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मनरेगा: मजदूरी के सवा चार करोड़ अटके
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
Updated Tue, 13 Dec 2016 11:35 PM IST
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काम की तलाश में वाहन में अपना सामान भरकर ले जाते मजदूर।
- फोटो : अमर उजाला
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गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार की ओर से संचालित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना (मनरेगा) का बुरा हाल है। हालात यह हैं कि खातों में पैसा न होने से मजदूरों की मजदूरी अटकी हुई है। सूत्रों की मानें तो जनपद में मजदूरों की 4 करोड़ 31 लाख रुपये दिहाड़ी बाकी है। खातों में पर्याप्त पैसा न होने से मजदूरी नहीं दी जा रही है।
अधिकारी भी बेबस हैं और आश्वासन के सिवा मजदूरों को कुछ नहीं दे पाते। काफी समय से अटकी मजदूरी न मिलने से मजदूरों के यहां खाने के लाले हैं। बताते चलें कि बेरोजगारों को रोजगार देने के उद्देश्य से संचालित मनरेगा देखरेख के अभाव में दम तोड़ रही है। समय पर मनरेगा का पैसा न मिलने से हर बार मजदूरों का भुगतान लटक जाता हैं। सूत्रों की मानें तो
जनपद में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी के चार करोड़ 31 लाख रुपये अटके हैं। कई बार शासन को प्रस्ताव बनाकर भेजा जा चुका है लेकिन अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है। इससे अधिकारी चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। इधर, काम के बदले मजदूरी समय पर न मिलने के चलते मजदूरों का बुरा हाल है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इससे कैसे निपटा जाए।
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आलाधिकारियों के कानों पर नहीं रेंग रही जूं
जिले के विभिन्न इलाकों में मनरेगा में मजदूरों ने काम किया लेकिन उन्हें काम के बदले पूरा भुगतान नहीं किया गया। सूत्रों की मानें तो कई ग्राम पंचायतें तो ऐसी हैं जहां पर मजदूरों की पांच-पांच महीने की मजदूरी लटकी है लेकिन पैसा न होने की वजह की समस्या का समाधान नहीं हो सका। मजदूरों ने इसको लेकर कई बार शासन व आलाधिकारियों को अवगत कराया लेकिन कानों में जूं तक नहीं रेंगी।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
जनपद में मनरेगा योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायतों में काम करने वाले जिन मजदूरों की मजदूरी अटकी हैं। उस संदर्भ में शासन को लिखित तौर पर अवगत कराया गया है। पूरी कोशिश की जा रही है कि बजट जल्द आ जाए और मजदूरों को काम के बदले दाम मिल सके। -एसपी सिंह, मुख्य विकास अधिकारी, जालौन
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अधिकारी भी बेबस हैं और आश्वासन के सिवा मजदूरों को कुछ नहीं दे पाते। काफी समय से अटकी मजदूरी न मिलने से मजदूरों के यहां खाने के लाले हैं। बताते चलें कि बेरोजगारों को रोजगार देने के उद्देश्य से संचालित मनरेगा देखरेख के अभाव में दम तोड़ रही है। समय पर मनरेगा का पैसा न मिलने से हर बार मजदूरों का भुगतान लटक जाता हैं। सूत्रों की मानें तो
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जनपद में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी के चार करोड़ 31 लाख रुपये अटके हैं। कई बार शासन को प्रस्ताव बनाकर भेजा जा चुका है लेकिन अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है। इससे अधिकारी चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। इधर, काम के बदले मजदूरी समय पर न मिलने के चलते मजदूरों का बुरा हाल है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इससे कैसे निपटा जाए।
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आलाधिकारियों के कानों पर नहीं रेंग रही जूं
जिले के विभिन्न इलाकों में मनरेगा में मजदूरों ने काम किया लेकिन उन्हें काम के बदले पूरा भुगतान नहीं किया गया। सूत्रों की मानें तो कई ग्राम पंचायतें तो ऐसी हैं जहां पर मजदूरों की पांच-पांच महीने की मजदूरी लटकी है लेकिन पैसा न होने की वजह की समस्या का समाधान नहीं हो सका। मजदूरों ने इसको लेकर कई बार शासन व आलाधिकारियों को अवगत कराया लेकिन कानों में जूं तक नहीं रेंगी।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
जनपद में मनरेगा योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायतों में काम करने वाले जिन मजदूरों की मजदूरी अटकी हैं। उस संदर्भ में शासन को लिखित तौर पर अवगत कराया गया है। पूरी कोशिश की जा रही है कि बजट जल्द आ जाए और मजदूरों को काम के बदले दाम मिल सके। -एसपी सिंह, मुख्य विकास अधिकारी, जालौन