गोरखपुर: जब मुस्लिम प्रोफेसर बने थे संस्कृत विभाग के प्रमुख, समर्थन में उतर गई थी छात्रों की भीड़
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सन् 1977 में वेद पढ़ाने के लिए दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग में सहायक प्रवक्ता के रूप में धोती और कुर्ता पहने अब्बास अली की नियुक्ति हुई थी, लेकिन हज यात्रा के बाद अली ने दाढ़ी बनानी शुरू की और उनकी पोशाक कुर्ता-पैजामा में बदल गई। उन्होंने 2010 तक विश्वविद्यालय में काम करना जारी रखा, और कुछ समय के लिए विभाग के प्रमुख भी रहे।
बीएचयू में संस्कृत विद्या धर्म विद्या संकाय में साहित्य विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में फिरोज खान की नियुक्ति विवाद मामले में हैरानी जताते हुए अली कहते हैं 1979 में एक नियमित शिक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए हिंदू छात्रों के समूह ने दो हिंदू शिक्षकों को दी गई वरीयता के विरोध में बनर्जी के कार्यालय की घेराबंदी कर दी थी।
उन्होंने नियमित शिक्षक के रूप में अपनी नियुक्ति सुनिश्चित की। उनके लिए उनके विभाग के प्रमुखों ने सुनिश्चित किया कि कक्षाएं उनकी प्रार्थनाओं से नहीं टकराएंगी। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम प्रोफेसर अपनी नौकरी के साथ अन्याय नहीं कर सकता है।
एक बार शिक्षक ने की थी सांप्रदायिक टिप्पणी
अली (72) बताते हैं कि उच्च वर्ग के लोगों की ओर से किए गए भेदभाव उन्हें याद नहीं हैं, लेकिन एक बार साथी शिक्षक ने उन पर सांप्रदायिक टिप्पणी की थी। लेकिन, उसके बाद उस शिक्षक ने भी टोपी पहनना शुरू कर दिया था।
अली ने बताया कि 1969 और 1971 में संस्कृत में बीए और एमए की दोनों परीक्षाओं में वे अव्वल थे। उन्होंने तत्कालीन विभागाध्यक्ष अतुल चंद्र बनर्जी के अधीन वैदिक और इस्लामी मिथकों के तुलनात्मक अध्ययन पर पीएचडी पूरी की, जिन्होंने उनकी नियुक्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अली 2010 में संस्कृत विभाग प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए। वे सर्वोच्च विभागीय पद संभालने वाले एकमात्र मुस्लिम प्रोफेसर थे। उन्होंने फिरोज खान मामले को लेकर नाराजगी जताते हुए कहा कि हमारे समय में ऐसी चीजें कभी नहीं हुईं। मुस्लिम होने के बावजूद, मैंने संस्कृत में उत्कृष्टता हासिल की और ब्राह्मणों के दबदबे वाले विभाग का प्रमुख भी बना।
डीडीयू के संस्कृत विभाग के वर्तमान प्रमुख मुरली मनोहर पाठक अली पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि वे एक सज्जन और एक विद्वान व्यक्ति थे। वे इतने परिश्रमी थे कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों में अपने घर महराजगंज से रोजाना 30 किमी से अधिक दूरी साइकिल से तय करते थे।