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हाथरस : अंग्रेजों ने घर तोड़ दिए लेकिन राम करन का हौसला नहीं टूटा

Sat, 13 Aug 2022 10:45 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 13 Aug 2022 10:45 PM IST
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Hathras: The British broke the house but Ram Karan did not lose his spirits
स्वतंत्रता सेनानी राम करन जैन का फाइल फोटो। - फोटो : SHAPHU
संवाद न्यूज एजेंसी, सहपऊ।
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देश को आजाद कराने का जुनून ऐसा कि दो बार जेल गए, जुर्माना भरा, यहां तक की अंग्रेजों ने कुर्की की कार्रवाई कर मकान भी तोड़ दिया, लेकिन वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम करन जैन का हौसला नहीं तोड़ पाए। आजादी की लड़ाई में उन्होंने हमेशा बढ़ - चढ़कर हिस्सा लिया। इसके लिए 1972 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।
कस्बा निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम करन जैन के बेटे दिनेश जैन ने बताया कि वे युवावस्था से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे। कस्बा में अंग्रेजों के विरुद्ध निकलने वाले जुलूसों का आगे बढ़कर नेतृत्व किया करते थे। उन्होंने अपना घर कांग्रेस का कार्यालय बना रखा था।
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जब अंग्रेजों को पता चला तो 1930 में उन्हें छह माह का कारावास हुआ और 300 रुपये का जुर्माना लगाया। 1932 में दूसरी बार छह माह का कारावास और 10 रुपये जुर्माना लगा। जेल से आने के बाद जब उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला और घर से भाग कर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे तो अंग्रेजों ने उनके घर की कुर्की की और उसे तोड़कर चबूतरा बना दिया। इसके बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा और इसी चबूतरे पर कांग्रेस की बैठकें होने लगी।
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रेलवे में नौकरी लगने के बाद पत्नी ने संभाला मोर्चा
उनके सबसे छोटे पुत्र दिनेश जैन ने बताया कि उनकी इन हरकतों से तंग आकर पिता बनारसी लाल जैन ने उनकी रेलवे में मालबाबू की नौकरी लगवा दी। नौकरी लगने बाद उनकी पत्नी बंसती देवी जैन लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाले जलसे एवं जुलूसों में भाग लेकर देश को स्वतंत्र कराने में अपनी भूमिका निभाती रहीं।

1962 में रेलवे से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पोस्ट ऑफिस में पोस्टमास्टर की ड्यूटी की। समाज सेवा करने के ध्येय से उन्होंने पोस्ट ऑफिस के लिए अपने मकान में ही एक दुकान बनवा कर काम किया था। यहां से काम छोड़ने के बाद ही पोस्ट ऑफिस को सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। उनके चार पुत्र रमेश चंद्र जैन, सुरेश जैन, महेश चंद्र जैन एवं दिनेश चंद्र जैन थे। 1977 में हृदयाघात से उनका निधन हो गया।
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