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थप्पड़ की गूंज के बाद गोलियों से गूंज उठी थी कोतवाली
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अखिलेश
- फोटो : ORAI
उरई/कोंच (जालौन)। किसी को क्या पता था कि 31 जनवरी 2004 की शाम कोंच के जवाहर नगर मोहल्ले में दो पक्षों के बीच हुई मामूली सी मारपीट कोतवाली में तीन तीन लाशें गिरवा देगी और फिर आगजनी, तोड़फोड़ व बलवा आदि सब कुछ कुछ घंटों में ही हो जाएगा। कोतवाली के भीतर हुए हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी आज भी उस खूनी कहानी को बताते हुए सहम जाते हैं, जब एक थप्पड़ मारते ही इंस्पेक्टर ने आपा खोते हुए ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर कोतवाली की फर्श को बेगुनाहों के लहू से लाल कर दिया था।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक 31 जनवरी को क्षेत्र के जवाहर नगर मोहल्ले में दो पक्षों के बीच किसी मामूली सी बात पर विवाद हुआ था। तब सपा की सरकार थी और इलाके के सुरेंद्र निरंजन सपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य थे पर 31 जनवरी की शाम वह कोंच में नहीं थे। लिहाजा मोहल्ले के लोगों ने मामले को निपटाने के लिए सुरेंद्र के करीबी रिश्तेदार गल्ला व्यापारी शिव कुमार को साथ लिया और कोतवाली पहुंच गए। शिवकुमार ने बताया कि उन्होंने तत्कालीन इंस्पेक्टर डीडीएस राठौर से कहा कि मामला तूल देने के लायक नहीं, लिहाजा समझौता कराकर दोनों पक्ष को छोड़ा जा सकता है पर इंस्पेक्टर नहीं मानें।
बकौल शिव कुमार समझौता टलने के बाद जब वे जाने लगे तो इंस्पेक्टर राठौर ने अपने सिपाहियों से उन्हें भी लाकअप में डालने को कहा और घर चले गए। अगले दिन यानी 1 फरवरी 2004 को उनके रिश्तेदार सपा नेता सुरेंद्र निरंजन व उनके भाई रोडवेज यूनियन नेता महेंद्र कोतवाली पहुंचे और उन्हें लाकअप में डालने का विरोध करने लगे। इसी बात पर इंस्पेक्टर और सुरेंद्र के बीच कहासुनी शुरू हो गई, तब तक कुछ और लोग भी उनके समर्थन में कोतवाली आ चुके थे। इसी बीच न जाने किसने इंस्पेक्टर राठौर को एक थप्पड़ जड़ दिया, बस फिर क्या था कि कोतवाली गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठी। इंस्पेक्टर राठौर ही नहीं कोतवाली के सभी पुलिस कर्मी यहां तक कि इंस्पेक्टर का बेटे अनिल भी पुलिस के हथियार से अंधाधुंध गोलियां चला रहा था।
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अंधाधुंध गोलियां चलीं, किसी की हिम्मत नहीं पड़ी
प्रत्यक्षदर्शी मयंक मोहन का कहना है कि कोतवाली में चलने वाली अंधाधुंध गोली किसे और कहां लग रही थी कोई देखने वाला नहीं था। बाहर भी लोगों की भीड़ एकत्र थी लेकिन किसी ने काफी देर तक कोतवाली में घुसने की हिम्मत नहीं की। पुलिस कर्मियों को खून से सनी वर्दी में कोतवाली से बाहर निकलते देख सभी के चेहरे फक पड़ गए थे। करीब सात दिन तक नगर में कर्फ्यू सा माहौल था।
फायरिंग, आगजनी से दंगे से हालात
