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मैं पुरानी जेल, मुझमें महफूज हैं शहादत की कई निशानियां

Wed, 10 May 2017 01:40 AM IST
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर।
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Wed, 10 May 2017 01:40 AM IST
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Story of old jail
1857 की क्रांति में पुरानी जेल के इसी पाकड़ पर अंग्रजों ने 300 लोगों को फांसी पर लटकाया था। - फोटो : Amar Ujala
मैं पुरानी जेल हूं। जब भी मई आती है, मुझे वतन की आजादी के दीवानों की याद आ जाती है। दर-ओ-दीवार पर पड़े लहू के छींटें ताजा हो उठते हैं और मैं अपने वजूद पर तड़प उठती हूं। तभी जेहन में फांसी के फंदे को चूमते मां भारती के लाडलों के चेहरे चमक जाते हैं और मैं क्रांति की गौरवगाथा की साक्षी होने के सौभाग्य पर गर्व से भर जाती हूं। मां भारती के जयघोष के साथ सैकड़ों शूरवीरों ने मेरे दामन में कुर्बानी दी। अपने लहू से सींचकर उन्होंने मुझे जो गौरवशाली इतिहास दिया, उसे मैं एक पल को भी नहीं भूली। हालांकि आज वक्त की मार से मैं अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हूं। फिर भी अपने आगोश में मैंने 1857 की शहादत की कई निशानियां अब भी महफूज रखी हैं।
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किसी जमाने में मेरी पहचान राजा बसंत सिंह के किले की थी। अंग्रेज आए तो मुझे जेल बना डाला। कभी मुझे मोती जेल नाम मिला, जो पुरानी जेल में बदल गया। जब मंगल पांडेय ने मेरठ में जंग-ए-आजादी की मशाल फूंकी तो उसकी चिंगारी से मैं भी रोशन हो उठी। मेरे जेलर मिर्जा आगा इब्राहीम बेग ने हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर सभी कैदियों को आजाद कर दिया और खुद भूमिगत हो गए। सदियों के अपने सफर में मुझे तब सदमा लगा, जब मेरी चौहद्दी को शीतल करने वाले पाकड़ पर तीन सौ लोगों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। क्रांतिकारी सरफराज को पकड़ने में नाकाम रहने पर अंग्रेजी सरकार ने मां भारती के इन बेटों को उनके करीबी होने के शक में ये सजा दी थी।
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मैंने अमर शहीद बंधू सिंह के आगे हारे फांसी के फंदे को भी देखा। एक के बाद एक सात बार मेरे कुएं की जगत पर लगा फांसी का फंदा टूटा। जब बंधू सिंह ने मां भगवती से अपने लिए शहादत मांगी, तब जाकर उनकी फांसी पूरी हो सकी थी। कभी मैं 1857 की क्रांति के सिपाही राजा शाह इनायत अली की फांसी पर तड़पी तो कभी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को कैद करके। मुझे मगध से लाए गए मगहिया डोमों की कई पीढ़ियों को कैद रखने का अफसोस भी है, जो 1952 तक मुझमें कैद रहे। उन पर हुए हर जुल्म-ओ-सितम की मैं गवाह भी हूं। अब मैं जेल नहीं हूं और मगहिया डोमों के परिवार भी आजाद हैं। पुश्तें गुजारने वाले इन परिवारों की मुझमें यादें बसी हैं। ऐसे में आज भी मैं इन भूमिहीन परिवारों का आसरा बनी हुई हूं।
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