{"_id":"65a4511f8ef03ba83e0d6123","slug":"white-roli-disease-can-affect-production-up-to-80-percent-hapur-news-c-306-1-gha1001-4083-2024-01-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hapur News: सफेद रोली रोग हो सकता है 80 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hapur News: सफेद रोली रोग हो सकता है 80 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित
विज्ञापन
गढ़मुक्तेश्वर। मौसम बेहद सर्द होने, कोहरे समेत नमी के चलते सरसों की फसल में लगने वाला सफेद रोली (व्हाइट रस्ट) रोग उत्पादन को 80 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकता है। इससे बचाव के लिए किसानों को तैयारी करना बेहद जरूरी है।
कृषि विभाग के वरिष्ठ प्राविधिक सहायक सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि वातावरण में नमी और कोहरा सरसों का जायका खराब कर सकती है। वैसे तो सरसों की फसल में कुल छह रोग लगते हैं। जिनमें सफेद रोली, आर्द्रता गलन, अंगमारी, तुलासिता, तना सड़न और छाछया रोग शामिल हैं, लेकिन सफेद रोली से फसल बुरी तरह प्रभावित होती है। इस बार जनपद में लगातार मौसम खराब होने के चलते इस रोग का खतरा बढ़ने की संभावना लगातार बनी हुई है। यह भूमि और बीज जनित रोग है। फसल में अक्सर बोआई के 40-45 दिन बाद आता है, इससे पत्तियों पर नीचे की तरफ उभरे हुए छाले (फफोले)दिखाई देते हैं। फफोलों के फट जाने पर सफेद चूर्ण पौधे के अग्र भाग तक पहुंच जाता है, फूल व पत्ती विकृत हो जाती है। फलियां नहीं बनतीं, यदि फली बनती भी हैं तो उनमें दाने नहीं बनते। कुछ दिन बाद पौधा काला पड़कर सूख जाता है। व्हाइट रस्ट की चपेट में आकर फसल का उत्पादन 20 से 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि रोग से फसल को बचाव के लिए बीज को उपचारित करने के बाद ही बोना चाहिए। एक खेत में लगातार सरसों न बोएं। वहीं खड़ी फसल पर कॉर्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत और मैकोनजैव 63 प्रतिशत दोनों का एक साथ तीन ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
कृषि विभाग के वरिष्ठ प्राविधिक सहायक सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि वातावरण में नमी और कोहरा सरसों का जायका खराब कर सकती है। वैसे तो सरसों की फसल में कुल छह रोग लगते हैं। जिनमें सफेद रोली, आर्द्रता गलन, अंगमारी, तुलासिता, तना सड़न और छाछया रोग शामिल हैं, लेकिन सफेद रोली से फसल बुरी तरह प्रभावित होती है। इस बार जनपद में लगातार मौसम खराब होने के चलते इस रोग का खतरा बढ़ने की संभावना लगातार बनी हुई है। यह भूमि और बीज जनित रोग है। फसल में अक्सर बोआई के 40-45 दिन बाद आता है, इससे पत्तियों पर नीचे की तरफ उभरे हुए छाले (फफोले)दिखाई देते हैं। फफोलों के फट जाने पर सफेद चूर्ण पौधे के अग्र भाग तक पहुंच जाता है, फूल व पत्ती विकृत हो जाती है। फलियां नहीं बनतीं, यदि फली बनती भी हैं तो उनमें दाने नहीं बनते। कुछ दिन बाद पौधा काला पड़कर सूख जाता है। व्हाइट रस्ट की चपेट में आकर फसल का उत्पादन 20 से 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
विज्ञापन
सतीश चंद्र शर्मा ने बताया कि रोग से फसल को बचाव के लिए बीज को उपचारित करने के बाद ही बोना चाहिए। एक खेत में लगातार सरसों न बोएं। वहीं खड़ी फसल पर कॉर्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत और मैकोनजैव 63 प्रतिशत दोनों का एक साथ तीन ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।
विज्ञापन