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कभी एशिया में था नाम, अब मिल की खरीद फरोख्त की भी जांच

Wed, 10 Mar 2021 10:59 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 10 Mar 2021 10:59 PM IST
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Was once the name in Asia, now the investigation into the purchase of the mill also
हरदोई चीनी मिल। संवाद - फोटो : HARDOI
हरदोई। कभी एशिया की नामी चीनी मिलों में शुमार रही लक्ष्मी चीनी मिल एक फिर चर्चा में है। इसकी चर्चा इसलिए नहीं की जा रही है कि यह फिर से शुरू हो रही है, बल्कि इसलिए कि बसपा के पूर्व एमएलसी मोहम्मद इकबाल की जिन सात मिलों को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जब्त किया है, उसमें यह चीनी मिल भी शामिल है।
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मोटे दाने वाली चीनी तैयार करने लक्ष्मी चीनी मिल अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। 21 बरस हो गए यहां के ब्वॉयलर ने उबाल नहीं मारा। इसकी चिमनी से धुआं निकले दो दशक बीत चुके हैं। कभी जो आवास यहां के अफसरों के परिवारों से गुलजार रहते थे, अब खंडहर जैसे हो गए हैं।
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1200 से अधिक परिवारों को पालने वाली लक्ष्मी शुगर मिल की धाक लंबे समय तक न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे एशिया में कायम थी। 21 साल से बंद इस चीनी मिल के अधिकांश कर्मचारियों ने दूसरे काम-धंधे अपना लिए हैं।
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अब वे यह भी बताना नहीं चाहते कि कभी इस चीनी मिल में उनकी ऊर्जा से भी काम होता था। चीनी मिल की मशीनें कबाड़ हो चुकी हैं। यहां की हालत खंडहर और जंगल जैसी हो गई है। बड़े-बड़े पेड़ों और झाड़ झंखाड़ में मिल की चिमनी और इमारत ही दिखती है। बंदरों की उछलकूद यहां की चुप्पी तोड़ती है।
लक्ष्मी शुगर मिल की स्थापना वर्ष 1936 में उद्योगपति दया विनोद और सरन बाबू ने मिलकर की थी। लक्ष्मी उनकी मां का नाम था। वर्ष 1984 तक यह चीनी मिल प्राइवेट हाथ में ही रही। 1984 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मिल का अधिग्रहण कर उत्तर प्रदेश गन्ना एवं चीनी विकास निगम को सौंप दिया था।
1999 में बंद मिलों में शामिल थी लक्ष्मी चीनी मिल
वर्ष 1999 में भाजपा गठबंधन की सरकार ने उत्तर प्रदेश गन्ना एवं चीनी विकास निगम की 15 चीनी मिलों को स्थायी रूप से बंद कर दिया था। खास बात यह है कि मिलों को बंद करने के कारणों का उल्लेख तब गजट में नहीं किया गया था।
वर्ष 2007 में तत्कालीन बसपा सरकार ने गन्ना एवं चीनी विकास निगम की 27 मिलों को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय लिया था। तब उम्मीद जागी थी कि चीनी मिल का संचालन शुरू हो सकता है, लेकिन बाद में इसके पीछे के खेल खुलने लगे और निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक उपक्रमों को औने-पौने दामों पर बेचने की बात सामने आ गई।
2011 में हुई थी चीनी मिल की बिक्री
सैकड़ों करोड़ की कीमत वाली हरदोई चीनी मिल को बसपा सरकार में महज आठ करोड़ बीस लाख रुपये में बेच दिया गया था। एजाइल शुगर प्राइवेट लिमिटेड और नम्रता मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड के सलाहकार इशरारुल हसन जैदी ने मिल का बैनामा कराया था। 57.40 लाख रुपये का स्टांप शुल्क अदा किया गया था।
इसकी बिक्री कैलाश चंद्र शाह, प्रधान प्रबंधक वित्त एवं लेखा उत्तर प्रदेश राज्य चीनी एवं गन्ना विकास निगम लिमिटेड लखनऊ ने की थी। मिल के पास हरदोई में ही नहीं शाहाबाद और पिहानी में भी भूमि थी। 48 गाटा नंबरों में 15.6548 हेक्टेयर भूमि थी। इसमें से 12.6078 हेक्टेयर भूमि हरदोई तहसील क्षेत्र में और 3.0470 हेक्टेयर भूमि शाहाबाद तहसील क्षेत्र में थी।
ईडी ने मांगा था ब्यौरा, भेज दिया
सहायक महानिरीक्षक निबंधन स्टांप शशिभानु मिश्रा ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय ने चीनी मिल की बिक्री से जुड़े अभिलेख और जानकारियां मांगी थीं। सभी आवश्यक अभिलेख और जानकारियां भेज दी गई हैं। आगे जो भी कार्रवाई इस प्रकरण में होगी, वह प्रवर्तन निदेशालय से ही होगी।
सरकुलर रोड निवासी हरदयाल सिंह कभी चीनी मिल में टाइम कीपर हुआ करते थे। वर्ष 2000 में चीनी मिल से जबरन छुट्टी कर दी गई। परिवार की गाड़ी चलानी थी, सो जैसे तैसे साइकिल की दुकान खोली और अब भी साइकिल की दुकान चला रहे हैं।
हरदयाल सिंह बताते हैं कि लगभग 1200 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दे दी गई थी, इनमें से साठ फीसदी का ही पीएफ का भुगतान मिला और बहुतों को कुछ भी नहीं मिला। अब 21 बरस हो गए हैं तो पता ही नहीं कौन कहां है और क्या कर रहा है।
अब परचून की दुकान से कर रहे गुजारा
चीनी मिल के अंदर कैंटीन चलाने वाले नरेंद्र कुमार गुप्ता अब एक लकड़ी के खोखे में परचून की दुकान चलाते हैं। वे बताते हैं कि मिल में सब कुछ ठीक चल रहा था।

हमारी कैंटीन भी बढ़िया चल रही थी, लेकिन फिर पता नहीं किसकी नजर लग गई। एकाएक चीनी मिल बंद कर दी गई। इसी के साथ कैंटीन भी बंद हो गई। परिवार चलाने के लिए परचून की दुकान खोल ली है। अब इसी से किसी तरह गुजारा चल रहा है।

नरेंद्र कुमार गुप्ता। संवाद

नरेंद्र कुमार गुप्ता। संवाद- फोटो : HARDOI

फोटो-23-अपनी दुकान पर साइकिल बांधते हरदयाल सिंह। संवाद

फोटो-23-अपनी दुकान पर साइकिल बांधते हरदयाल सिंह। संवाद- फोटो : HARDOI

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