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कर्बला में दफन किए गए ताजिए
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Wed, 12 Oct 2016 08:57 PM IST
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मोहर्रम पर निकाली गई ताजिए की जुलूस।
- फोटो : Shivharsh Dwivedi
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हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 वीर साथियों की शहादत की याद में दसवीं मोहर्रम पर जुलूस की शक्ल में ताजियों के साथ अकीदतमंदों का हुजूम निकला। यह जुलूस इमाम चौकों से निकला, जहां उन्होंने नवीं मोहर्रम पर ताजियों को स्थापित कर रखा था। ताजियों को लेकर वे करबला पहुंचे और वहां उसे दफन करने की रवायत पूरी की।
ताजियों के साथ अकीदतमंदों के निकलने का सिलसिला 10 बजे के करीब शुरू हुआ। तरह-तरह के आकार के भव्य ताजियों के विभिन्न अखाड़ों के लोग करतब दिखाते चल रहे थे। कुछ युवा तो ऐसे-ऐसे करतब दिखा रहे थे कि लोगों को आश्चर्य चकित कर दे रहे थे। जुलूस में बैंडबाजे और शहनाई की मातमी धुन इमाम हुसैन की शहादत की लगातार याद दिला रही थी। कंकड़, गेहूं, अल्युमिनियम, बांस, कागज और शीशे के बने ताजिये लोगों का ध्यान बरबस खींच रहे थे। सड़कों पर पैकर घूम रहे थे, जो ताजिया देख दौड़कर पहुंच रहे थे और मोर पंख झलकर श्रद्धा व्यक्त कर रहे थे।
उधर, इस अवसर पर घर-घर फातिहा पढ़ने का सिलसिला भी जारी था। छोटे ताजिए दिन में निकले, जबकि बड़े ताजियों के निकलने का समय शाम से लेकर रात तक रहा। सभी ताजिये गोलघर, घंटाघर, रेती चौक, बक्शीपुर, बेनीगंज, ईदगाह रोड, जाफरा बाजार होते हुए करबला तक पहुंच रहे थे। ताजिया दफन करने के बाद जुलूस वापस अपने-अपने इमाम चौक तक आ रहा था, जहां उसके समाप्ति का एलान हो रहा था। सभी जुलूसों का नेतृत्व इमामबाड़ों के मुतवल्ली कर रहे थे। इस दौरान गरीबों में खाना, शर्बत, खिचड़ी भी बांटी गई। इससे पहले अकीदतमंदों ने गुस्ल किया और खुदा की इबादत की। तिलावत-ए-कलाम पाक किया गया और मजलिस लगी। इसमें इमाम हुसैन की कुर्बानी पर प्रकाश डाला गया।
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इस दौरान इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला गया तो माहौल गमगीन हो गया। सबने कहा कि हजरत इमाम हुसैन इंसानियत का पैगाम देने के लिए आए थे। उन्होंने अपने पूरे परिवार, 72 साथियों समेत खुद की कुर्बानी देकर इंसानियत को जिंदा रखा और गैर मुस्लिम और मुस्लिम सभी को इंसानियत के मायने बताए। अंजुमन हुसैनिया के जिलाध्यक्ष सिब्ते हसन रिजवी ने बताया कि दस मोहर्रम के दिन नमाज तक कुछ भी न खाने वाले शिया समुदाय के लोगों ने भुने हुए अनाज, जिनमें चना, जौ, गेहूं आदि शामिल था, खाया और पानी पिया।
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ताजियों के साथ अकीदतमंदों के निकलने का सिलसिला 10 बजे के करीब शुरू हुआ। तरह-तरह के आकार के भव्य ताजियों के विभिन्न अखाड़ों के लोग करतब दिखाते चल रहे थे। कुछ युवा तो ऐसे-ऐसे करतब दिखा रहे थे कि लोगों को आश्चर्य चकित कर दे रहे थे। जुलूस में बैंडबाजे और शहनाई की मातमी धुन इमाम हुसैन की शहादत की लगातार याद दिला रही थी। कंकड़, गेहूं, अल्युमिनियम, बांस, कागज और शीशे के बने ताजिये लोगों का ध्यान बरबस खींच रहे थे। सड़कों पर पैकर घूम रहे थे, जो ताजिया देख दौड़कर पहुंच रहे थे और मोर पंख झलकर श्रद्धा व्यक्त कर रहे थे।
