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नाग भी सिखाता ‘जीने की कला’
Hardoi
Updated Sun, 11 Aug 2013 05:35 AM IST
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‘हिंदू महीना सावन कालों के काल महाकाल यानी भगवान शिव की भक्ति का शुभ काल है। इसमें नाग पंचमी के रूप में नाग पूजा का भी विशेष दिन नियत है। नाग पंचमी का पर्व न सिर्फ उत्साह के साथ मनाया जाता है, बल्कि जानकारों ने इस पर्व पर मानव जाति को महाकाल का रूप कहें जाने वाले नाग से भी कुछ न कुछ सीख लेने की बात कहीं है। जानकारों का कहना है कि क्रूर कहें जाने के बाद भी सर्प जाति बुराई में भी अच्छाई ढूंढ निकालती है। मानव जाति इनकी कमियों को नहीं, बल्कि अच्छाइयों से सीख लेकर अपने चरित्र को और महान बना सकती है। बुराई में अच्छाई, दोष में गुण, नकारात्मकता में सकारात्मकता ढूंढ कर बुरे वक्त को अच्छे समय में बदल लेना ही मजबूत और महान चरित्र की पहचान है। हिंदू धर्म में ऐसा ही एक मौका है नाग पंचमी का। मानव जाति के लिए तो यह त्योहार श्रद्धा से भरा तो होता है और सर्प जाति की क्रूरता को भूल कहीं न कहीं मानव उनका पूजन करके महान चरित्र का परिचय देता है, पर इसके अलावा सर्प भी कहीं न कहीं मानव को कुछ न कुछ सिखा कर ही जाता है। जानकारों की माने, तो सर्प के स्वभाव, व्यवहार में भी ऐसी खूबियां हैं, जिन्हें इंसानी जीवन को बेहतर तरीके से साधा जा सकता है।’
हरदोई। नाग को क्रूर इसलिए कहा जाता है कि उसके एक बार ही काटने से पीड़ित व्यक्ति कुछ ही पलों में दम तोड़ देता है, पर इसके पीछे सर्प जाति का उद्देश्य कहीं न कहीं दूसरों को मृत्यु प्रदान करना नहीं, बल्कि अपनी रक्षा को डसना है। इसके अलावा उसमें सबसे अच्छी खासियत यही है कि वह स्वयं अपने आपको एकांत में अपने समुदाय के ही साथ ही रखता है और वहीं रहना पसंद करता है। अगर कहीं अपने बिलों से बाहर निकलता भी है, तो मानव की गंध सूंघ कर वह वापस लौट जाता है।
यह जानकारी देते हुए मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. राजेश मोहन दीक्षित ने कहा कि इसके अलावा पुराने समय से वह अपने आराध्य के साथ ही जुड़ा हुआ है। भगवान शिव के गले का आभूषण कहे जाने वाले नाग आज भी कई शिवलिंग हैं, जिनमें कहा जाता है कि वह अपने आराध्य शिव का पूजन व चरण वंदन करने जाते हैं। बहरहाल जान बूझकर किसी क ो नुकसान न पहुंचाने एवं अपने ईष्ट को कभी भी किसी सूरत में न छोड़ने की महानता यदि मानव जाति में भी विद्यमान हो जाए, तो इंसानी जीवन को और बेहतरी से जिया जा सकता है। उधर, नाग की मौत पर नागिन जमकर तांडव करती है। जहां नाग मारा जाता है, उस स्थल पर पहुंचकर नागिन न सिर्फ नाग की आंखों में देखकर मारने वालों की तसवीर उतार लेती है, बल्कि सभी को मौत के घाट भी उतारती है।
