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4 वर्ष बाद कंपोनेंट सेपरेटर यूनिट को उपकरणों की सौगात
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जिले के ब्लड बैंक को उपलब्ध कराईं गईं कंपोनेंट सेपरेटर मशीनें। संवाद
- फोटो : HARDOI
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हरदोई। कोरोना, डेंगू आदि के रोगियों को अब प्लाज्मा की खातिर दूसरे शहरों की खाक नहीं छाननी होगी और न ही रक्त की कमी से लोगों की जान जाएगी। पिछले चार बरस पहले जिले में तैयार कंपोनेंट यूनिट के उपकरण जिले की ब्लड बैंक को उपलब्ध करा दिए गए हैं। अब एक यूनिट ब्लड से चार जरूरतमंद लोगों की जान बचाई जा सकेगी।
जिले में अभी तक किसी रक्तदाता द्वारा दिया गया एक यूनिट रक्त सिर्फ एक की ही जान बचा सकता है। कंपोनेंट सेपरेटर यूनिट के कार्य करने के बाद इस एक यूनिट ब्लड को आरबीसी, प्लेट्लेट्स , प्लाज्मा व क्रयाओ में विभक्त किया जा सकता है। यानी एक यूनिट ब्लड जरूरत के हिसाब से चार लोगों के काम आ सकेगा। इसकी उपयोगिता को समझते हुए वर्ष 2016 में प्रदेश में आठ जिलों को कंपोनेंट सेपरेटर यूनिट की स्थापना के लिए चयनित किया गया था। यूनिट की स्थापना के लिए शासन स्तर से एक करोड़ का बजट भी आवंटित कर दिया गया था।
नवंबर 2017 तक जिला चिकित्सालय के ब्लड बैंक के पीछे यूनिट की इमारत तैयार करवा दी गई है। इसके बाद से उपकरणों को लेकर इंतजार किया जा रहा था। चार साल के लंबे इंतजार के बाद भी अब तक यहां उपकरण नहीं उपलब्ध कराए जा सके थे। अमर उजाला ने रक्त की कमी को लेकर समय समय पर अभियान चलाया और स्वास्थ्य विभाग को भी चेताया। अमर उजाला ने 18 मई के अंक में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। जिसका संज्ञान लेकर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके शाक्य ने एक बार फिर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं महानिदेशक को अनुस्मारक पत्र भेजा था। उसी का नतीजा है कि जिले को यूनिट के लिए उपकरण प्राप्त हो गए हैं। लैब टेक्नीशियन मो. अकील खान ने बताया कि जल्द ही मशीनों को लगाकर जिले में भी एक यूनिट ब्लड से चार को लाभ दिया जा सकेगा।
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चार गुने लोगों का बचेगा जीवन
ब्लड बैंक प्रभारी अकील खान का कहना है कि अब औसतन एक माह में ब्लड बैंक से चार सौ यूनिट रक्त दिया जाता है। इससे सिर्फ चार सौ की ही जान बचाई जा सकती है। यूनिट के काम करने के बाद एक यूनिट को चार जगह विभक्त कर चार की जान बचाई जा सकेगी। क्योंकि फिर यदि किसी रोगी केा प्लाज्मा या प्लेटलेट्स की जरूरत है तो उसे वही दिया जाएगा। आरबीसी, प्लाज्मा व क्रयाओ की बचत होगी।
चार सालों में इस तरह जिले से भेजे गए रिमाइंडर
. 16-10-2017 को पहला
.15-01-2018 को दूसरा
.27-06-2018 को तीसरा
.09-10-2020 को चौथा
.11-02-2021 को पांचवां
.20-05-2021 को छठवां
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जिले में अभी तक किसी रक्तदाता द्वारा दिया गया एक यूनिट रक्त सिर्फ एक की ही जान बचा सकता है। कंपोनेंट सेपरेटर यूनिट के कार्य करने के बाद इस एक यूनिट ब्लड को आरबीसी, प्लेट्लेट्स , प्लाज्मा व क्रयाओ में विभक्त किया जा सकता है। यानी एक यूनिट ब्लड जरूरत के हिसाब से चार लोगों के काम आ सकेगा। इसकी उपयोगिता को समझते हुए वर्ष 2016 में प्रदेश में आठ जिलों को कंपोनेंट सेपरेटर यूनिट की स्थापना के लिए चयनित किया गया था। यूनिट की स्थापना के लिए शासन स्तर से एक करोड़ का बजट भी आवंटित कर दिया गया था।
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नवंबर 2017 तक जिला चिकित्सालय के ब्लड बैंक के पीछे यूनिट की इमारत तैयार करवा दी गई है। इसके बाद से उपकरणों को लेकर इंतजार किया जा रहा था। चार साल के लंबे इंतजार के बाद भी अब तक यहां उपकरण नहीं उपलब्ध कराए जा सके थे। अमर उजाला ने रक्त की कमी को लेकर समय समय पर अभियान चलाया और स्वास्थ्य विभाग को भी चेताया। अमर उजाला ने 18 मई के अंक में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। जिसका संज्ञान लेकर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके शाक्य ने एक बार फिर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं महानिदेशक को अनुस्मारक पत्र भेजा था। उसी का नतीजा है कि जिले को यूनिट के लिए उपकरण प्राप्त हो गए हैं। लैब टेक्नीशियन मो. अकील खान ने बताया कि जल्द ही मशीनों को लगाकर जिले में भी एक यूनिट ब्लड से चार को लाभ दिया जा सकेगा।
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चार गुने लोगों का बचेगा जीवन
ब्लड बैंक प्रभारी अकील खान का कहना है कि अब औसतन एक माह में ब्लड बैंक से चार सौ यूनिट रक्त दिया जाता है। इससे सिर्फ चार सौ की ही जान बचाई जा सकती है। यूनिट के काम करने के बाद एक यूनिट को चार जगह विभक्त कर चार की जान बचाई जा सकेगी। क्योंकि फिर यदि किसी रोगी केा प्लाज्मा या प्लेटलेट्स की जरूरत है तो उसे वही दिया जाएगा। आरबीसी, प्लाज्मा व क्रयाओ की बचत होगी।
चार सालों में इस तरह जिले से भेजे गए रिमाइंडर
. 16-10-2017 को पहला
.15-01-2018 को दूसरा
.27-06-2018 को तीसरा
.09-10-2020 को चौथा
.11-02-2021 को पांचवां
.20-05-2021 को छठवां