सर्प लिपटा था, जिसको चोरों ने वर्ष 1970 में चुरा लिया। मंदिर के चारों तरफ जल आच्छादित पक्का सरोवर, मंदिर में जाने हेतु छोटा सा सुंदर पुल, पुल के समाप्ति व मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने पूजा-अर्चना की मुद्रा वाली दो महिलाओं की सुंदर मूर्तियां व प्रवेश द्वार के ठीक सामने संगमरमर के नंदी बैल की आकृति बिठाई गई है। मंदिर की दीवारों एवं जानवरों की आकृतियों को उकेरा गया है। इस मंदिर के पुजारी रामदुलार यादव इसकी देखरेख करते हैं। जौनपुर ही नहीं आस-पास के जनपदों में इतना सुंदर मंदिर नहीं है।
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