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‘मनुष्य बने रहने के लिए लोक साहित्य की जरूरत’

Mon, 20 Mar 2017 01:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Updated Mon, 20 Mar 2017 01:09 AM IST
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Seminar in gorakhpur University by UGC
गोरखपुर यूनिवर्सिटी में सेमिनार के दौरान मौजूद लोग। - फोटो : Amar Ujala
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से गोरखपुर यूनिवर्सिटी में ‘लोक साहित्य अवधारणा एवं स्वरूप’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को हुआ। वक्ताओं ने लोक साहित्य के कई महत्वपूर्ण पहलुओं से विद्यार्थियों को अवगत कराया। हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा पत्रकारिता विभाग की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी को कई विद्वानों ने संबोधित किया।
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राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह पर प्रो. मंजू त्रिपाठी ने कहा कि लोक साहित्य में चेतना का केंद्र लोक है और लोक का दर्शन-सर्वेक्षण करने वाला ही लोक साहित्य होता है। वर्तमान समय में मनुष्य बने रहने के लिए लोक साहित्य की बहुत आवश्यकता है। इसी बीच राम चंद्र त्रिपाठी ने ‘हिरनी का गीत’ गाकर समां बांधा। शांति निकेतन के आचार्य हरीश चंद्र मिश्र ने कहा कि जिस प्रकार से धीरे-धीरे गरीब के हौसले छोटे हो गए। उसी प्रकार लोक साहित्य के सामने भी कई चुनौतियां आ गई हैं।
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उन्होंने कहा कि सब कुछ लोक में ही है। परलोक की चर्चा भी लोक में ही होती है। उन्होंने अपने समय के लोक साहित्य के अध्ययन की चर्चा की और कहा कि लोकगीतों में सभी प्राचीन परंपराएं मिल जाती हैं। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य सबको अपने रंग में रंग लेती है। 
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