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गर्म रेतीली मिट्टी को खस की खेती से किसान ने बनाया शीतल
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हरदोई। भरावन विकास खंड के ग्राम कुड़हा में पांच वर्ष पहले तक बलुई मिट्टी होने के कारण खाली पड़े रहने वाले खेतों की सूरत नौजवान किसान ने बदल दी और इसके साथ खुद की तकदीर भी बदल डाली। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे सुबोध मिश्रा ने खस की खेती कर दूसरे किसानों के लिए भी तरक्की की खुशबू फैलाई है।
भरावन ब्लाक के ग्राम कुड़हा में कई किसानों के खेत हैं। 2015 तक ये खेत बलुई मिट्टी होने के कारण खाली पड़े रहते थे। इसमें गन्ने जैसी अन्य फसलें भी नहीं उगाई जा सकती थीं। ऐसे ही खेतों को जाजूपुर निवासी सुबोध मिश्रा ने 2015 में वार्षिक किराये पर ले लिया। सुबोध एमए, बीएड करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं। छह एकड़ खेत में उन्होंने खस की खेती शुरू की और चार साल में ही वह 100 एकड़ क्षेत्रफल में खस की खेती कर रहे हैं। खस के खरीदार उनसे संपर्क करते हैं। आम तौर पर राजस्थान के भरतपुर और अजमेर के साथ ही दिल्ली के व्यापारी भी उनसे खस खरीदने आते हैं। खस की बुवाई दिसंबर से फरवरी तक की जाती है। खास बात ये है कि शुरुआती दौर में अगर खस की फसल को बचा लिया जाए तो बाद में इसे मवेशी भी नहीं चरते।
सुबोध मिश्रा ने बताया कि उन्हें खस के बारे में जानकारी नहीं थी, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान खस के बारे में पढ़ा। इसमें रुचि बढ़ी तो खस से जुड़ी अन्य जानकारियों को भी जुटाया और फिर रेतीली मिट्टी में प्रगति की खुशबू बिखेरने की ठान ली। नतीजा अब सबके सामने है। दूर-दूर से लोग खस की खेती के बारे में जानकारी जुटाने सुबोध के पास आते हैं।
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सुबोध मिश्रा ने बताया कि खस का उपयोग अलग-अलग तरह से होता है। इसका हर हिस्सा अलग उपयोगिता रखता है। एक ओर खस की टूटी डंडियां कूलर में लगाने के काम आती हैं ताकि हवा ठंडी और खुशबू अच्छी मिले। खस का तेल भी 12 हजार रुपये से 24 हजार रुपये लीटर तक होता है। खस के तेल का इस्तेमाल साबुन, पान मसाला, तेल, इत्र, कपड़ा बनाने में किया जाता है। चोट और मोच की मालिश में भी खस का तेल कारगर है।
एक एकड़ क्षेत्रफल में खस लगाने में लगभग 75 हजार रुपये लागत आती है। एक एकड़ में हुई फसल से करीब सात किलो खस का तेल मिलता है। तेल का भाव 18 हजार रुपये प्रति किलो होता है तो लगभग 50 हजार रुपये की बचत एक एकड़ खेत में हो जाती है। इससे इतर इसकी घास और जड़ भी बिक जाती है तो दूर-दूर से लोग इसकी बेड़ लेने के लिए भी आते हैं।
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भरावन ब्लाक के ग्राम कुड़हा में कई किसानों के खेत हैं। 2015 तक ये खेत बलुई मिट्टी होने के कारण खाली पड़े रहते थे। इसमें गन्ने जैसी अन्य फसलें भी नहीं उगाई जा सकती थीं। ऐसे ही खेतों को जाजूपुर निवासी सुबोध मिश्रा ने 2015 में वार्षिक किराये पर ले लिया। सुबोध एमए, बीएड करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं। छह एकड़ खेत में उन्होंने खस की खेती शुरू की और चार साल में ही वह 100 एकड़ क्षेत्रफल में खस की खेती कर रहे हैं। खस के खरीदार उनसे संपर्क करते हैं। आम तौर पर राजस्थान के भरतपुर और अजमेर के साथ ही दिल्ली के व्यापारी भी उनसे खस खरीदने आते हैं। खस की बुवाई दिसंबर से फरवरी तक की जाती है। खास बात ये है कि शुरुआती दौर में अगर खस की फसल को बचा लिया जाए तो बाद में इसे मवेशी भी नहीं चरते।
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सुबोध मिश्रा ने बताया कि उन्हें खस के बारे में जानकारी नहीं थी, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान खस के बारे में पढ़ा। इसमें रुचि बढ़ी तो खस से जुड़ी अन्य जानकारियों को भी जुटाया और फिर रेतीली मिट्टी में प्रगति की खुशबू बिखेरने की ठान ली। नतीजा अब सबके सामने है। दूर-दूर से लोग खस की खेती के बारे में जानकारी जुटाने सुबोध के पास आते हैं।
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सुबोध मिश्रा ने बताया कि खस का उपयोग अलग-अलग तरह से होता है। इसका हर हिस्सा अलग उपयोगिता रखता है। एक ओर खस की टूटी डंडियां कूलर में लगाने के काम आती हैं ताकि हवा ठंडी और खुशबू अच्छी मिले। खस का तेल भी 12 हजार रुपये से 24 हजार रुपये लीटर तक होता है। खस के तेल का इस्तेमाल साबुन, पान मसाला, तेल, इत्र, कपड़ा बनाने में किया जाता है। चोट और मोच की मालिश में भी खस का तेल कारगर है।
एक एकड़ क्षेत्रफल में खस लगाने में लगभग 75 हजार रुपये लागत आती है। एक एकड़ में हुई फसल से करीब सात किलो खस का तेल मिलता है। तेल का भाव 18 हजार रुपये प्रति किलो होता है तो लगभग 50 हजार रुपये की बचत एक एकड़ खेत में हो जाती है। इससे इतर इसकी घास और जड़ भी बिक जाती है तो दूर-दूर से लोग इसकी बेड़ लेने के लिए भी आते हैं।