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Jalaun News: भूख, पिटाई, गालियां… यही थी रोजमर्रा की जिंदगी
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फोटो - 22 घर में जांच पड़ताल करती पुलिस। पुलिस
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उरई। जगनेवा गांव में बंधुआ मजदूरी के खुलासे के बाद जो कहानी सामने आई, उसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। जिन चार मजदूरों को पुलिस ने टिनशेड वाले कमरे से मुक्त कराया, उनकी जिंदगी किसी कैदखाने से कम नहीं थी। भूख, पिटाई, गालियां और अमानवीय यातनाएं… यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी थी।
मजदूरों ने बताया कि उनसे उनकी क्षमता से कहीं अधिक काम कराया जाता था। सुबह से देर रात तक गोबर उठवाना, पशुओं को चारा डालना, खेतों में मजदूरी कराना और घर के अन्य काम करवाए जाते थे। काम में जरा सी कमी होने पर उन्हें जानवरों की तरह पीटा जाता था। दिनभर की मजदूरी के बदले उन्हें भरपेट भोजन तक नसीब नहीं होता था। मजदूरों ने बताया कि घर में बची हुई बासी रोटियां उन्हें खाने के लिए दी जाती थीं। चार लोगों में मुश्किल से सौ ग्राम दाल बांटी जाती थी, ताकि वे केवल जिंदा रह सकें। कई बार बासी रोटी के साथ चटनी या भर्ता देकर ही उन्हें पूरा दिन गुजारना पड़ता था।
भटके लोगों को बनाते थे निशाना, फिर बना लेते थे बंधक
ग्रामीणों के अनुसार आरोपी राह चलते भोले-भाले और भटके हुए लोगों को अपना निशाना बनाते थे। पहले उनसे बातचीत करते, फिर उन्हें गंतव्य तक छोड़ने का भरोसा देते। इसके बाद उन्हें अपने घर ले जाकर बंधक बना लिया जाता था। एक बार उनके कब्जे में आने के बाद मजदूरों से बिना पैसे मजदूरी कराई जाती थी। भागने की कोशिश करने या काम से मना करने पर इतनी यातनाएं दी जाती थीं कि मजदूर पूरी तरह टूट जाते थे।
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दो साल से कैद जिंदगी, बोलने तक पर थी पाबंदी
मुक्त कराए गए मजदूरों में दिल्ली विजय नगर निवासी अनिल, बरेली निवासी वीरेंद्र और हमीरपुर के कछुआ कला निवासी प्रेमचंद्र ने बताया कि वे करीब दो साल से आरोपियों के चंगुल में फंसे हुए थे। वहीं राठ क्षेत्र के बेगए गांव निवासी धर्मेंद्र ने बताया कि वह करीब 17 दिन पहले रास्ते से गुजर रहा था, तभी इन लोगों ने उसे बाइक पर बैठाया और बहाने से अपने घर ले गए। वहां उसे बंधक बना लिया गया। विरोध करने पर बेरहमी से पीटा। इसके बाद वह डर के साए में मजदूरी करने को मजबूर हो गया। मजदूरों ने बताया कि उन पर बोलने तक की पाबंदी थी। उन्हें सिर्फ आदेश सुनने और काम करने की अनुमति थी।
महीनों तक एक ही कपड़े में गुजारी जिंदगी
मजदूरों ने बताया कि उन्हें पहनने के लिए केवल एक जोड़ी कपड़े दिए जाते थे। वही कपड़े महीनों तक पहनने पड़ते थे। कपड़े फट जाने के बाद पुराने और इस्तेमाल किए हुए कपड़े थमा दिए जाते थे। सर्दियों में उन्हें नहाने तक नहीं दिया जाता था, जबकि गर्मियों में भी वे गंदे और बदबूदार कपड़ों में रहने के लिए मजबूर थे।
काम खत्म होते ही कमरे में कर देते थे बंद
