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सीबीएसई की छूट अभिभावकों से लूट

Tue, 03 Apr 2018 12:31 AM IST
Updated Tue, 03 Apr 2018 12:31 AM IST
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सीबीएसई की छूट अभिभावकों से लूट

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जौनपुर। आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बोर्ड परीक्षा देने वालों से ज्यादा किताबें पढ़नी पड़ती हैं। चौंकिए नहीं, अपर केजी के बच्चे की किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों को उससे अधिक पैसे देने पड़ रहे है, जितना दसवीं के छात्र के लिए। निजी विद्यालयों में बस्ते के इस अतार्किक बोझ को कम करने की चिंता प्रशासन को भी नहीं हैं।
स्कूलों में नया सत्र शुरू हो गया है। अभिभावक अच्छे से अच्छे स्कूल में बच्चों का प्रवेश कराने में जुटे हैं। टेस्ट देने और जुगाड़ लगाने के बाद मनचाहे स्कूल में प्रवेश होने के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिल रही है। प्रवेश के समय तीन महीने का एडवांस, टर्म फीस, विकास, बिजली, खेल, आईकार्ड, रिपोर्ट कार्ड जैसे तमाम तरह के शुल्क वसूले जा रहे हैं। मगर सिलसिला यही नहीं रुकता है। यूनिफार्म, टाई-बेल्ट, बैज, जूता हर चीज पर विद्यालय कमीशन ले रहे हैं और अभिभावक ये वस्तुएं खास दुकानों से ही खरीदने के लिए बाध्य हैं। शिक्षा के निजीकरण की पैरोकार विद्यालयों ने किताब तक के मामले में प्रतिस्पर्धा नहीं छोड़ी है। कमीशन के चक्कर में मनमाने तरीके से किताबें तय की गई हैं। पाठ्यक्रम की कोई सुविचारित नीति नहीं है। अपर केजी के बच्चों की किताबें दो से ढाई हजार रुपये में आ रही हैं जबकि दसवीं के बोर्ड के छात्र की किताबें 2200 रुपये में मिल रही हैं।
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सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड में दसवीं का पाठ्यक्रम निर्धारित है। ऐसे में विद्यालयों को मनमाने तरीके से किताबें खरीदवाने की छूट नहीं है। इससे नीचे की कक्षाओं में मनमाने तरीके से पुस्तकें खरीदवाई जा रही हैं। कक्षा पांच से आठ तक के छात्रों के तकरीबन पांच हजार रुपये मूल्य की किताबें खरीदनी पड़ रही हैं और कक्षा नौ में चार हजार रुपये की। विद्यालयों ने अपने लाभ के चक्कर में बस्ते का बोझ अतार्किक तरीके से बढ़ाया है और इस पर शिक्षा विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।
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केजी- 2034
यूकेजी---2034
कक्षा एक-2899
कक्षा दो--3036
कक्षा तीन- 3636
कक्षा चार--3779
कक्षा पांच--4105
कक्षा छह--4550
कक्षा सात- 5066
कक्षा आठ-5313
कक्षा नौ---4352
कक्षा दस--2175


मनमानी से त्रस्त पर बोलते नहीं कुछ
जौनपुर। अभिभावक स्कूलों की मनमानी से त्रस्त हैं मगर असंगठित होने के कारण वे उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। शिक्षा विभाग के अफसर भी इस मुद्दे पर चुप्पी ही साधे रहते हैं। रुपेश जायसवाल का कहना है कि स्कूल प्रबंधन तरह-तरह के शुल्क वसूल रहे हैं। इसके अलावा कापी-किताब और यूनिफार्म में भी मनमानी लूट हो रही है। पर बच्चों को पड़ाना है तो सब सहना पड़ता है। आकांक्षा द्विवेदी का कहना है कि निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना सबके बस की बात नहीं रह गई है। सरकार को कानवेंट स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाया जाए को अभिभावकों को राहत मिलेगी। प्रीति का हना है कि सरकार को चाहिए कि एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू करे। महंगी किताबों और ट्यूशन फीस पर अंकुश जरूरी है।
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