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प्रभु को वन जाते देख दर्शकों की आखें हुई नम
Updated Thu, 09 Nov 2017 12:22 AM IST
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गोमती नदी के तटवर्ती गांव शाहपुर सानी में मंगलवार की रात चौबाहे बाबा राम लीला समिति द्वारा गोमती नदी तट पर वास्तविक नाव और नदी की धारा के बीच राम वन गमन का सजीव दृश्य देख दर्शकों की आंखें नम हो गई। इस मनोहारी जीवंत दृश्य में श्रीराम और केवट के संवाद को लोगों ने खूब सराहा।
रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर बचन न जाई। कैकेई के द्वारा अपने दो वरदान राजा दशरथ से मांगते ही पूरी अयोध्या में उदासी छा गई। पिता की आज्ञा के पालन में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम, लक्ष्मण और जानकी तीनों अयोध्या से वन जाने के लिए इधर प्रस्थान करते हैं। उधर पुत्र के वियोग में महाराजा दशरथ अपने प्राण छोड़ देते हैं। जिसे देख दर्शक मर्माहत हो गए। मंच से लगभग तीन सौ मीटर दूर नदी तट पर एक अलग से मंच बनाया गया था। नदी में इस पार से उस पार तक लगाए गए विद्युत झालरों से घाट जगमगा रहा था। यहां पानी में अपनी नाव के साथ केवट पहले से मौजूद था। घाट पर स्वयं भगवान को देख वह पुलकित होकर चरण पकड़ लेता है। भगवान उसे गले लगाकर पार उतारने का निवेदन करते हैं। भक्ति रस से सराबोर केवट चरण पखारने के बाद पार ले जाने की जिद करता है। भक्त वत्सल भगवान उसकी अभिलाषा पूर्ण कर नाव में बैठ जाते हैं। जब नाव से उतराई में देवी सीता उसे अपनी अंगूठी देने लगती हैं तो वह कहता है कि जब आप चौदह वर्ष बाद पुन: वापस इसी रास्ते से आएगी तब उताराई दीजिएगा। भगवान उसकी भक्तिमय चातुर्ता पर मुस्करा कर रह जाते हैं। वास्तविक रूप से नदी में नाव पर बैठ कर भगवान के वन गमन के दृश्य को दर्शकों ने खूब सराहा। राम लीला का उद्घाटन अवकाश प्राप्त शिक्षक राम आनंद पाण्डेय ने किया। इस मौके पर भाजपा नेता अवधेश यादव, लालमनि प्रजापति, सुरेन्द्र यादव, कैलाश नाथ पाण्डेय, गिरजाशंकर यादव, राजकुमार यादव, नंदकुमार यादव, किशन गुप्ता आदि मौजूद रहे। संचालन आयोजक जितेंद्र यादव ने किया।
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रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर बचन न जाई। कैकेई के द्वारा अपने दो वरदान राजा दशरथ से मांगते ही पूरी अयोध्या में उदासी छा गई। पिता की आज्ञा के पालन में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम, लक्ष्मण और जानकी तीनों अयोध्या से वन जाने के लिए इधर प्रस्थान करते हैं। उधर पुत्र के वियोग में महाराजा दशरथ अपने प्राण छोड़ देते हैं। जिसे देख दर्शक मर्माहत हो गए। मंच से लगभग तीन सौ मीटर दूर नदी तट पर एक अलग से मंच बनाया गया था। नदी में इस पार से उस पार तक लगाए गए विद्युत झालरों से घाट जगमगा रहा था। यहां पानी में अपनी नाव के साथ केवट पहले से मौजूद था। घाट पर स्वयं भगवान को देख वह पुलकित होकर चरण पकड़ लेता है। भगवान उसे गले लगाकर पार उतारने का निवेदन करते हैं। भक्ति रस से सराबोर केवट चरण पखारने के बाद पार ले जाने की जिद करता है। भक्त वत्सल भगवान उसकी अभिलाषा पूर्ण कर नाव में बैठ जाते हैं। जब नाव से उतराई में देवी सीता उसे अपनी अंगूठी देने लगती हैं तो वह कहता है कि जब आप चौदह वर्ष बाद पुन: वापस इसी रास्ते से आएगी तब उताराई दीजिएगा। भगवान उसकी भक्तिमय चातुर्ता पर मुस्करा कर रह जाते हैं। वास्तविक रूप से नदी में नाव पर बैठ कर भगवान के वन गमन के दृश्य को दर्शकों ने खूब सराहा। राम लीला का उद्घाटन अवकाश प्राप्त शिक्षक राम आनंद पाण्डेय ने किया। इस मौके पर भाजपा नेता अवधेश यादव, लालमनि प्रजापति, सुरेन्द्र यादव, कैलाश नाथ पाण्डेय, गिरजाशंकर यादव, राजकुमार यादव, नंदकुमार यादव, किशन गुप्ता आदि मौजूद रहे। संचालन आयोजक जितेंद्र यादव ने किया।
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