दिनभर खेतों और पशुबाड़े में काम कराने के बाद रात में सभी मजदूरों को टिन शेड वाले एक छोटे कमरे में बंद कर दिया जाता था। कमरे में न हवा की व्यवस्था थी और न ही इंसानों के रहने लायक माहौल। घुटन और गर्मी के बीच मजदूर वहीं रात गुजारने को मजबूर थे। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते पुलिस कार्रवाई नहीं करती तो शायद इन मजदूरों की जिंदगी इसी कैद में खत्म हो जाती।
क्षेत्र के कई गांवों में फंसे हो सकते हैं और लोग
जगनेवा कांड के बाद ग्रामीणों में दहशत, सामने आने लगीं नई चर्चा
उरई। जगनेवा गांव में चार मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए जाने के बाद अब क्षेत्र में कई और लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। गांव और आसपास के इलाकों में इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय से भोले-भाले और भटके हुए लोगों को बहला-फुसलाकर बंधक बनाने का खेल चल रहा था।
ग्रामीणों के मुताबिक कई बार ऐसे लोग गांवों में दिखाई देते थे, जो बेहद डरे-सहमे रहते थे और किसी से बात तक नहीं करते थे। कुछ लोग खेतों और पशुबाड़ों में काम करते नजर आते थे, लेकिन उनकी हालत देखकर लगता था कि वे अपनी मर्जी से वहां नहीं हैं। लोगों का कहना है कि आरोपी रास्तों और बस स्टैंड के आसपास अकेले घूम रहे मजदूरों, मानसिक रूप से कमजोर लोगों या घर से भटके व्यक्तियों को निशाना बनाते थे। पहले उन्हें भरोसे में लिया जाता, फिर बाइक या अन्य वाहन में बैठाकर गांव ले जाया जाता था। इसके बाद उनसे जबरन मजदूरी कराई जाती थी।
जगनेवा में पुलिस द्वारा चार मजदूरों को मुक्त कराने के बाद अब आसपास के गांवों में भी ऐसे लोगों की तलाश शुरू हो गई है। ग्रामीणों को आशंका है कि कई और मजदूर अभी भी बंधक बनाकर रखे गए हो सकते हैं, जो डर और प्रताड़ना के कारण सामने नहीं आ पा रहे हैं। (संवाद)
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मजदूरों ने बताया कि उनसे उनकी क्षमता से कहीं अधिक काम कराया जाता था। सुबह से देर रात तक गोबर उठवाना, पशुओं को चारा डालना, खेतों में मजदूरी कराना और घर के अन्य काम करवाए जाते थे। काम में जरा सी कमी होने पर उन्हें जानवरों की तरह पीटा जाता था। दिनभर की मजदूरी के बदले उन्हें भरपेट भोजन तक नसीब नहीं होता था। मजदूरों ने बताया कि घर में बची हुई बासी रोटियां उन्हें खाने के लिए दी जाती थीं। चार लोगों में मुश्किल से सौ ग्राम दाल बांटी जाती थी, ताकि वे केवल जिंदा रह सकें। कई बार बासी रोटी के साथ चटनी या भर्ता देकर ही उन्हें पूरा दिन गुजारना पड़ता था।
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भटके लोगों को बनाते थे निशाना, फिर बना लेते थे बंधक
ग्रामीणों के अनुसार आरोपी राह चलते भोले-भाले और भटके हुए लोगों को अपना निशाना बनाते थे। पहले उनसे बातचीत करते, फिर उन्हें गंतव्य तक छोड़ने का भरोसा देते। इसके बाद उन्हें अपने घर ले जाकर बंधक बना लिया जाता था। एक बार उनके कब्जे में आने के बाद मजदूरों से बिना पैसे मजदूरी कराई जाती थी। भागने की कोशिश करने या काम से मना करने पर इतनी यातनाएं दी जाती थीं कि मजदूर पूरी तरह टूट जाते थे।
