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योगी मैजिक का भरोसा ले डूबा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Thu, 15 Mar 2018 12:25 AM IST
सीएम योगी
सीएम योगी - फोटो : self
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मैजिक से चुनावी वैतरणी पार होने की उम्मीद और अति आत्मविश्वास भाजपा को ले डूबी। बडे़ नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता दफ्तरों में बैठकर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करते रहे लेकिन शहरी क्षेत्र के मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ले जा सके। इसी का नतीजा रहा कि गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में महज 38.5 फीसदी वोटिंग हो सकी। नेता, कार्यकर्ता मुख्यमंत्री से ही करिश्मे की उम्मीद पाले रहे।
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आमतौर पर शहरियों को भाजपा का वोट बैंक बताया जाता है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र से महंत योगी आदित्यनाथ को एक लाख वोटों के अंतर से जीत भी मिली थी। मुख्यमंत्री ने टाउनहॉल में आयोजित शहर विधानसभा क्षेत्र की अपनी अंतिम जनसभा में कहा भी था कि शहर में 60 फीसदी वोटिंग करा लें तो भाजपा ढाई लाख वोटों से जीत जाएगी लेकिन भाजपा नेता, कार्यकर्ताओं ने ऐसा नहीं किया। वह योगी मैजिक के भरोसे बैठे रहे।

मतदाता पर्ची तक घर-घर पहुंचाने का काम नहीं हुआ। इस कारण वोटर नहीं निकल सके। अब नतीजा भाजपा के हार के रूप में सामने है। इसका एहसास भी भाजपा नेताओं को है। वह दबी जुबान कह रहे हैं कि शहर विधानसभा क्षेत्र की कम वोटिंग हार की प्रमुख वजह है। यदि 50 फीसदी वोटिंग भी हो जाती तो उपेंद्र को 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीत मिल सकती थी। यही नहीं, ऐसा लगा कि चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही लड़ रहे हैं। उन्होंने ताबड़तोड़ 16 कार्यकर्ता सम्मेलन, जनसभाओं को संबोधित भी किया। इससे भाजपाई अति आत्मविश्वास में आ गए। सब कहते रहे कि गोरक्षपीठाधीश्वर का आशीर्वाद है। जीत जरूर मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।   

मंत्रियों में चेहरा दिखाने की होड़
भाजपा ने यूपी सरकार के कई मंत्रियों को प्रचार में उतारा था लेकिन वे फोटो खिंचवाने, अखबार में छपवाने और सोशल मीडिया पर अपलोड करने तक सीमित रह गए। वे गांव में तो गए लेकिन मतदाताओं को सरकार के कामकाज को समझा नहीं सके। विकास का एजेंडा, सुशासन के एजेंडे को नहीं बता सके। इसी वजह से ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं ने भाजपा को झटका दिया।

कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भारी पड़ी
जानकारों की मानें तो भाजपा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी भारी पड़ी। सरकार का कार्यकाल एक साल पूरा होने वाला है लेकिन कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं मिल सका। पुलिस, प्रशासनिक अफसरों से कार्यकर्ताओं ने जो भी सिफारिश की या सहूलियत मांगी, उसे नजरअंदाज कर दिया गया। इस कारण कार्यकर्ता पूरे मन से चुनाव में नहीं लग सके।

उपचुनाव से आरएसएस की दूरी ले डूबी
गोरखपुर सदर लोकसभा उपचुनाव में आरएसएस ने कोई खास रुचि नहीं ली। गोरक्ष प्रांत के बड़े पदाधिकारी आरएसएस के अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में हिस्सा लेने नागपुर चले गए। यह सम्मेलन 9-11 मार्च को हुआ था। इस कारण पदाधिकारी वोट भी नहीं डाल सके। गोरक्ष प्रांत के एक पदाधिकारी ने कहा कि आमतौर पर उपचुनाव में आरएसएस नहीं लगता। वोटरों तक पर्ची पहुंचाने और उन्हें केंद्र तक ले जाने की जिम्मेदारी भाजपा नेता, कार्यकर्ताओं की होती है। इस वजह से भी शहर क्षेत्र में मतदान कम हुआ।

सांसद के खिलाफ मुकदमे का गलत सियासी संदेश
चुनाव प्रचार के बीच में ही गोरखपुर पुलिस ने बांसगांव से भाजपा सांसद कमलेश पासवान के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। इससे सांसद सांसत में फंस गए। वह चुनाव प्रचार बीच में छोड़कर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश में लग गए। तमाम सिफारिशें कराईं, फिर भी मुकदमे से नाम बाहर नहीं निकाला गया। इसका सियासी संदेश गलत गया। ऐसा लगा कि पासवान वोट बैंक भी भाजपा से किनारे हो गया।

भाजपा की संगठनात्मक रणनीति फेल
सपा के मुकाबले भाजपा की संगठनात्मक रणनीति भी फेल हो गई। भाजपा ने दावा किया था कि 2145 बूथों पर पन्ना प्रमुख लगाए गए हैं। हर बूथ कमेटी का गठन नए सिरे से किया गया। जहां कमजोर संगठन था, वहां बदलाव भी किया गया। इसके बावजूद भाजपा की रणनीति कामयाब नहीं हुई। पिपराइच, सहजनवां, गोरखपुर ग्रामीण, कैंपियरगंज और गोरखपुर शहर में भाजपा बहुत अच्छा नहीं कर सकी। दूसरे चरण की मतगणना से ही भाजपा प्रत्याशी पिछड़ गए।

गोरखपुर की जनता ने भाजपा को फिर दिखाया आइना
वर्ष 2000 के नगर निगम चुनाव की तरह गोरखपुर की जनता ने भाजपा को एक बार फिर आइना दिखाया। तब भी भाजपा की सरकार थी और गोरखपुर के कई नेता कैबिनेट मंत्री बने थे। इसके बावजूद गोरखपुर की जनता ने किन्नर आशा देवी को मेयर बना दिया था। तब भाजपा की मेयर प्रत्याशी विद्यावती भारत की जमानत तक जब्त हो गई थी। हिंदू महासभा की प्रत्याशी को भी करारी शिकस्त मिली थी।

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