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‘गठबंधन’ ने बदली सियासी धारा
राजन राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Thu, 15 Mar 2018 12:26 AM IST
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जीत पर जश्न मनाते सपा-बसपा के कार्यकर्ता।
- फोटो : Amar Ujala
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जिस गठबंधन की प्रचार में भाजपा-कांग्रेस स्वार्थी, कमजोर और न जाने क्या-क्या कहते रहे, उसी ने बाजी पलट दी। गोरखपुर संसदीय सीट पर तीन दशक से तनकर खड़ा भगवा किला ध्वस्त हो गया। सपा उम्मीदवार प्रवीण निषाद ने बसपा की मदद से भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ला को शिकस्त देकर गोरखनाथ मंदिर के प्रभाव वाली सीट पर सियासी धारा बदलने का संदेश भी दे दिया है। भाजपा की हार में कम मतदान और खास तरह के जातीय ध्रुवीकरण ने भी बड़ी भूमिका निभाई।
चुनाव के आखिरी दौर में बसपा ने सपा को समर्थन देकर सियासी माहौल बनाने में मदद की। भाजपा के क्षत्रप सपा-बसपा के गठजोड़ से होने वाले बदलाव को भांप न सके। निष्ठावान कार्यकर्ता उपेंद्र शुक्ल के रूप में भाजपा का ब्राह्मण कार्ड फेल हो गया पर सपा-बसपा को पारंपरिक साथ निषाद वोटों का साथ मिला। मुस्लिम, यादव, निषाद और दलित वोटरों के गठजोड़ का प्रयोग सफल हुआ ही उसने पिछड़े वर्ग के वोटों में भी सेंध लगा ली।
नतीजा सामने है कि जिस सीट पर गोरक्षपीठ के आशीर्वाद के बगैर जीत हासिल करना कल्पना से परे था वहां भारी उलटफेर हो गया। भाजपा के गढ़ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट पर फतह ने विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त से निराश सपा-बसपा कार्यकर्ताओं को ऑक्सीजन मिल गया। पहली ही लड़ाई में गठबंधन की जीत से वे जोश लबरेज हैं। लाल टोपी में बसपा का झंडा लिए सपा कार्यकर्ता नारे लगाते रहे तो बसपा का दुपट्टा ओढ़े महिला कार्यकर्ता सपा के झंडे के साथ मायावती और अखिलेश की जय बोल रही थीं। कार्यकर्ताओं में इसी शानदार तालमेल से मिली जीत ने भविष्य में महागठबंधन की मजबूत आधार भी दे दिया है।
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25 साल बाद हुई दोस्ती रंग लाई
यूपी की सियासत में वर्ष 1993 में सपा-बसपा के गठबंधन ने सभी समीकरण ध्वस्त कर दिए थे और गठबंधन की सरकार बनी थी। करीब 25 साल बाद बुआ-भतीजे का साथ मिला तो भाजपा का किला ढह गया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी चुनावी सभा में कार्यकर्ताओं को एक साथ रहकर किसी बहकावे में न आने की जो सलाह दी थी, उसके कई मायने थे। मतों के ध्रुवीकरण को बखूबी भांपने वाले अखिलेश को पता था कि जातिगत समीकरण के बलबूते ही योगी के विरासत वाली सीट छीन सकते हैं। इसीलिए कार्यकर्ताओं को बार-बार एकजुट होकर वोट डालने की नसीहत देते रहे।
खामोशी से अपना काम कर गए बसपाई
चुनावी शोरगुल में बसपा कार्यकर्ताओं ने खामोशी से अपना काम कर दिया। परंपरागत वोटों को सहेजने के लिए दलित बस्तियों में डेरा डालने की पार्टी की रणनीति कारगर रही। मतों को सहेजने से लेकर मतदान कराने तक वे अपनी रणनीति के मुताबिक काम करते रहे और सपा को जिताने में अहम भूमिका निभाई। सपा को समर्थन देने के बाद से ही बसपा पदाधिकारियों ने बैठकें कर कार्यकर्ताओं को रणनीति समझाना शुरू कर दिया था। सेक्टर से लेकर बूथ स्तर पर पदाधिकारी पार्टी का संदेश दलित मतदाताओं को देते रहे। बसपा महानगर अध्यक्ष संजय पांडेय ने बताया कि चुनाव प्रचार के दौरान हो-हल्ला से हमने परहेज किया और अपने वोटरों के घर जाकर उन्हें बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का संदेश देकर मतदान के लिए प्रेरित किया। हमारी रणनीति कामयाब हुई और रिजल्ट बसपा समर्थित सपा प्रत्याशी के पक्ष में गया।