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ऐसी कहानियां न सिर्फ हमारे बीच हैं, बल्कि इन पर आधारित फिल्में भी बड़े चाव से देखी जाती हैं। सावन माह आते ही इन भ्रांतियों व कहावतों को एक बार फिर से बल मिल गया है, पर यह हैरानी होगी कि बदला लेने को नहीं, बल्कि नाग के शरीर से छूटी गंध का पीछा करते हुए नागिन वहां पहुंच जाती है। वैज्ञानिक तौर पर नागिन के क्रोध को दूसरे रूप में ही देखा जाता है। हिंदू धर्म में सावन माह शिव भक्ति का शुभ काल है। इस काल में शिव और उनके नाम, स्वरूप व शक्तियों का अलग रूपों, तरीकों से स्मरण किया जाता है। भगवान शिव को कालों का काल कहा जाता है। भगवान शिव के गले में नाग का हार पहनना और कंठ में विष उतारकर नीलकंठ बन जाना इसका प्रमाण है कि सर्प काल का ही रूप माना जाता है।
यही कारण है कि सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के पुष्प काल में नाग पंचमी 11 अगस्त पर नागों के देवता रूप में पूजा कर सुख शांति की कामना की जाएगी। यह दिन नाग जाति के जन्म का भी माना जाता है। सांपों से जुड़ी लोक मान्यता है कि सांप अपने साथी की मौत का बदला लेते हैं। यह भी कहा जाता है कि नागिन रास्ता दूर से ही देख लेती है और नाग के पास पहुंच जाती है, पर इसके पीछे उनकी सर्प प्रजाति की बनावट, उनकी विशेषताएं होती है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकार व विषय विशेषज्ञ नवनीत सिंह राठौर का कहना है कि असल में सांपों की सूंघने की शक्ति काफी तेज होती है। प्राकृतिक रूप से सांप अपने शरीर से एक गंध पदार्थ छोड़ते हैं। तेज क्षमता व गंध के प्रति संवेदनशील होने से दूर से आ रही इस गंध को सूंघकर वह सांप आ जाता है।
इंसेट---
यमदूती दाढ़ से काटने पर मिलती है मौत
हरदोई। सांप एक जीव है। जहरीले सांप की एक बूंद भी व्यक्ति की मौत का सबब बन सकती है, पर अपनी यह विशेषता जानने के बाद भी सर्प अपने आप मानव जाति के बीच आकर उनके जीवन को खतरा पैदा नहीं करता। उसके डसने के पीछे कई कारण हैं, जिनसे वह डसता है। बहरहाल चार दाढ़ों वाले सांप में यमदूत दाढ़ से काटा गया व्यक्ति सीधे मौत को प्राप्त करता है। सांप किसी के पैर के नीचे आ जाए, तो वह काट लेता है। कोई उसे मारने की कोशिश करे या सांप के बच्चे को कोई नुकसान पहुंचाए तो उसे वह काट लेता है। उन्मादी सांप भी किसी को डस सकता है। सांप के भूखे रहने पर भी यह स्थितियां देखी जा सकती है। सांप की चार दाढे़ं होती हैं, इनमें मकरी, कराली, कालरात्री एवं यमदूती दाढ़ शामिल है। यमदूती दाढ़ से काटने पर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
इंसेट---
नर्मदाषै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो: निशि...
