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'अंतिम आदमी की खोज तक जारी रहेगा ऑपरेशन सूर्या होप'

Sun, 23 Jun 2013 02:49 PM IST
लखनऊ/ब्यूरो
लखनऊ/ब्यूरो Updated Sun, 23 Jun 2013 02:49 PM IST
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interview of lieutenant general anil chait on uttarakhand rescue operation

उत्तराखंड के आपदाग्रस्त क्षेत्रों में बचाव व राहत पहुंचाने के लिए सेना की मध्य कमान ने ऑपरेशन सूर्या होप चला रखा है।

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मध्य कमान की माउंटेन डिवीजन और मेडिकल कोर के 8500 जवान अपनी जान जोखिम में डालकर फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने में लगे हुए हैं।

उत्तराखंड की पल-पल की ख्ाबर

मौसम की बाधा और विषम भौगोलिक परिस्थितियों में बचाव व राहत कार्य में डटे जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए मध्य कमान सेनाध्यक्ष ले. जनरल अनिल चैत ने खुद ऑपरेशन की कमान संभाल रखी है।

शनिवार को ऑपरेशन की आगे की तैयारियों के लिए ले. जनरल अनिल चैत लखनऊ में थे। ‘अमर उजाला’ ने ले. जनरल चैत से तैयारियों पर बातचीत की।  

सवाल- बचाव व राहत कार्य में सेना के आगे कौन सी बड़ी बाधाएं हैं ?
जवाब- बचाव व राहत कार्य में सबसे बड़ी बाधा मौसम की खराबी है। सेना के पास जो हेलीकॉप्टर हैं वे एक बार में छह से सात लोगों को ही बाहर निकाल सकते हैं।
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खराब मौसम के कारण बीच-बीच में हेलीकॉप्टरों की उड़ान को कुछ देर के लिए रोकना पड़ रहा है। मेरे जीवन में यह अब तक की सबसे भीषण त्रासदी है।

ऐसे में सुनियोजित तरीके से ही बचाव व राहत कार्य चलाकर लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकता है।

सवाल-क्या सेना ने मौसम की बाधाओं से निपटने के लिए कोई रणनीति बनायी है ?
जवाब-इसके लिए सेना ने छह चरणों की योजना तैयार की है। पहले चरण में जो लोग जीवित फंसे हुए हैं उन तक पहुंचकर उनको सुरक्षा प्रदान करना है।

राहत-बचाव कार्य में जुटी सेना

दूसरे चरण में उनको एक जगह एकत्र कर संसाधनों का जुटाना है। तीसरे चरण में उपलब्ध संसाधनों के जरिए चाहे वह हेलीकॉप्टर हो या पैदल उनको सेना के राहत शिविर तक पहुंचाया जाएगा।
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चौथे चरण में लोगों को शिविर से सही सलामत बाहर निकाला जाएग। पांचवे चरण में एक सर्च अभियान चलाकर अब तक लापता लोगों की गहन पड़ताल की जाएगी। जबकि छठे चरण में सेना के संसाधनों के जरिए टूटफूट की मरम्मत कर सामान्य जीवन बहाल करना है।

सवाल-लोगों के इलाज में भी क्या सेना को दिक्कतें आ रही हैं ?
जवाब-मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने में एक बड़ी चुनौती खास तरह की दवाओं की उपलब्धता की कमी का है। हृदय, सांस रोगियों या अन्य कई रोगों के लिए मध्य कमान के डिपो से दवाइयां भेजी जा रही हैं।

मेरे संज्ञान में अब भी 15 हजार लोग फंसे हुए हैं।

सवाल-सेना ने इस ऑपरेशन में अब तक कितने लोगों की जान बचायी हैं ?
जवाब- तवा घाट सेक्टर से हेलीकॉप्टर से 49, पैदल 250 लोगों को निकाला गया। इन जगहों पर 350 लोगों को मेडिकल सुविधा मुहैया करायी गई है।

जोशीमठ सेक्टर से 2301 लोगों को हेलीकॉप्टर से, 10981 लोगों को पैदल मार्ग या रस्सियों के सहारे निकाला गया। यहां 1800 लोगों का इलाज किया गया जबकि 12 सौ लोगों को उनके घरों पर बात करायी गई।

यहीं स्थिति केदारनाथ घाटी की भी है। यहां सेना के हेलीकॉप्टर से 135 लोगों को बाहर निकाला गया। सड़क मार्ग से बदरीनाथ, सोनप्रयाग, उत्तरकाशी से 2,500 लोगों को सुरक्षित निकाला गया।

हर्षिल से 220 लोग हेलीकॉप्टर से अब तक बाहर आ चुके हैं। पैदल मार्ग से दो हजार लोगों को निकाला गया। करीब 1800 लोगों का उपचार किया गया। फोन से 1200 लोगों की उनके घर बात कराई गई। सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह लगातार वहां के हालात का जायजा ले रहे हैं।

जैसे-जैसे सूचनाएं आ रही हैं, फंसे हुए लोगों को ढूंढने के लिए सर्च ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं। सेना को सबसे अधिक कठिनाई जंगल चेटी इलाके में आ रही है। इसके बावजूद अब तक सेना की कार्रवाई से मैं खुश हूं।

सवाल -उत्तराखंड के बाद अब उत्तर प्रदेश के कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं। उसके लिए सेना क्या कर रही है ?
जवाब-उत्तराखंड की बाढ़ के कारण पीलीभीत सहित उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में बाढ़ का खतरा बन गया है। सेना ने 800 जवानों को रसद और मोटरबोट के साथ इन क्षेत्रों में रवाना किया है। पीलीभीत में ही सेना ने बाढ़ में फंसे 2348 लोगों को बाहर निकाला है।

सवाल- विपदाग्रस्त क्षेत्र का ऐसा कोई वाकया जिसने आपको झकझोरा हो ?
जवाब-विपदाग्रस्त क्षेत्र में मुझे एक वाकये ने सबसे अधिक झकझोरा। हर्षिल में एक बच्ची प्रज्ञा मिश्रा बार-बार मुझसे कह रही थी कि 26 जून को उसकी प्रवेश परीक्षा है। अगर वह परीक्षा में न पहुंच सकी तो उसका एक साल बर्बाद हो जाएगा।


यहां हेलीकॉप्टर से उसको निकाला जा सकता था, लेकिन करीब दस लोग अधिक बीमार हालत में थे। उनको इलाज की बेहद सख्त जरूरत थी। एक तरफ बच्ची के एक साल का तो दूसरी ओर दस लोगों की जिंदगी का सवाल था। मैं आर्मी कमांडर होकर भी कुछ नहीं कर सकता था।

हेलीकॉप्टर से उस बच्ची को आने का मौका नहीं मिला। यह बात मुझे रास्ते भर परेशान करती रही। मैंने उस बच्ची का मोबाइल नंबर लिया था, इसलिए अपने अधिकारियों को किसी तरह उसे समय से पहले नीचे उतारने का निर्देश दिया।

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