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राहुल ने रोशन किया लालाराम का नाम
अमर उजाला, हाथरस
Updated Fri, 20 Jan 2017 11:41 PM IST
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सीए की प्रवेश परीक्षा पास करने वाला राहुल अपने पिता के साथ।
- फोटो : अमर उजाला
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हौसला अगर बुलंद हो तो कोई भी अड़चन आदमी को मंजिल पाने से नहीं रोक सकती है। परिस्थितियां चाहे जो हाें, कर्मठ व्यक्ति उसे अपने अनुरूप मोड़ ही लेते हैं। ऐसा करके दिखाया है एक कान साफ करने वाले के बेटे ने।
उसने सीए (चार्टर्ड अकाउंटेंट) जैसी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा सीपीटी (कामन प्रोफिशियेंसी टेस्ट) में सफलता हासिल करके अपने पिता के सपने को पूरा करने की राह पर कदम बढ़ा दिया है।
हबूड़ा जाति से ताल्लुक रखने वाले भगत सिंह कॉलोनी निवासी लालाराम मकवाना हाथों में एक लकड़ी की पेटी लेकर लोगों के कानों की सफाई कर अपना और परिवार का जीवन-यापन करते हैं।
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एक दिन में बमुश्किल दो सौ रुपये कमाने वाले लालाराम के चार बेटे और एक बेटी है। इनमें से एक बेटा उनकी पत्नी के पास रहता है। पत्नी दिल्ली की एक फैक्ट्री में काम करती है। बाकी चार बच्चों का लालाराम ही भरण-पोषण करता है।
लालाराम की मानें तो उन्होंने शुरू से ही अपने बेटे को एक बड़े पद पर पहुंचाने की ठान ली थी। विषम परिस्थितियों में भी उसकी पढ़ाई का ख्याल रखा। लालाराम ने बताया कि उनके बेटे राहुल मकवाना ने प्राथमिक शिक्षा के बाद नवोदय विद्यालय अगसौली से इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की।
इसके बाद वह दिल्ली चला गया और सीए की तैयारी में जुट गया। वहां उसने अपने पहले की प्रयास में प्रवेश परीक्षा पास की। इस परीक्षा के पास होने की जानकारी पर उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। लालाराम ने बताया कि उनका दूसरा बेटा भी नवोदय विद्यालय में पढ़ रहा है।
वहीं, एक बेटी और एक बेटा कस्बे के एक इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं। लालाराम ने बताया कि वह अनपढ़ मजदूर है, लेकिन अपने बच्चों को समाज में एक अच्छा स्थान दिलाना चाहता है। वहीं, उन लोगाें को नसीहत भी जो गरीबी का बहाना लेकर छोटी उम्र से ही बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की बजाय मजदूरी में लगा देते हैं।
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उसने सीए (चार्टर्ड अकाउंटेंट) जैसी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा सीपीटी (कामन प्रोफिशियेंसी टेस्ट) में सफलता हासिल करके अपने पिता के सपने को पूरा करने की राह पर कदम बढ़ा दिया है।
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हबूड़ा जाति से ताल्लुक रखने वाले भगत सिंह कॉलोनी निवासी लालाराम मकवाना हाथों में एक लकड़ी की पेटी लेकर लोगों के कानों की सफाई कर अपना और परिवार का जीवन-यापन करते हैं।
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एक दिन में बमुश्किल दो सौ रुपये कमाने वाले लालाराम के चार बेटे और एक बेटी है। इनमें से एक बेटा उनकी पत्नी के पास रहता है। पत्नी दिल्ली की एक फैक्ट्री में काम करती है। बाकी चार बच्चों का लालाराम ही भरण-पोषण करता है।
लालाराम की मानें तो उन्होंने शुरू से ही अपने बेटे को एक बड़े पद पर पहुंचाने की ठान ली थी। विषम परिस्थितियों में भी उसकी पढ़ाई का ख्याल रखा। लालाराम ने बताया कि उनके बेटे राहुल मकवाना ने प्राथमिक शिक्षा के बाद नवोदय विद्यालय अगसौली से इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की।
इसके बाद वह दिल्ली चला गया और सीए की तैयारी में जुट गया। वहां उसने अपने पहले की प्रयास में प्रवेश परीक्षा पास की। इस परीक्षा के पास होने की जानकारी पर उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। लालाराम ने बताया कि उनका दूसरा बेटा भी नवोदय विद्यालय में पढ़ रहा है।
वहीं, एक बेटी और एक बेटा कस्बे के एक इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं। लालाराम ने बताया कि वह अनपढ़ मजदूर है, लेकिन अपने बच्चों को समाज में एक अच्छा स्थान दिलाना चाहता है। वहीं, उन लोगाें को नसीहत भी जो गरीबी का बहाना लेकर छोटी उम्र से ही बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की बजाय मजदूरी में लगा देते हैं।