हरदोई। सर्प जाति के लिए एक बात कही गई कि नदी का नाम लेते ही सांप भाग जाते हैं। हिंदू धर्म पंचांग में सावन से शुरू चार्तुमास के चार माह नाग जाति का प्रजनन व मिलन काल भी माना जाता है। इस दौरान बारिश के पानी से उनके प्राकृतिक आवास खत्म हो जाते हैं। शास्त्री उमाकांत अवस्थी का कहना है कि इस दौरान होने वाले टकराव के दौरान संकोची व संवेदनशील मानी जाने वाली नाग जाति का आत्मरक्षा को आक्रामक होकर अन्य जीवों के लिए प्राणघातक हो जाता है। विष्णु पुराण में यह लाइनें भी कहीं गई हैं कि शिव की पुत्री नर्मदा को माना गया है और सर्प शिव के आभूषण हैं, जिसके बाद नर्मदा का नाम आते ही वह स्थान छोड़ देते हैं। बहरहाल यह पंक्तियां कि नर्मदाषै नम प्रातर्नर्मदायै नमो निशि, नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहिं मां...। कहकर सर्प को वहां से हटाया जा सकता है।
इंसेट
‘वैज्ञानिक ऐसी भावना मानसिक धरातल पर सरिसर्प जाति में संभव नहीं मानता। वहीं मानव भावनाओं व मानसिक स्तर पर सांप में ज्यादा विकसित है, इसलिए मानव जाति को पुरानी भ्रांतियों को भूलकर नए सिरे से सोचना चाहिए। अपनी रक्षा अवश्य करें, पर सर्प को भी कुदरत का ही हिस्सा समझे। अनावश्यक इनको पकड़ पकड़ कर इनकी हत्याएं न करें।’ डा. राजेश मोहन दीक्षित, सीवीओ
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हरदोई। नाग को क्रूर इसलिए कहा जाता है कि उसके एक बार ही काटने से पीड़ित व्यक्ति कुछ ही पलों में दम तोड़ देता है, पर इसके पीछे सर्प जाति का उद्देश्य कहीं न कहीं दूसरों को मृत्यु प्रदान करना नहीं, बल्कि अपनी रक्षा को डसना है। इसके अलावा उसमें सबसे अच्छी खासियत यही है कि वह स्वयं अपने आपको एकांत में अपने समुदाय के ही साथ ही रखता है और वहीं रहना पसंद करता है। अगर कहीं अपने बिलों से बाहर निकलता भी है, तो मानव की गंध सूंघ कर वह वापस लौट जाता है।
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यह जानकारी देते हुए मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. राजेश मोहन दीक्षित ने कहा कि इसके अलावा पुराने समय से वह अपने आराध्य के साथ ही जुड़ा हुआ है। भगवान शिव के गले का आभूषण कहे जाने वाले नाग आज भी कई शिवलिंग हैं, जिनमें कहा जाता है कि वह अपने आराध्य शिव का पूजन व चरण वंदन करने जाते हैं। बहरहाल जान बूझकर किसी क ो नुकसान न पहुंचाने एवं अपने ईष्ट को कभी भी किसी सूरत में न छोड़ने की महानता यदि मानव जाति में भी विद्यमान हो जाए, तो इंसानी जीवन को और बेहतरी से जिया जा सकता है। उधर, नाग की मौत पर नागिन जमकर तांडव करती है। जहां नाग मारा जाता है, उस स्थल पर पहुंचकर नागिन न सिर्फ नाग की आंखों में देखकर मारने वालों की तसवीर उतार लेती है, बल्कि सभी को मौत के घाट भी उतारती है।
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ऐसी कहानियां न सिर्फ हमारे बीच हैं, बल्कि इन पर आधारित फिल्में भी बड़े चाव से देखी जाती हैं। सावन माह आते ही इन भ्रांतियों व कहावतों को एक बार फिर से बल मिल गया है, पर यह हैरानी होगी कि बदला लेने को नहीं, बल्कि नाग के शरीर से छूटी गंध का पीछा करते हुए नागिन वहां पहुंच जाती है। वैज्ञानिक तौर पर नागिन के क्रोध को दूसरे रूप में ही देखा जाता है। हिंदू धर्म में सावन माह शिव भक्ति का शुभ काल है। इस काल में शिव और उनके नाम, स्वरूप व शक्तियों का अलग रूपों, तरीकों से स्मरण किया जाता है। भगवान शिव को कालों का काल कहा जाता है। भगवान शिव के गले में नाग का हार पहनना और कंठ में विष उतारकर नीलकंठ बन जाना इसका प्रमाण है कि सर्प काल का ही रूप माना जाता है।
