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गोजए में हुआ जल संकट पर रोक के लिए मंथन
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Wed, 04 May 2016 09:08 PM IST
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गोजए में संगोष्ठी के दौरान मौजूद लोग।
- फोटो : mahesh kumar
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तेजी से बढ़ रही पानी की कमी को लेकर गोजए में बुधवार को आयोजित ‘गोरखपुर-गहराता जल संकट’ विषयक गोष्ठी में शहर के तमाम बुद्धिजीवियों और पर्यावरणविद ने मंथन किया। इस दौरान पानी के संकट की वजहों से लेकर उसपर रोकथाम के तमाम उपाय बताए गए। सभी ने संकल्प लिया कि वे पानी की बर्बादी को लेकर खुद तो जागरूक होंगे ही दूसरों को भी इस समस्या की गंभीरता से अवगत कराते हुए उन्हें भी जागरूक करेंगे।
नगर विधायक डॉ राधामोहन दास अग्रवाल ने कहा कि पानी की बर्बादी रोकने के लिए खेती के साथ ही उद्योग नीति में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसी खेती पर जोर देना होगा, जिनमें पानी की खपत कम हो। ऐसे ही बदलाव की जरूरत उद्योगों में भी है। उन्होंने चीन और मिश्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां चीन ज्यादा पानी की खपत वाले गन्ने की खेती से गुरेज करता है वहीं मिश्र के पास पर्याप्त पानी होने के बाद भी धान-गेहूं की खेती नहीं की जाती।
उन्होंने कहा कि जिम्मेदारों की लापरवाही से मल्टीस्टोरी बनाने वाले बिना वजह पानी की अंधाधुंध बर्बादी कर रहे हैं, जबकि इतने पानी के दोहन की कोई तकनीकी आवश्यकता ही नहीं है। यही नहीं, वाटर हारवेस्टिंग भी सिर्फ कागज तक ही सीमित होकर रह गई है। ऐसे में अगर पानी के संकट से उबरने के लिए सभी को एकजुट होकर प्रयास करना होगा। लोगों को जहां जागरूक होना होगा वहीं पानी की बर्बादी पर प्रभावी रोक के लिए सरकारी मशीनरी को सख्त होने की जरूरत है।
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गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पर्यावरणविद् डा. शिराज वजीह ने कहा कि पानी किसी की व्यक्तिगत संपदा नहीं है। दोहन का अपराध कुछ लोग करते हैं और खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि भूजल का सर्वाधिक इस्तेमा कृषि कार्य में होता है। अनियोजित कृषि भी जलस्तर के नीचे जाने का एक बड़ा कारण है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब में भूजल पहले से ही काफ ी नीचे रहा है, वहां धान की खेती ने इसे और बढ़ाने का काम किया है।
विषय प्रवर्तन करते हुए गोजए अध्यक्ष रत्नाकर सिंह ने कहा कि विकास के क्रम में आज भूजल का जिस प्रकार दोहन किया जा रहा है और इसकी नियंत्रक एजेंसियां जिस प्रकार खामोश हैं, यह स्थिति आने वाले समय में इस क्षेत्र को भी लातूर बना सकती है। गोष्टी में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के उपाचार्य प्रो. केएन सिंह, इंजीनियर सतीश सिंह, इंजीनियर जगदीश और मनोज सिंह ने भी संबोधित किया।
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नगर विधायक डॉ राधामोहन दास अग्रवाल ने कहा कि पानी की बर्बादी रोकने के लिए खेती के साथ ही उद्योग नीति में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसी खेती पर जोर देना होगा, जिनमें पानी की खपत कम हो। ऐसे ही बदलाव की जरूरत उद्योगों में भी है। उन्होंने चीन और मिश्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां चीन ज्यादा पानी की खपत वाले गन्ने की खेती से गुरेज करता है वहीं मिश्र के पास पर्याप्त पानी होने के बाद भी धान-गेहूं की खेती नहीं की जाती।
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उन्होंने कहा कि जिम्मेदारों की लापरवाही से मल्टीस्टोरी बनाने वाले बिना वजह पानी की अंधाधुंध बर्बादी कर रहे हैं, जबकि इतने पानी के दोहन की कोई तकनीकी आवश्यकता ही नहीं है। यही नहीं, वाटर हारवेस्टिंग भी सिर्फ कागज तक ही सीमित होकर रह गई है। ऐसे में अगर पानी के संकट से उबरने के लिए सभी को एकजुट होकर प्रयास करना होगा। लोगों को जहां जागरूक होना होगा वहीं पानी की बर्बादी पर प्रभावी रोक के लिए सरकारी मशीनरी को सख्त होने की जरूरत है।
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गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पर्यावरणविद् डा. शिराज वजीह ने कहा कि पानी किसी की व्यक्तिगत संपदा नहीं है। दोहन का अपराध कुछ लोग करते हैं और खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि भूजल का सर्वाधिक इस्तेमा कृषि कार्य में होता है। अनियोजित कृषि भी जलस्तर के नीचे जाने का एक बड़ा कारण है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब में भूजल पहले से ही काफ ी नीचे रहा है, वहां धान की खेती ने इसे और बढ़ाने का काम किया है।
विषय प्रवर्तन करते हुए गोजए अध्यक्ष रत्नाकर सिंह ने कहा कि विकास के क्रम में आज भूजल का जिस प्रकार दोहन किया जा रहा है और इसकी नियंत्रक एजेंसियां जिस प्रकार खामोश हैं, यह स्थिति आने वाले समय में इस क्षेत्र को भी लातूर बना सकती है। गोष्टी में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के उपाचार्य प्रो. केएन सिंह, इंजीनियर सतीश सिंह, इंजीनियर जगदीश और मनोज सिंह ने भी संबोधित किया।