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जिले में एक भी फिजीशियन नहीं, सब भगवान भरोसे
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डॉ एसके पाल
- फोटो : ORAI
उरई (जालौन)। नवजात के इलाज के लिए जिला महिला अस्पताल में बने न्यू सिक बोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) के अलावा कहीं भी कहीं भी इलाज की व्यवस्था नहीं है। कोंच, कालपी और जालौन की सीएचसी को छोड़ दिया जाए तो किसी भी सीएचसी और पीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ तक नहीं है। हैरानी की बात यह है कि पूरे जिले में एक भी फिजीशियन नहीं है। सब कामचलाऊ व्यवस्था चल रही है। नवजात की सुरक्षा भगवान भरोसे चल रही है।
बता दें कि सीएचसी कोंच में बाल रोग विशेषज्ञ के रुप में डा. डीबी सिंह, जालौन में डा. योगेश आर्या और कालपी सीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ के रुप में डा. सुंदर सिंह की तैनाती है। जबकि महिला अस्पताल में डा. एसके पाल व जिला अस्पताल में डा. संजीव अग्रवाल एवं डा. एसपी सिंह की तैनाती है। अन्य जगह पर संसाधनों की बेहद कमी है।
हालत यह है कि नवजात को देखते ही जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। यहां भी इमरजेंसी में वेंटीलेटर की सुविधा न मिल पाने के कारण मरीज को रेफर करना मजबूरी हो जाता है। प्रभारी सीएमएस जिला महिला अस्पताल डा. एसके पाल का कहना है कि जो संसाधन उपलब्ध है, उनके आधार पर मरीजों को बेहतर सेवाएं देने की कोशिश की जाती है। बाकी शासन की नीति के अनुसार काम किया जा रहा है।
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खांसी के सीरप तक नहीं
बच्चे हो या बड़े सभी के लिए सरकारी अस्पतालों में खांसी वाले सीरप की सप्लाई बंद हो गई है। वैकल्पिक तौर पर उन्हें प्रोमैथाजीन टेबलेट या सिटजन टेबलेट दी जाती है या फिर उन्हें बाहर से महंगे दामों में कफ सीरप खरीदने को कह दिया जाता है।
बाहर से महंगी जांच कराने की मजबूरी
सीएसएफ (रीढ़ के हड्डी में पानी आना) की जांच की सुविधा किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है। यही वजह है कि 600 रुपये में यह जांच बाहर से कराना मजबूरी है। नवजात के फेफड़ों के मेनटेन रखने की सी पैप भी नहीं है। प्राइवेट में सुविधा 1500 रुपये में मिलती है। दिमाग की जांच, झटके वाली जांच ईईजी की सुविधा न होने से प्राइवेट में 800 रुपये में कराना मजबूरी है। वेंटीलेटर सुविधा उपलब्ध न होने पर प्राइवेट में चार से पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ते है।
कम पड़े जाते है एसएनसीयू के बेड
महिला अस्पताल में बनी एसएनसीयू वार्ड में भी 12 बेड है। इसमें छह बेड जिला महिला अस्पताल में जन्मे बच्चे के लिए आरक्षित है, जबकि छह बेड रेफर होकर आने वाले बच्चों के लिए आरक्षित है। उस समय परेशानी बढ़ जाती है, जब बच्चों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में बच्चों को कंगारू मदर केयर वार्ड में शिफ्ट करना पड़ता है।
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बता दें कि सीएचसी कोंच में बाल रोग विशेषज्ञ के रुप में डा. डीबी सिंह, जालौन में डा. योगेश आर्या और कालपी सीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ के रुप में डा. सुंदर सिंह की तैनाती है। जबकि महिला अस्पताल में डा. एसके पाल व जिला अस्पताल में डा. संजीव अग्रवाल एवं डा. एसपी सिंह की तैनाती है। अन्य जगह पर संसाधनों की बेहद कमी है।
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हालत यह है कि नवजात को देखते ही जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। यहां भी इमरजेंसी में वेंटीलेटर की सुविधा न मिल पाने के कारण मरीज को रेफर करना मजबूरी हो जाता है। प्रभारी सीएमएस जिला महिला अस्पताल डा. एसके पाल का कहना है कि जो संसाधन उपलब्ध है, उनके आधार पर मरीजों को बेहतर सेवाएं देने की कोशिश की जाती है। बाकी शासन की नीति के अनुसार काम किया जा रहा है।
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खांसी के सीरप तक नहीं
बच्चे हो या बड़े सभी के लिए सरकारी अस्पतालों में खांसी वाले सीरप की सप्लाई बंद हो गई है। वैकल्पिक तौर पर उन्हें प्रोमैथाजीन टेबलेट या सिटजन टेबलेट दी जाती है या फिर उन्हें बाहर से महंगे दामों में कफ सीरप खरीदने को कह दिया जाता है।
बाहर से महंगी जांच कराने की मजबूरी
सीएसएफ (रीढ़ के हड्डी में पानी आना) की जांच की सुविधा किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है। यही वजह है कि 600 रुपये में यह जांच बाहर से कराना मजबूरी है। नवजात के फेफड़ों के मेनटेन रखने की सी पैप भी नहीं है। प्राइवेट में सुविधा 1500 रुपये में मिलती है। दिमाग की जांच, झटके वाली जांच ईईजी की सुविधा न होने से प्राइवेट में 800 रुपये में कराना मजबूरी है। वेंटीलेटर सुविधा उपलब्ध न होने पर प्राइवेट में चार से पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ते है।
कम पड़े जाते है एसएनसीयू के बेड
महिला अस्पताल में बनी एसएनसीयू वार्ड में भी 12 बेड है। इसमें छह बेड जिला महिला अस्पताल में जन्मे बच्चे के लिए आरक्षित है, जबकि छह बेड रेफर होकर आने वाले बच्चों के लिए आरक्षित है। उस समय परेशानी बढ़ जाती है, जब बच्चों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में बच्चों को कंगारू मदर केयर वार्ड में शिफ्ट करना पड़ता है।

एसएनसीयू वार्ड भर्ती बच्चे- फोटो : ORAI

महिला अस्पताल में डिलीवरी के बाद वार्ड में भर्ती महिलाएं- फोटो : ORAI