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जालौन: तीन साल बाद लगेगा श्री अक्षरादेवी सिद्धपीठ में पांरपरिक मेला, आदिशक्ति यंत्र स्वरूप में विराजमान है देवी
Fri, 08 Apr 2022 08:51 PM IST
Vikas Kumar
अमर उजाला नेटवर्क, जालौन
अमर उजाला नेटवर्क, जालौन
Published by: Vikas Kumar
Updated Fri, 08 Apr 2022 08:51 PM IST
सार
मां राजराजेश्वरी श्री अक्षरा देवी तीर्थ न्यास के अध्यक्ष ने बताया कि कोरोना के कारण 2020 में 25 मार्च को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से देशव्यापी लॉकडाउन लग जाने के कारण चैत्र नवरात्र और एकादशी के मेले का आयोजन 2019 के बाद अब 2022 में हो रहा है। मंगलवार 12 अप्रैल को एकादशी के दिन बैरागढ़ में मां शारदा देवी मंदिर से आकर यहां श्री अक्षरा धाम में मेला लगेगा।
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मां राजराजेश्वरी श्री अक्षरा देवी सिद्धपीठ
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में बेतवा नदी के किनारे मां राजराजेश्वरी श्री अक्षरा देवी सिद्धपीठ में कोरोना महामारी के बाद पूरे तीन साल के अंतर पर इस बार नवरात्र के पश्चात चैत्र शुक्ल एकादशी यानी 12 अप्रैल से पांरपरिक मेला लगेगा।
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श्री अक्षरादेवी सिद्धपीठ उन विरले शक्तिपीठों में से एक है जहां देवी आदिशक्ति यंत्र स्वरूप में विराजमान हैं। झांसी-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एट कस्बे से पूर्व दिशा में लगभग 12 किलोमीटर दूर एक लिंक रोड से जुड़े ग्राम सिद्धनगर के निकट एक सुरम्य सरोवर के तट पर स्थित एक हजार वर्ष से अधिक पुराने इस देवपूजित शक्तिपीठ को लिपि का उद्भवस्थल माना जाता है।
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मां राजराजेश्वरी श्री अक्षरा देवी तीर्थ न्यास के अध्यक्ष पंडित शंभुदयाल बुधौलिया ने बताया कि कोरोना महामारी के कारण वर्ष 2020 में 25 मार्च को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से देशव्यापी लॉकडाउन लग जाने के कारण चैत्र नवरात्र और एकादशी के मेले का आयोजन 2019 के बाद अब 2022 में हो रहा है। मंगलवार 12 अप्रैल को एकादशी के दिन बैरागढ़ में मां शारदा देवी मंदिर से आकर यहां श्री अक्षरा धाम में मेला लगेगा और उसके बाद मेला उठकर एरच के पास डिकौली में मां छिन्नमस्तिका देवी के मंदिर परिसर में लगेगा।
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पंडित बुधौलिया ने कहा कि कोरोना कॉल में मां के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या कम हो गई थी इस कारण मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया गया है और मंदिर परिसर का विस्तार एवं सुंदरीकरण का कार्य चल रहा है। करीब छह एकड़ के मंदिर परिसर में सरोवर के किनारों, संपूर्ण मंदिर परिसर की चहारदिवारी आदि का निर्माण के साथ नये फलदार एवं औषधीय वृक्षों का रोपण किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि कोरोना का असर कम हो जाने से भक्तों की संख्या बढ़ने लगी है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह और समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद एवं जिला पंचायत अध्यक्ष घनश्याम अनुरागी भी मां के दर्शन करके गए हैं। स्वतंत्रदेव सिंह ने अपनी विधायक निधि से सौर ऊर्जा संयंत्र एवं पेयजल व्यवस्था के लिए योगदान किया है। उन्हीं की पहल पर उत्तर प्रदेश शासन का पर्यटन विभाग भी इस स्थान के विकास की परियोजना को अंतिम रूप दे रहा है।