यही कारण है कि सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के पुष्प काल में नाग पंचमी 11 अगस्त पर नागों के देवता रूप में पूजा कर सुख शांति की कामना की जाएगी। यह दिन नाग जाति के जन्म का भी माना जाता है। सांपों से जुड़ी लोक मान्यता है कि सांप अपने साथी की मौत का बदला लेते हैं। यह भी कहा जाता है कि नागिन रास्ता दूर से ही देख लेती है और नाग के पास पहुंच जाती है, पर इसके पीछे उनकी सर्प प्रजाति की बनावट, उनकी विशेषताएं होती है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकार व विषय विशेषज्ञ नवनीत सिंह राठौर का कहना है कि असल में सांपों की सूंघने की शक्ति काफी तेज होती है। प्राकृतिक रूप से सांप अपने शरीर से एक गंध पदार्थ छोड़ते हैं। तेज क्षमता व गंध के प्रति संवेदनशील होने से दूर से आ रही इस गंध को सूंघकर वह सांप आ जाता है।
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यमदूती दाढ़ से काटने पर मिलती है मौत
हरदोई। सांप एक जीव है। जहरीले सांप की एक बूंद भी व्यक्ति की मौत का सबब बन सकती है, पर अपनी यह विशेषता जानने के बाद भी सर्प अपने आप मानव जाति के बीच आकर उनके जीवन को खतरा पैदा नहीं करता। उसके डसने के पीछे कई कारण हैं, जिनसे वह डसता है। बहरहाल चार दाढ़ों वाले सांप में यमदूत दाढ़ से काटा गया व्यक्ति सीधे मौत को प्राप्त करता है। सांप किसी के पैर के नीचे आ जाए, तो वह काट लेता है। कोई उसे मारने की कोशिश करे या सांप के बच्चे को कोई नुकसान पहुंचाए तो उसे वह काट लेता है। उन्मादी सांप भी किसी को डस सकता है। सांप के भूखे रहने पर भी यह स्थितियां देखी जा सकती है। सांप की चार दाढे़ं होती हैं, इनमें मकरी, कराली, कालरात्री एवं यमदूती दाढ़ शामिल है। यमदूती दाढ़ से काटने पर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
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नर्मदाषै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो: निशि...
हरदोई। सर्प जाति के लिए एक बात कही गई कि नदी का नाम लेते ही सांप भाग जाते हैं। हिंदू धर्म पंचांग में सावन से शुरू चार्तुमास के चार माह नाग जाति का प्रजनन व मिलन काल भी माना जाता है। इस दौरान बारिश के पानी से उनके प्राकृतिक आवास खत्म हो जाते हैं। शास्त्री उमाकांत अवस्थी का कहना है कि इस दौरान होने वाले टकराव के दौरान संकोची व संवेदनशील मानी जाने वाली नाग जाति का आत्मरक्षा को आक्रामक होकर अन्य जीवों के लिए प्राणघातक हो जाता है। विष्णु पुराण में यह लाइनें भी कहीं गई हैं कि शिव की पुत्री नर्मदा को माना गया है और सर्प शिव के आभूषण हैं, जिसके बाद नर्मदा का नाम आते ही वह स्थान छोड़ देते हैं। बहरहाल यह पंक्तियां कि नर्मदाषै नम प्रातर्नर्मदायै नमो निशि, नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहिं मां...। कहकर सर्प को वहां से हटाया जा सकता है।
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‘वैज्ञानिक ऐसी भावना मानसिक धरातल पर सरिसर्प जाति में संभव नहीं मानता। वहीं मानव भावनाओं व मानसिक स्तर पर सांप में ज्यादा विकसित है, इसलिए मानव जाति को पुरानी भ्रांतियों को भूलकर नए सिरे से सोचना चाहिए। अपनी रक्षा अवश्य करें, पर सर्प को भी कुदरत का ही हिस्सा समझे। अनावश्यक इनको पकड़ पकड़ कर इनकी हत्याएं न करें।’ डा. राजेश मोहन दीक्षित, सीवीओ