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अब नहीं जाएंगे परदेस, गांव में ही करेंगे काम
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समीर
- फोटो : ORAI
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आटा। कोरोना माहामारी के दोराना बड़े शहरों से मजदूरों की परेशानी की जो तस्वीरें आ रही है वह दिल दहलाने हैं। स्थिति यह है कि शासन प्रशासन के तमाम प्रयासों के बाद भी मजदूरों के पैदल घर पहुंचने का सिलसिला जारी है।
ऐसे में अब तक जो मजदूर किसी भी तरह जिले में पहुंचे है आज वह गांव में ही रोजगार ढूंढ रहे हैं। कस्बे में बाहर से आए मजदूरों का कहना है कि अब वह कभी परदेस नहीं जाएंगे, वह गांव में ही अपनों के बीच रहकर रोजगार करेंगे। बेरोजगारी के इस दौर में कई प्रवासी मजदूरों ने गांव में ही रोजगार कर एक नजीर दी है।
अकबरपुर इटौरा निवासी राजेंद्र कुशवाहा आंध्रप्रदेश के तिरुपति बालाजी जी में पांच साल से पानी पूरी बेचने का काम करते थे, कोरोना के डर से वह परिवार सहित 30 अप्रैल को गांव आ गए। इसके बाद उन्होंने कई जगह काम मांगा, लेकिन जब काम नहीं मिला तो उन्होंने सब्जी और फ ल की दुकान लगा ली।
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आटा कस्बा निवासी समीर अभी दिल्ली से 10 मई को किसी तरह अपने घर आ गया। समीर का कहना है कि अब वह दिल्ली नहीं जाना चाहता, इसी सोच के चलते समीर ने क्वारंटीन अवधि पूर्ण करने के बाद गांव के बाहर आपे सुधारने की दुकान खोल ली और अपना रोजगार शुरू किया।
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ऐसे में अब तक जो मजदूर किसी भी तरह जिले में पहुंचे है आज वह गांव में ही रोजगार ढूंढ रहे हैं। कस्बे में बाहर से आए मजदूरों का कहना है कि अब वह कभी परदेस नहीं जाएंगे, वह गांव में ही अपनों के बीच रहकर रोजगार करेंगे। बेरोजगारी के इस दौर में कई प्रवासी मजदूरों ने गांव में ही रोजगार कर एक नजीर दी है।
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अकबरपुर इटौरा निवासी राजेंद्र कुशवाहा आंध्रप्रदेश के तिरुपति बालाजी जी में पांच साल से पानी पूरी बेचने का काम करते थे, कोरोना के डर से वह परिवार सहित 30 अप्रैल को गांव आ गए। इसके बाद उन्होंने कई जगह काम मांगा, लेकिन जब काम नहीं मिला तो उन्होंने सब्जी और फ ल की दुकान लगा ली।
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आटा कस्बा निवासी समीर अभी दिल्ली से 10 मई को किसी तरह अपने घर आ गया। समीर का कहना है कि अब वह दिल्ली नहीं जाना चाहता, इसी सोच के चलते समीर ने क्वारंटीन अवधि पूर्ण करने के बाद गांव के बाहर आपे सुधारने की दुकान खोल ली और अपना रोजगार शुरू किया।

राजेंद्र कुशवाहा- फोटो : ORAI