श्री अक्षरादेवी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर देवपूजित है। इस स्थान की प्राचीनता का सही सही अनुमान लगाना तो संभव नहीं है किन्तु उपलब्ध शिलापट्ट के अनुसार इसके एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना होने का पता चलता है। कई प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यहां ईसा पूर्व चेदिवंश का शासन रहा। पुराने इतिहास की वजह से यहां जगह-जगह आध्यात्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं, लेकिन कालचक्र की उथल-पुथल में इनका इतिहास विलुप्त हो चुका है। श्री अक्षरादेवी धाम भी ऐसी ही धरोहरों में एक है। वैसे भी दुर्गमता के कारण जल परिवहन की अहमियत खत्म होने के बाद यह क्षेत्र मुख्य धारा से कट गया था।
किंवदंतियों के अनुसार ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम लिपि की उद्भव इसी स्थान से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मनुश्य की बोली को सर्वप्रथम भगवान शिव ने डमरू के नाद से स्वर के रूप में व्यवस्थित किया, इसके बाद लिपि की शुरुआत हुई। आमतौर पर देवी मंदिरों में मां आदिशक्ति प्रतिमा अथवा पिण्डी रूप में विराजती हैं। लेकिन श्री अक्षरा देवी मंदिर के गर्भगृह में मां किसी प्रतिमा की बजाय अपने तीनों स्वरूपों में प्रस्तर खंड पर प्रणवाक्षर की साढ़े तीन मात्राओं के एक दुर्लभतम यंत्र के रूप में विराजमान हैं। इन मात्राओं एवं यंत्र के स्वरूप को आदि शंकराचार्य विरचित सौंदर्यलहरी का ज्ञान रखने वाले ही समझ सकते हैं। इस कारण यहां केवल बौद्धिक साधना मान्य है।
देवी भागवत के परम विद्धान वृंदावन के ब्रह्मलीन आचार्य भागवतानंद जी सरस्वती के अनुसार यंत्र रूप में देवी की पूजा विशेष फल देने वाली होती है। आचार्य श्री के अनुसार श्री अक्षरा देवी उन विरले शक्तिपीठों में से एक है जहां देवी अपने यंत्र स्वरूप में विराजित हैं। यहां किसी प्रकार की सिद्धि करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। यह स्थान स्वंयसिद्ध है। आचार्य श्री का कहना था कि श्री दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त रात्रिसूक्तम् में परमपिता ब्रह्मा जी ने मां अक्षरा देवी की प्रार्थना की है।
कुछ अन्य संतों का विचार है कि विश्व में कुछ ही स्थान देवपूजित हैं। उत्तराखंड में श्री बदरीनाथ धाम में, कपाट बंद होने के बाद ब्रह्मासुत नारद जी छह माह भगवान की पूजा करते हैं। उसी प्रकार से श्री अक्षरादेवी के इस मंदिर में बारहों महीने देव पूजा करते हैं। श्री अक्षरादेवी मंदिर में शाम को छह बजे की आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और मंदिर के सामने के भाग में लोगों के आने जाने की सख्त मनाही होती है। माना जाता है कि ब्रह्म मुहूर्त में और संध्याकाल के बाद यहां देव पूजा करते हैं।
श्री अक्षरादेवी धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न बलि चढ़ती है और न कोई अन्य वाममार्गी साधना होती है। मां कभी अपनी संतान से बलिदान नहीं चाहतीं। इसलिए उस स्थान पर नारियल, मद्य, तिल, जवा का हवन निषिद्ध है। मंदिर के अंदर तेल का दीपक नहीं जलता और न ही नारियल की बलि दी जाती है। माँ के सामने तिल और जवा का हवन नहीं किया जाता है। अपितु, नारियल को मंदिर के पीछे दूर पहाड़ पर बलि के रूप में तोड़कर प्रसाद ले सकते हैं। इसके साथ ही तिल और जवा का हवन भी पीछे बनी वेदी पर किया जा सकता है। यदि किसी को देवी के सम्मुख हवन करना ही हो तो चंदन, धूप, आदि औषधियों को गाय के घृत एवं शक्कर में मिला कर सकते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर तामसी पदार्थ एवं राजसी संकल्प को लेकर देवी की आराधना नहीं की जा सकती।
श्री अक्षरादेवी मंदिर के सामने चट्टान पर गोलाकार प्राकृतिक अक्षय कुण्ड है जिसके पवित्र जल से माता स्नान आचमन आदि सभी धार्मिक संस्कार संपन्न होते हैं। नवरात्र पर यहां विशेष आराधना के लिए श्रद्धालु पूरे नौ दिन प्रवास करते हैं। चैत्र नवरात्र के बाद पड़ने वाली एकादशी के दिन यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें दूर दूर से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।