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चुनाव के आखिरी दौर में बसपा ने सपा को समर्थन देकर सियासी माहौल बनाने में मदद की। भाजपा के क्षत्रप सपा-बसपा के गठजोड़ से होने वाले बदलाव को भांप न सके। निष्ठावान कार्यकर्ता उपेंद्र शुक्ल के रूप में भाजपा का ब्राह्मण कार्ड फेल हो गया पर सपा-बसपा को पारंपरिक साथ निषाद वोटों का साथ मिला। मुस्लिम, यादव, निषाद और दलित वोटरों के गठजोड़ का प्रयोग सफल हुआ ही उसने पिछड़े वर्ग के वोटों में भी सेंध लगा ली।
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नतीजा सामने है कि जिस सीट पर गोरक्षपीठ के आशीर्वाद के बगैर जीत हासिल करना कल्पना से परे था वहां भारी उलटफेर हो गया। भाजपा के गढ़ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट पर फतह ने विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त से निराश सपा-बसपा कार्यकर्ताओं को ऑक्सीजन मिल गया। पहली ही लड़ाई में गठबंधन की जीत से वे जोश लबरेज हैं। लाल टोपी में बसपा का झंडा लिए सपा कार्यकर्ता नारे लगाते रहे तो बसपा का दुपट्टा ओढ़े महिला कार्यकर्ता सपा के झंडे के साथ मायावती और अखिलेश की जय बोल रही थीं। कार्यकर्ताओं में इसी शानदार तालमेल से मिली जीत ने भविष्य में महागठबंधन की मजबूत आधार भी दे दिया है।
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25 साल बाद हुई दोस्ती रंग लाई
यूपी की सियासत में वर्ष 1993 में सपा-बसपा के गठबंधन ने सभी समीकरण ध्वस्त कर दिए थे और गठबंधन की सरकार बनी थी। करीब 25 साल बाद बुआ-भतीजे का साथ मिला तो भाजपा का किला ढह गया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी चुनावी सभा में कार्यकर्ताओं को एक साथ रहकर किसी बहकावे में न आने की जो सलाह दी थी, उसके कई मायने थे। मतों के ध्रुवीकरण को बखूबी भांपने वाले अखिलेश को पता था कि जातिगत समीकरण के बलबूते ही योगी के विरासत वाली सीट छीन सकते हैं। इसीलिए कार्यकर्ताओं को बार-बार एकजुट होकर वोट डालने की नसीहत देते रहे।
खामोशी से अपना काम कर गए बसपाई
चुनावी शोरगुल में बसपा कार्यकर्ताओं ने खामोशी से अपना काम कर दिया। परंपरागत वोटों को सहेजने के लिए दलित बस्तियों में डेरा डालने की पार्टी की रणनीति कारगर रही। मतों को सहेजने से लेकर मतदान कराने तक वे अपनी रणनीति के मुताबिक काम करते रहे और सपा को जिताने में अहम भूमिका निभाई। सपा को समर्थन देने के बाद से ही बसपा पदाधिकारियों ने बैठकें कर कार्यकर्ताओं को रणनीति समझाना शुरू कर दिया था। सेक्टर से लेकर बूथ स्तर पर पदाधिकारी पार्टी का संदेश दलित मतदाताओं को देते रहे। बसपा महानगर अध्यक्ष संजय पांडेय ने बताया कि चुनाव प्रचार के दौरान हो-हल्ला से हमने परहेज किया और अपने वोटरों के घर जाकर उन्हें बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का संदेश देकर मतदान के लिए प्रेरित किया। हमारी रणनीति कामयाब हुई और रिजल्ट बसपा समर्थित सपा प्रत्याशी के पक्ष में गया।