प्रत्यक्षदर्शी अखिलेश बबेले के मुताबिक, तब पूरे नगर में खासा हड़कंप सा मच गया था। हर कोई कोतवाली की ओर दौड़ रहा था। भीड़ का आक्रोश देख कुछ पुलिस कर्मियों ने स्वयं ही कोतवाली में आगजनी और तोड़फोड़ शुरू कर दी। कोतवाली के बाहर खड़ी गाड़ियां भी फूंक दी गईं। नगर में एकदम दंगे से हालात हो गए थे, कुछ ही देर में समूचा कोंच पुलिस छावनी में तब्दील नजर आ रहा था।
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प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक 31 जनवरी को क्षेत्र के जवाहर नगर मोहल्ले में दो पक्षों के बीच किसी मामूली सी बात पर विवाद हुआ था। तब सपा की सरकार थी और इलाके के सुरेंद्र निरंजन सपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य थे पर 31 जनवरी की शाम वह कोंच में नहीं थे। लिहाजा मोहल्ले के लोगों ने मामले को निपटाने के लिए सुरेंद्र के करीबी रिश्तेदार गल्ला व्यापारी शिव कुमार को साथ लिया और कोतवाली पहुंच गए। शिवकुमार ने बताया कि उन्होंने तत्कालीन इंस्पेक्टर डीडीएस राठौर से कहा कि मामला तूल देने के लायक नहीं, लिहाजा समझौता कराकर दोनों पक्ष को छोड़ा जा सकता है पर इंस्पेक्टर नहीं मानें।
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बकौल शिव कुमार समझौता टलने के बाद जब वे जाने लगे तो इंस्पेक्टर राठौर ने अपने सिपाहियों से उन्हें भी लाकअप में डालने को कहा और घर चले गए। अगले दिन यानी 1 फरवरी 2004 को उनके रिश्तेदार सपा नेता सुरेंद्र निरंजन व उनके भाई रोडवेज यूनियन नेता महेंद्र कोतवाली पहुंचे और उन्हें लाकअप में डालने का विरोध करने लगे। इसी बात पर इंस्पेक्टर और सुरेंद्र के बीच कहासुनी शुरू हो गई, तब तक कुछ और लोग भी उनके समर्थन में कोतवाली आ चुके थे। इसी बीच न जाने किसने इंस्पेक्टर राठौर को एक थप्पड़ जड़ दिया, बस फिर क्या था कि कोतवाली गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठी। इंस्पेक्टर राठौर ही नहीं कोतवाली के सभी पुलिस कर्मी यहां तक कि इंस्पेक्टर का बेटे अनिल भी पुलिस के हथियार से अंधाधुंध गोलियां चला रहा था।
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अंधाधुंध गोलियां चलीं, किसी की हिम्मत नहीं पड़ी
प्रत्यक्षदर्शी मयंक मोहन का कहना है कि कोतवाली में चलने वाली अंधाधुंध गोली किसे और कहां लग रही थी कोई देखने वाला नहीं था। बाहर भी लोगों की भीड़ एकत्र थी लेकिन किसी ने काफी देर तक कोतवाली में घुसने की हिम्मत नहीं की। पुलिस कर्मियों को खून से सनी वर्दी में कोतवाली से बाहर निकलते देख सभी के चेहरे फक पड़ गए थे। करीब सात दिन तक नगर में कर्फ्यू सा माहौल था।
फायरिंग, आगजनी से दंगे से हालात
प्रत्यक्षदर्शी अखिलेश बबेले के मुताबिक, तब पूरे नगर में खासा हड़कंप सा मच गया था। हर कोई कोतवाली की ओर दौड़ रहा था। भीड़ का आक्रोश देख कुछ पुलिस कर्मियों ने स्वयं ही कोतवाली में आगजनी और तोड़फोड़ शुरू कर दी। कोतवाली के बाहर खड़ी गाड़ियां भी फूंक दी गईं। नगर में एकदम दंगे से हालात हो गए थे, कुछ ही देर में समूचा कोंच पुलिस छावनी में तब्दील नजर आ रहा था।

शिवकुमार- फोटो : ORAI

मयंक- फोटो : ORAI

कोच कोतवाली जहां पर हुई थीं दो भाइयों समेत तीन की हत्याएं- फोटो : ORAI