{"_id":"58811be54f1c1b701befe770","slug":"school-s-vehicles-break-the-rule","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्कूली वाहनों में हो रहा सुरक्षा से खिलवाड़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्कूली वाहनों में हो रहा सुरक्षा से खिलवाड़
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Fri, 20 Jan 2017 01:34 AM IST
विज्ञापन
रिक्शे पर इस तरह बैठकर जाते स्कूल जाते हैं बच्चे।
- फोटो : Shivharsh Dwivedi
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एटा में हुए हादसे में 12 बच्चों की मौत के बाद एक बार फिर बच्चों को स्कूल ले जाने वाले वाहनों को लेकर बहस छिड़ गई है। भले ही प्रशासन दावा करता हो कि स्कूली वाहनों की समय-समय पर जांच की जाती है। कार्रवाई भी होती है, लेकिन हकीकत इससे परे है। यहां भी बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर स्कूली वाहन दौड़ लगा रहे हैं। वाहनों में न केवल क्षमता से अधिक बच्चे बैठाए जा रहे हैं, बल्कि खटारा किस्म की गाड़ियां भी इस्तेमाल में लाई जा रही हैं। स्कूल प्रबंधक भी इसे लेकर उतने गंभीर नहीं हैं और अभिभावक भी ध्यान नहीं देते।
अधिकांश वाहनों में फॉग लाइट होती ही नहीं। इसकी वजह बताई जाती है कि बच्चोें को लाने और ले-जाने का काम दिन में होता है। यहां बता दें कि एटा में भी स्कूली बच्चे दिन के समय कोहरे के चलते हादसे के शिकार हो गए। स्कूली बसों में चालक के अलावा कम से कम दो अटेंडेंड होने चाहिए, मगर स्कूल प्रबंधन खर्चा बचाने के लिए एक ही अटेंडेंट रखते हैं। ज्यादातर छोटे वाहनों जैसे वैन, मैक्सी कैब, टैंपो, ऑटो आदि में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जाता है। जिस रिक्शे पर दो आदमी बैठ पाते हैं उसपर दस-दस बच्चे और उनके बैग टंग कभी भी देखा जा सकता है, लेकिन इसके बाद भी जिला प्रशासन और परिवहन महकमा कोई कार्रवाई नहीं करता। आरटीओ दफ्तर की रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर में 1028 स्कूली वाहन, नौ हजार 600 ऑटो रिक्शा और करीब 2500 छोटे यात्री वाहन (छोटा हाथी) पंजीकृत हैं।
नहीं होती फिटनेस की जांच
केवल शहरी क्षेत्र मेें चलने से कई स्कूल प्रबंधन पुरानी और खटारा किस्म की बसों को सस्ते दाम में खरीद लेते हैं। बाद में उसे पीले रंग में रंगाकर सड़क पर उतार देते हैं। बसों की मरम्मत पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता। इन वाहनों की फिटनेस की जांच के प्रति भी विभाग गंभीर नहीं है। कहीं कोई घटना हो जाती है तो दो-चार दिन सक्रियता दिखाई जाती है, उसके बाद सब शांत हो जाते हैं।
विज्ञापन
आग से बचाव के इंतजाम नहीं
जिले में कई टैंपो और वैन पांच किलो वाले गैस सिलेंडर से चलाए जा रहे हैं, जबकि कई गाड़ियां घरेलू गैस सिलेंडर से। इन वाहनों में आग से बचाव के भी इंतजाम नहीं होते। ऐसे में कभी भी हादसे से इंकार नहीं किया जा सकता।
स्कूली वाहनों के लिए मानक
- स्कूली बस में फर्स्ट एंड बॉक्स होना चाहिए
- सुरक्षा के लिए बस की खिड़कियों पर मजबूत रॉड लगी होनी चाहिए
- चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस, पहचान पत्र और वाहन के कागजात होने चाहिए
- चालक के पास विद्यालय की ओर से जारी प्रमाण पत्र भी होना जरूरी है
- स्कूली वाहन पीले रंग का होना चाहिए
- वाहनों पर स्कूल का नाम, प्रबंधक और प्रधानाचार्य का फोन नंबर, हेल्पलाइन नंबर लिखा होना चाहिए
- वाहन का फिटनेस प्रमाण पत्र होना तो अनिवार्य है
विभाग की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर स्कूली वाहनों की जांच की जाती है। मानक के विपरीत मिलने पर कार्रवाई भी की जाती है।
- राकेश सिंह, संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन)
विज्ञापन
अधिकांश वाहनों में फॉग लाइट होती ही नहीं। इसकी वजह बताई जाती है कि बच्चोें को लाने और ले-जाने का काम दिन में होता है। यहां बता दें कि एटा में भी स्कूली बच्चे दिन के समय कोहरे के चलते हादसे के शिकार हो गए। स्कूली बसों में चालक के अलावा कम से कम दो अटेंडेंड होने चाहिए, मगर स्कूल प्रबंधन खर्चा बचाने के लिए एक ही अटेंडेंट रखते हैं। ज्यादातर छोटे वाहनों जैसे वैन, मैक्सी कैब, टैंपो, ऑटो आदि में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जाता है। जिस रिक्शे पर दो आदमी बैठ पाते हैं उसपर दस-दस बच्चे और उनके बैग टंग कभी भी देखा जा सकता है, लेकिन इसके बाद भी जिला प्रशासन और परिवहन महकमा कोई कार्रवाई नहीं करता। आरटीओ दफ्तर की रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर में 1028 स्कूली वाहन, नौ हजार 600 ऑटो रिक्शा और करीब 2500 छोटे यात्री वाहन (छोटा हाथी) पंजीकृत हैं।
विज्ञापन
नहीं होती फिटनेस की जांच
केवल शहरी क्षेत्र मेें चलने से कई स्कूल प्रबंधन पुरानी और खटारा किस्म की बसों को सस्ते दाम में खरीद लेते हैं। बाद में उसे पीले रंग में रंगाकर सड़क पर उतार देते हैं। बसों की मरम्मत पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता। इन वाहनों की फिटनेस की जांच के प्रति भी विभाग गंभीर नहीं है। कहीं कोई घटना हो जाती है तो दो-चार दिन सक्रियता दिखाई जाती है, उसके बाद सब शांत हो जाते हैं।
विज्ञापन
आग से बचाव के इंतजाम नहीं
जिले में कई टैंपो और वैन पांच किलो वाले गैस सिलेंडर से चलाए जा रहे हैं, जबकि कई गाड़ियां घरेलू गैस सिलेंडर से। इन वाहनों में आग से बचाव के भी इंतजाम नहीं होते। ऐसे में कभी भी हादसे से इंकार नहीं किया जा सकता।
स्कूली वाहनों के लिए मानक
- स्कूली बस में फर्स्ट एंड बॉक्स होना चाहिए
- सुरक्षा के लिए बस की खिड़कियों पर मजबूत रॉड लगी होनी चाहिए
- चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस, पहचान पत्र और वाहन के कागजात होने चाहिए
- चालक के पास विद्यालय की ओर से जारी प्रमाण पत्र भी होना जरूरी है
- स्कूली वाहन पीले रंग का होना चाहिए
- वाहनों पर स्कूल का नाम, प्रबंधक और प्रधानाचार्य का फोन नंबर, हेल्पलाइन नंबर लिखा होना चाहिए
- वाहन का फिटनेस प्रमाण पत्र होना तो अनिवार्य है
विभाग की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर स्कूली वाहनों की जांच की जाती है। मानक के विपरीत मिलने पर कार्रवाई भी की जाती है।
- राकेश सिंह, संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन)