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दलित किशोरी से दुष्कर्म में एक आरोपी को उम्रकैद

Tue, 25 Oct 2016 11:43 PM IST
अमर उजाला, हाथरस
अमर उजाला, हाथरस Updated Tue, 25 Oct 2016 11:43 PM IST
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Dalit girl raped by the accused to life imprisonment
कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

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अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय एसएन त्रिपाठी के न्यायालय ने नाबालिग दलित किशोरी को बहला-फुसलाकर ले जाने और उसके साथ दुष्कर्म करने के आरोपी को दोषी करार दिया है। न्यायालय ने युवक को आजीवन कारावास एवं 20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। अर्थदंड अदा नहीं करने पर पांच माह का अतिरिक्त कारावास भोगना होगा, जबकि आरोप पत्र में शामिल उसके दो अन्य साथियों को दोषमुक्त किया गया है।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक कोतवाली सादाबाद में तीन जनवरी 2011 को एक व्यक्ति ने रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि उसकी 15 वर्षीय नाबालिग पुत्री 29 जनवरी, 2011 को शाम करीब पांच बजे गांव के ही एक व्यक्ति के सरसों के खेत में शौच करने गई थी। वहां ईदू, रूपा, आमीन और ईशाक पहले से ही बैठे हुए थे। यह लोग उसकी पुत्री को बहला-फुसला कर ले गए। उसे गांव के कुछ लोगों ने देखा। पीछा करने पर यह लोग लड़की को बाइक पर बिठाकर भाग गए। किशोरी के पिता ने अपनी पुत्री को मंदबुद्धि की होना भी बताया।

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इस मामले में अभियुक्त ईदू के पलायित हो जाने के कारण उसके विरुद्ध मुकदमा पृथक किया गया। न्यायालय ने सुनवाई के बाद अभियुक्त आमीन और ईशाक को धारा 363, 366 और 376 आईपीसी के आरोप में दोष मुक्त करार दिया, जबकि अभियुक्त रूपा को धारा 363,366 के आरोप में तो दोष मुक्त करार दिया, लेकिन रूपा को धारा 376 डी और सपठित 3 (2) (5) एससीएसटी एक्ट के अपराध के लिए सश्रम आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा से दंडित किया है। 
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दोनों दोषमुक्त अभियुक्तों को धारा 437ए के प्राविधानों के तहत अपील होने की संभावना को दृष्टिगत रखते हुए नौ-नौ हजार रुपये का व्यक्तिगत बंधपत्र और समान धनराशि की दो प्रतिभूति निष्पादित करने के आदेश दिए, जो आगामी छह माह के लिए वैध होंगी। वादी की ओर से पैरवी एडीजीसी राजेंद्र वार्ष्णेय ने की।

वहीं अपर सत्र न्यायाधीश तृतीय एसएन त्रिपाठी के न्यायालय में एक बच्चे के अपहरण एवं हत्या के बाद शव को छिपाने के एक अभियुक्त को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। इस मामले में न्यायालय ने पक्षद्रोही होने पर वादी सहित सभी छह गवाहों के खिलाफ कोतवाली सिकंदराराऊ पुलिस को धारा 344 के तहत प्रकीर्ण वाद दर्ज करने के आदेश दिए हैं।

घटना में वादी सुरेंद्र सिंह द्वारा कोतवाली सिकंदराराऊ पुलिस को छह मई,2006 को दी गई तहरीर में कहा गया है कि गांव के ही चोखेलाल की पत्नी महादेवी का त्रियोदशी संस्कार था। वे सभी उसकी व्यवस्था में लगे हुए थे। इसी दिन शाम करीब छह बजे मौका पाकर उसके गांव के गजेंद्र सिंह, कौशल उर्फ गट्टा और महेश उसके भाई अमर सिंह के लड़के दीपू को पकड़कर ले गए। इनको ले जाते हुए छोटे-छोटे बच्चों ने देखा। वे रात भर लड़के को तलाश करते रहे।

तभी समय करीब दस बजे दिन में गांव की औरतों ने दीपू का शव शीलेंद्र सिंह और रामजीलाल के खेत की नाली में पड़ा देखा। उसकी बगल में घाव थे और गले में फांसी के निशान थे। वादी ने आरोप लगाया कि उसके भतीजे का अपहरण करके गजेंद्र, कौशल उर्फ गट्टो और महेश ने वीरपाल, प्रेमपाल सिंह, बंटी, विमेश प्रताप उर्फ पप्पी के साथ षडयंत्र करके हत्या कर दी और लाश नाली में छुपा दी। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी वीरपाल के खिलाफ धारा 364, 302, 201 एवं धारा 3(2)(5) एससी एसटी एक्त के तहत न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया था।

न्यायालय ने अभियुक्त को तकनीकी रूप से संदेह का लाभ देते हुए बरी करते हुए वादी सुरेंद्र, सुखवीर, शीला, महीपाल सिंह, कपिल और हुकुम सिंह को अभियुक्त को बचाने के लिए मिथ्या साक्ष्य पेश करने का दोषी ठहराया है। न्यायालय ने टिप्पणी की है कि यदि इन लोगों ने अभियोजन के पक्ष में साक्ष्य पेश किया होता और पक्षद्रोही नहीं हुए होते तो निश्चित रूप से परिणाम परिवर्तित हो सकता था। 


इस तरह से उन्होंने गलत       साक्ष्य पेश कर न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित किया है। लिहाजा उनके खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज किया जाए और उनसे नोटिस जारी कर पूछा जाए कि उन्होंने अभियुक्त को बचाने के लिए क्यों मिथ्या साक्ष्य पेश किया। यदि उनका कारण पर्याप्त नहीं होगा तो उन्हें इस धारा के तहत दोषी माना जाएगा। न्यायालय ने आरोपी से दोषमुक्त होने के बाद धारा 437ए के प्राविधानों के तहत अपील होने की संभावना को देखते हुए नौ हजार रुपये के व्यक्तिगत बंध पत्र भी भरवाए हैं। वादी की ओर से पैरवी एडीजीसी राजेंद्र वार्ष्णेय ने की।

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