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उधर, इस अवसर पर घर-घर फातिहा पढ़ने का सिलसिला भी जारी था। छोटे ताजिए दिन में निकले, जबकि बड़े ताजियों के निकलने का समय शाम से लेकर रात तक रहा। सभी ताजिये गोलघर, घंटाघर, रेती चौक, बक्शीपुर, बेनीगंज, ईदगाह रोड, जाफरा बाजार होते हुए करबला तक पहुंच रहे थे। ताजिया दफन करने के बाद जुलूस वापस अपने-अपने इमाम चौक तक आ रहा था, जहां उसके समाप्ति का एलान हो रहा था। सभी जुलूसों का नेतृत्व इमामबाड़ों के मुतवल्ली कर रहे थे। इस दौरान गरीबों में खाना, शर्बत, खिचड़ी भी बांटी गई। इससे पहले अकीदतमंदों ने गुस्ल किया और खुदा की इबादत की। तिलावत-ए-कलाम पाक किया गया और मजलिस लगी। इसमें इमाम हुसैन की कुर्बानी पर प्रकाश डाला गया।
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लाइन की ताजिया रहीं आकर्षण व श्रद्धा का केंद्र
यौमे आशूर यानी दस मोहर्रम का सूरज डूबा तो शामे गरीबां आ गई। कर्बला में हुसैन और उनके साथियों की शहादत के बाद उनके खेमे जला दिए गए। दस मोहर्रम पर बुधवार की सुबह से जुलूसों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह रात भर जारी रहा। इस दौरान लगभग सभी प्रमुख सड़कों पर भीड़ उमड़ी रही। सड़कें ताजियों के जुलूस से गुलजार रहीं और हर लबों पर या हुसैन की सदाएं रही। लाईन की ताजिया लोगों के विशेष आकर्षण व श्रद्धा का केंद्र रहीं जो सबसे लंबी और खूबसूरत होती हैं। हस्तकला की बेहतरीन मिसाल पेश करने वाले ये ताजिये सभी की श्रद्धा व आकर्षण का केंद्र थे। तुर्कमानपुर नूरी मस्जिद में मजलिस जिक्र-ए- शोहदा-ए-करबला का आयोजन हुआ। इसके बाद लंगर बांटा गया। मोहल्ला रसूलपुरए जमुनहिया, गोरखनाथ, हुमायूंपुर, रेलवे स्टेशन, जटेपुर, शाहपुर घोसीपुरवा, अंधियारी बाग, जाफरा बाजार समेत विभिन्न इमाम चौकों से निकले जुलूस सुबह से ही सड़कों पर दिखाई देने लगे थे।नदी में विसर्जित किए गए शिया समुदाय के ताजिये
यौमे अशूर यानी मोहर्रम की दसवीं पर बुधवार को शिया समुदाय के लोग मातमी जुलूस के साथ अपने ताजिया लेकर राजघाट पहुंचे और राप्ती नदी में विसर्जित किया। इस जुलूस में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए अकीदतमंद नौहाख्वानी, मर्सिया पढ़ते हुए मातम कर रहे थे। जुलूस इमामबाड़ा आगा खां साहेबान से निकला और रेती चौक, घंटाघर, बसंतपुर होते हुए राजघाट पहुंचा, जहां ताजिये के विसर्जन की रवायत पूरी की गई। विसर्जन के बाद अकीदतमंद शाम को शेखपुर स्थित इमामबाड़ा पहुंचे, जहां खादिम कदा मेें शाम-ए-गरीबां का आयोजन हुआ। यहां बिल्कुल अंधेरा किया गया था, रोशनी का नितांत अभाव था।इस दौरान इमाम हुसैन की शहादत पर प्रकाश डाला गया तो माहौल गमगीन हो गया। सबने कहा कि हजरत इमाम हुसैन इंसानियत का पैगाम देने के लिए आए थे। उन्होंने अपने पूरे परिवार, 72 साथियों समेत खुद की कुर्बानी देकर इंसानियत को जिंदा रखा और गैर मुस्लिम और मुस्लिम सभी को इंसानियत के मायने बताए। अंजुमन हुसैनिया के जिलाध्यक्ष सिब्ते हसन रिजवी ने बताया कि दस मोहर्रम के दिन नमाज तक कुछ भी न खाने वाले शिया समुदाय के लोगों ने भुने हुए अनाज, जिनमें चना, जौ, गेहूं आदि शामिल था, खाया और पानी पिया।