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दो साल से कैद जिंदगी, बोलने तक पर थी पाबंदी
मुक्त कराए गए मजदूरों में दिल्ली विजय नगर निवासी अनिल, बरेली निवासी वीरेंद्र और हमीरपुर के कछुआ कला निवासी प्रेमचंद्र ने बताया कि वे करीब दो साल से आरोपियों के चंगुल में फंसे हुए थे। वहीं राठ क्षेत्र के बेगए गांव निवासी धर्मेंद्र ने बताया कि वह करीब 17 दिन पहले रास्ते से गुजर रहा था, तभी इन लोगों ने उसे बाइक पर बैठाया और बहाने से अपने घर ले गए। वहां उसे बंधक बना लिया गया। विरोध करने पर बेरहमी से पीटा। इसके बाद वह डर के साए में मजदूरी करने को मजबूर हो गया। मजदूरों ने बताया कि उन पर बोलने तक की पाबंदी थी। उन्हें सिर्फ आदेश सुनने और काम करने की अनुमति थी।
महीनों तक एक ही कपड़े में गुजारी जिंदगी
मजदूरों ने बताया कि उन्हें पहनने के लिए केवल एक जोड़ी कपड़े दिए जाते थे। वही कपड़े महीनों तक पहनने पड़ते थे। कपड़े फट जाने के बाद पुराने और इस्तेमाल किए हुए कपड़े थमा दिए जाते थे। सर्दियों में उन्हें नहाने तक नहीं दिया जाता था, जबकि गर्मियों में भी वे गंदे और बदबूदार कपड़ों में रहने के लिए मजबूर थे।
काम खत्म होते ही कमरे में कर देते थे बंद
दिनभर खेतों और पशुबाड़े में काम कराने के बाद रात में सभी मजदूरों को टिन शेड वाले एक छोटे कमरे में बंद कर दिया जाता था। कमरे में न हवा की व्यवस्था थी और न ही इंसानों के रहने लायक माहौल। घुटन और गर्मी के बीच मजदूर वहीं रात गुजारने को मजबूर थे। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते पुलिस कार्रवाई नहीं करती तो शायद इन मजदूरों की जिंदगी इसी कैद में खत्म हो जाती।
क्षेत्र के कई गांवों में फंसे हो सकते हैं और लोग
जगनेवा कांड के बाद ग्रामीणों में दहशत, सामने आने लगीं नई चर्चा
उरई। जगनेवा गांव में चार मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए जाने के बाद अब क्षेत्र में कई और लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। गांव और आसपास के इलाकों में इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय से भोले-भाले और भटके हुए लोगों को बहला-फुसलाकर बंधक बनाने का खेल चल रहा था।
ग्रामीणों के मुताबिक कई बार ऐसे लोग गांवों में दिखाई देते थे, जो बेहद डरे-सहमे रहते थे और किसी से बात तक नहीं करते थे। कुछ लोग खेतों और पशुबाड़ों में काम करते नजर आते थे, लेकिन उनकी हालत देखकर लगता था कि वे अपनी मर्जी से वहां नहीं हैं। लोगों का कहना है कि आरोपी रास्तों और बस स्टैंड के आसपास अकेले घूम रहे मजदूरों, मानसिक रूप से कमजोर लोगों या घर से भटके व्यक्तियों को निशाना बनाते थे। पहले उन्हें भरोसे में लिया जाता, फिर बाइक या अन्य वाहन में बैठाकर गांव ले जाया जाता था। इसके बाद उनसे जबरन मजदूरी कराई जाती थी।
जगनेवा में पुलिस द्वारा चार मजदूरों को मुक्त कराने के बाद अब आसपास के गांवों में भी ऐसे लोगों की तलाश शुरू हो गई है। ग्रामीणों को आशंका है कि कई और मजदूर अभी भी बंधक बनाकर रखे गए हो सकते हैं, जो डर और प्रताड़ना के कारण सामने नहीं आ पा रहे हैं। (संवाद)