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आबादी के अनुपात में हो आरक्षण का वर्गीकरण
हाथरस/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 15 May 2016 11:53 PM IST
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हाथरस। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वी. ईश्वरैय्या ने कहा कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आयोग गंभीर है। हमने सरकार से ओबीसी की सभी जातियों को आरक्षण का समान लाभ दिलाने के लिए 27 फीसदी आरक्षण का उनकी आबादी के हिसाब से वर्गीकरण करने की सिफारिश की है। सिफारिश सरकार के पास लंबित है। लोकसभा कमेटी भी इस आशय की संस्तुति दे चुकी है।
ईश्वरैय्या प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आनंदपुरी शाखा के कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे। पत्रकारों से बातचीत में कहा कि 2011 में हुई जाति आधारित सामाजिक आर्थिक गणना को अगर सार्वजनिक किया जाए तो आरक्षण की समीक्षा हो सकती है। आरक्षण व्यवसाय कम आय आधारित होना चाहिए। उनका व्यक्तिगत मानना है कि अगर जिस जाति-वर्ग पर पर आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो चुका है तो उसे स्वत: ही आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए। संविधान के आर्टिकल 15 (4) में स्पष्ट है कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर सामाजिक संतुलन के लिए जाति रहित समाज बनाना चाहते थे। लिहाजा उन्होंने आबादी के अनुपात में आरक्षण का फॉर्मूला दिया।
एक सवाल पर अपने न्यायाधीश काल में 69 हजार केस निपटाने वाले पूर्व चीफ जस्टिस बोले कि विधायिका और कार्यपालिका में न्याय पालिका का जितना दखल होना चाहिए, उतना है नहीं। अगर न्यायपालिका इनकी गलतियां नहीं सुधारेगी तो कौन सुधारेगा। ये बात भी गलत है कि न्यायपालिका समानांतर सरकार चलाती है। वह संविधान के दायरे मेें ही अपना काम कर रही है। न्यायपालिका के मजबूत होने से समाज को न्याय मिलेगा। उन्होंने देश में जजों की कमी पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की चिंता को जायज बताया और कहा कि इसी वजह से न्यायिक प्रक्रिया में विलंब होता है और पीड़ित को त्वरित न्याय नहीं मिल पाता।
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उन्होंने कहा कि देश में 50 लाख की आबादी पर एक जज है, जबकि विदेशों में 50 हजार की आबादी पर एक जज हैं। वर्तमान में देश में 120 करोड़ की आबादी पर कुल 400 जज हैं।
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ईश्वरैय्या प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आनंदपुरी शाखा के कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे। पत्रकारों से बातचीत में कहा कि 2011 में हुई जाति आधारित सामाजिक आर्थिक गणना को अगर सार्वजनिक किया जाए तो आरक्षण की समीक्षा हो सकती है। आरक्षण व्यवसाय कम आय आधारित होना चाहिए। उनका व्यक्तिगत मानना है कि अगर जिस जाति-वर्ग पर पर आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो चुका है तो उसे स्वत: ही आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए। संविधान के आर्टिकल 15 (4) में स्पष्ट है कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर सामाजिक संतुलन के लिए जाति रहित समाज बनाना चाहते थे। लिहाजा उन्होंने आबादी के अनुपात में आरक्षण का फॉर्मूला दिया।
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एक सवाल पर अपने न्यायाधीश काल में 69 हजार केस निपटाने वाले पूर्व चीफ जस्टिस बोले कि विधायिका और कार्यपालिका में न्याय पालिका का जितना दखल होना चाहिए, उतना है नहीं। अगर न्यायपालिका इनकी गलतियां नहीं सुधारेगी तो कौन सुधारेगा। ये बात भी गलत है कि न्यायपालिका समानांतर सरकार चलाती है। वह संविधान के दायरे मेें ही अपना काम कर रही है। न्यायपालिका के मजबूत होने से समाज को न्याय मिलेगा। उन्होंने देश में जजों की कमी पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की चिंता को जायज बताया और कहा कि इसी वजह से न्यायिक प्रक्रिया में विलंब होता है और पीड़ित को त्वरित न्याय नहीं मिल पाता।
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उन्होंने कहा कि देश में 50 लाख की आबादी पर एक जज है, जबकि विदेशों में 50 हजार की आबादी पर एक जज हैं। वर्तमान में देश में 120 करोड़ की आबादी पर कुल 400 जज हैं।