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लोगों को जोड़ने से हासिल होगा जनविश्वास
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सभी धर्मों से ऊपर है राष्ट्र धर्म : योगी
महंत दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ के श्रद्धांजलि समारोह कार्यक्रम में बोले मुख्यमंत्री
कहा, जनप्रतिनिधि होना ही पर्याप्त नहीं, लोगों को जोड़ने से हासिल होगा जनविश्वास
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। गोरखनाथ मंदिर में चल रहे महंत दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ के श्रद्धांजलि समारोह के अवसर पर मंगलवार को गोरक्ष पीठाधीश्वर व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि दोनों संतों ने राष्ट्रधर्म को सभी धर्मों से ऊपर माना। गोरक्ष पीठ ने उस सन्यासी परंपरा का अनुसरण किया, जो मानती रही राष्ट्र धर्म ही हमारा धर्म है। यह पीठ हमेशा लोगों को जोड़ने का कार्य करती रही। पीठ का मानना है कि लोगों को जोड़ने से जन विश्वास हासिल होगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके पीठाधीश्वरों ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि व्यक्तिगत धर्म से राष्ट्र धर्म बड़ा है। यदि व्यक्ति का विकास चाहिए तो राष्ट्र का विकास उसकी अनिवार्य शर्त है। कहा कि भारत की ऋषि परंपरा व संत परंपरा ने जिस भारत की परिकल्पना की उसे हम भारत के संविधान में देख सकते हैं। भारतीय संस्कृति में छुआछूत और ऊंच नीच जैसे भेदभाव को कोई स्थान नहीं दिया गया है। यहां पर सभी पंथों के योगी महात्मा रहते हैं। यहां आने वाले हर किसी के लिए अन्न का द्वार खुला रहता है। दोनो संतों ने गोरखनाथ मंदिर को हिंदुत्व का वैचारिक अधिष्ठान बनाया।
योगी ने कहा कि गोरक्ष पीठ के शिल्पी योगीराज बाबा गंभीरनाथ और उनकी छाया में पले बढ़े दिग्विजयनाथ महराज ने हर क्षेत्र की अपूर्णता को पूर्णता प्रदान की। नाथ पंथ के योगियों को एक किया। उन्हें धर्म, आध्यात्म के साथ देश के प्रति समर्पित रहने का पाठ पढ़ाया। भारत-नेपाल संबंध पर बार-बार नेहरू को दिग्विजयनाथ महराज की मदद लेनी पड़ी थी। महंत दिग्विजयनाथ ने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना 1932 में की थी। उस समय देश में स्वतंत्रता की लड़ाई चल रही थी। उनकी यह सोच थी कि इस संस्था के माध्यम से राष्ट्रभक्त और योग्य नागरिक देश को दे सकें। उन्हाेंने विश्वविद्यालय की स्थापना में अपना पूरा योगदान दिया। इस पिछड़े क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा की आधारशिला रखी। आज जो कुछ गोरखपुर में गौरव प्रदान करने वाली चीजें हैं उसमें दोनो संतों का सबसे अधिक योगदान है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि होना ही पर्याप्त नहीं है। जब लोगों को जोड़ेंगे तो जनविश्वास हासिल होगा।
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महंत दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ के श्रद्धांजलि समारोह कार्यक्रम में बोले मुख्यमंत्री
कहा, जनप्रतिनिधि होना ही पर्याप्त नहीं, लोगों को जोड़ने से हासिल होगा जनविश्वास
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। गोरखनाथ मंदिर में चल रहे महंत दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ के श्रद्धांजलि समारोह के अवसर पर मंगलवार को गोरक्ष पीठाधीश्वर व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि दोनों संतों ने राष्ट्रधर्म को सभी धर्मों से ऊपर माना। गोरक्ष पीठ ने उस सन्यासी परंपरा का अनुसरण किया, जो मानती रही राष्ट्र धर्म ही हमारा धर्म है। यह पीठ हमेशा लोगों को जोड़ने का कार्य करती रही। पीठ का मानना है कि लोगों को जोड़ने से जन विश्वास हासिल होगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके पीठाधीश्वरों ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि व्यक्तिगत धर्म से राष्ट्र धर्म बड़ा है। यदि व्यक्ति का विकास चाहिए तो राष्ट्र का विकास उसकी अनिवार्य शर्त है। कहा कि भारत की ऋषि परंपरा व संत परंपरा ने जिस भारत की परिकल्पना की उसे हम भारत के संविधान में देख सकते हैं। भारतीय संस्कृति में छुआछूत और ऊंच नीच जैसे भेदभाव को कोई स्थान नहीं दिया गया है। यहां पर सभी पंथों के योगी महात्मा रहते हैं। यहां आने वाले हर किसी के लिए अन्न का द्वार खुला रहता है। दोनो संतों ने गोरखनाथ मंदिर को हिंदुत्व का वैचारिक अधिष्ठान बनाया।
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योगी ने कहा कि गोरक्ष पीठ के शिल्पी योगीराज बाबा गंभीरनाथ और उनकी छाया में पले बढ़े दिग्विजयनाथ महराज ने हर क्षेत्र की अपूर्णता को पूर्णता प्रदान की। नाथ पंथ के योगियों को एक किया। उन्हें धर्म, आध्यात्म के साथ देश के प्रति समर्पित रहने का पाठ पढ़ाया। भारत-नेपाल संबंध पर बार-बार नेहरू को दिग्विजयनाथ महराज की मदद लेनी पड़ी थी। महंत दिग्विजयनाथ ने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना 1932 में की थी। उस समय देश में स्वतंत्रता की लड़ाई चल रही थी। उनकी यह सोच थी कि इस संस्था के माध्यम से राष्ट्रभक्त और योग्य नागरिक देश को दे सकें। उन्हाेंने विश्वविद्यालय की स्थापना में अपना पूरा योगदान दिया। इस पिछड़े क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा की आधारशिला रखी। आज जो कुछ गोरखपुर में गौरव प्रदान करने वाली चीजें हैं उसमें दोनो संतों का सबसे अधिक योगदान है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि होना ही पर्याप्त नहीं है। जब लोगों को जोड़ेंगे तो जनविश्वास हासिल होगा।
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