फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jalaun News ›   Three people started Ramlila in 1853.

Jalaun News: 1853 में तीन लोगों ने शुरू की थी रामलीला

Mon, 29 Sep 2025 12:31 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 29 Sep 2025 12:31 AM IST
विज्ञापन
Three people started Ramlila in 1853.
फोटो-21-ऐतिहासिक श्रीरामलीला का रंगमंच। संवाद
जालौन। जालौन नगर में रामलीला को आगे बढ़ाने में तीन प्रमुख व्यक्तियों का योगदान रहा है। उनके प्रयास से 1853 में जिस रामलीला का शुभारंभ हुआ था, वह आज भी जारी है। वर्ष 1853 में नगर के समाजसेवी सेठ चतुर्भुजदास, सेठ ताराचंद व राजगोपाल राव मलिहार ने मिलकर रामलीला महोत्सव की नींव रखी। प्रारंभिक वर्षों में लीला का मंचन चबूतरों पर होता था। उस समय नारद मोह से लेकर धनुष भंग तक की लीला का मंचन किया जाता था। यह परंपरा लगभग 15 वर्ष तक चलती रही। बाद में लोगों के बढ़ते उत्साह और सहभागिता ने आयोजन को और लोकप्रिय बना दिया।
विज्ञापन

वर्ष 1875 में लाला कुंजबिहारी और लाला गुड़वाले के सहयोग से 21 सदस्यों की समिति गठित हुई, जिसकी अध्यक्षता हिम्मतराम राठी ने संभाली। उस दौर में रामलीला का मंचन 15 दिनों तक शुरू हुआ। आगे 1892 में इसे बढ़ाकर 23 दिनों तक किया गया। विभिन्न स्थलों द्वारिकाधीश मंदिर परिसर, पक्के तालाब और बाजार में अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया जाता था।
विज्ञापन




1901 में नगर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समिति को जमीन दान की, जिसके बाद 1903 में चतुर्भुजदास ने अपने पुत्र गोकुलदास के जन्मोत्सव पर श्रीरामलीला भवन का निर्माण कराया। यहीं से रामलीला को स्थायी स्थान मिला। भवन परिसर में 1918 में दर्शकों की सुविधा के लिए चबूतरे और बैठक की व्यवस्था की गई। 1926 में 51 सदस्यीय समिति बनी, जिसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थानीय राजघरानों ने भी सहयोग दिया। 1932 में समिति का संविधान बनाकर पंजीकरण कराया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन




-परंपरा को नया आयाम-
1960 में भवन परिसर में दुकानों का निर्माण कर उनकी आय से रामलीला आयोजन का खर्च उठाया जाने लगा। 1980 के दशक में पन्नालाल गुप्ता अध्यक्ष व उमाशंकर चतुर्वेदी मंत्री चुने गए। चतुर्वेदी ने जीवन भर इस परंपरा को संभाले रखा। 2010 में अध्यक्ष बने शशिकांत द्विवेदी और बाद में मंत्री बने पवन चतुर्वेदी ने रामलीला को आधुनिक स्वरूप दिया। दशहरा मेला समिति बनाकर फौजी पड़ाव में रावण दहन व आतिशबाजी की परंपरा शुरू की गई, जो आज भी आकर्षण का केंद्र है।




बोले पदाधिकारी
फोटो-22-अध्यक्ष शशिकांत द्धिवेदी। स्रोत-स्वयं
समिति अध्यक्ष शशिकांत द्विवेदी का कहना है कि जालौन की रामलीला बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में अपनी अलग पहचान रखती है। सीमित संसाधनों के बावजूद पीढ़ी दर पीढ़ी संजोकर रखा गया है। पर्दों, झांकियों, स्थानीय कलाकारों के जीवंत अभिनय से यह मंचन और अधिक प्रभावी बनता है। द्विवेदी के अनुसार, रामलीला केवल मनोरंजन नहीं बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन से प्रेरणा देने का एक माध्यम है, जो समाज को नैतिक मूल्यों और आदर्शों से जोड़ता है।


फोटो-23-मंत्री पवन चतुर्वेदी। स्रोत-स्वयं
समिति के मंत्री पवन चतुर्वेदी बताते हैं कि शुरुआती दौर में लीला देखने नगर ही नहीं, बल्कि 10 से 15 किलोमीटर दूर के गांवों से भी लोग आते थे। कोई पैदल, कोई साइकिल, तो कोई बैलगाड़ी और तांगे से पहुंचता था। मंचन में प्रयुक्त पर्दे और भव्य झांकियां उस समय आकर्षण के केंद्र में थीं, जो नगर की रामलीला को आसपास के क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान दिलाती थीं।

फोटो-21-ऐतिहासिक श्रीरामलीला का रंगमंच। संवाद

फोटो-21-ऐतिहासिक श्रीरामलीला का रंगमंच। संवाद

फोटो-21-ऐतिहासिक श्रीरामलीला का रंगमंच। संवाद

फोटो-21-ऐतिहासिक श्रीरामलीला का रंगमंच। संवाद

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed