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पिता के कातिल को उम्रकैद की सजा
अमर उजाला ब्यूराो/हरदोई
Updated Fri, 12 Aug 2016 11:09 PM IST
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11 साल से न्याय के लिए भटक रही है पीड़िता
- फोटो : Demo
पिहानी थाना क्षेत्र के हसनापुर ग्रंट अहेमी निवासी छोटे लाल के तीन पुत्र हैं। इसमें बड़े बेटे घनश्याम की शादी सुशीला से हुई और उसके दो बेटे व एक बेटी भी पैदा हुए। आरोप है कि बेटा-बेटी होने के बाद भी घनश्याम पड़ोसी महिला के साथ रहने लगा। जबकि उसकी पत्नी व बच्चे छोटेलाल के साथ रहते थे। घनश्याम की इस हरकत से नाराज छोटेलाल ने उसे अपनी 30 बीघा जमीन में हिस्सा नहीं दिया। इसी बात को लेकर 20 मई 2014 को घनश्याम ने अपने पिता छोटेलाल की पिटाई कर दी।
बचाने आई मां वीरावती एवं भाभी गौरा को भी पीटा। इस दौरान छोटेलाल की मौत हो गई। छोटेलाल के दूसरे बेटे अरविंद ने अपने ही भाई घनश्याम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। अदालत में चली सुनवाई के दौरान आरोपी घनश्याम के भाई अरविंद व मां वीरावती ने अपने बयान बदल दिए। अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी कर साक्ष्यों के आधार पर घनश्याम को अपने ही पिता की हत्या के अपराध का दोषी करार दिया। अदालत ने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी ने पिता की हत्या की है।
इसलिए समाज पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों के मद्देनजर आरोपी के प्रति नरमी बरतना उचित नहीं होगा। अदालत ने घनश्याम को पिता की हत्या के अपराध में आजीवन कारावास व तीन हजार रुपये अर्थदंड की भी सजा सुनाई। अदालत के समक्ष चले मुकदमे की अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता बजरंग बहादुर सिंह ने की।
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बचाने आई मां वीरावती एवं भाभी गौरा को भी पीटा। इस दौरान छोटेलाल की मौत हो गई। छोटेलाल के दूसरे बेटे अरविंद ने अपने ही भाई घनश्याम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। अदालत में चली सुनवाई के दौरान आरोपी घनश्याम के भाई अरविंद व मां वीरावती ने अपने बयान बदल दिए। अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी कर साक्ष्यों के आधार पर घनश्याम को अपने ही पिता की हत्या के अपराध का दोषी करार दिया। अदालत ने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी ने पिता की हत्या की है।
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इसलिए समाज पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों के मद्देनजर आरोपी के प्रति नरमी बरतना उचित नहीं होगा। अदालत ने घनश्याम को पिता की हत्या के अपराध में आजीवन कारावास व तीन हजार रुपये अर्थदंड की भी सजा सुनाई। अदालत के समक्ष चले मुकदमे की अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता बजरंग बहादुर सिंह ने की।
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