सलाखों के पीछे भी पाकीजगी की कोशिश
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खास बात यह है इस इबादत में गंगा-जमुनी तहजीब भी बखूबी कायम है। मुस्लिम कैदियों के अलावा कुछ हिंदू कैदी भी रोजा रख रहे हैं। मन, विक्की, विशाल, विजय, रामप्रीत और अरविंद नाम के ये छह कैदी इसकी बानगी हैं। महिला कैदी भी रोजा रखने और इबादत करने में पीछे नहीं हैं। आठ महिला रमजान महीने की शुरुआत से अपने बैरक में रोजा की सारी मान्यताओं को पूरा कर रही हैं। कैदियों की सहरी ओर इफ्तारी में किसी तरह की कोई मुश्किल न आए, इसे लेकर जेल प्रशासन भी मुस्तैद है।
जेल की ओर से इसके लिए फल, बिस्किट, पाव, चना, चीनी, दूध, नींबू, समेत कई सामानों को खासतौर मुहैया कराया जा रहा है। रोजेदारों के खाने का अलग से इंतजाम किया गया है। जेल की ओर से राशन उपलब्ध करा दिया जा रहा है, लेकिन उसे बनाने की जिम्मेदारी रोजेदारों को ही सौंपी गई है। इसकी वजह सहरी और इफ्तार के समय का अन्य कैदियों के खाने के समय से मेल न खाना बताया जा रहा है। हालांकि कुरान शरीफ की तिलावत रोजेदार अपने-अपने बैरक में ही कर रहे हैं। जिस बैरक में रोजदारों की तादाद ज्यादा है, वहां उन्हें साथ मिलकर तिलावत करने मौका मिल जा रहा है। जुमे की नमाज पढ़ाने के लिए खासतौर पर बाहर से इमाम बुलाया जा रहा है।
जेल में रोजेदारों को इबादत में किसी किस्म की कोई तकलीफ न हो, इसका पूरा इंतजाम किया गया है। इसे लेकर जेल में तैनात सभी बंदीरक्षकों की जिम्मेदारी तय कर दी है साथ ही इंतजाम में सहयोग के लिए भी कहा गया है।
- एसके शर्मा, वरिष्ठ जेल अधीक्षक, मंडलीय जेल
आगे आएं स्वयंसेवी संस्थाएं
जेल विजिटर आदिल अमीन के मुताबिक जेल प्रशासन ने तो रोजेदारों की सहूलियत की पूरा ध्यान रख रहा है, लेकिन इफ्तार और सहरी को लेकर स्वयंसेवी संस्थाओं का आगे न आना निराशाजनक है। आदिल अमीन ने ऐसी सभी संस्थाओं से अपील की है कि वे शहर के आम रोजेदारों के इफ्तार के लिए आगे आने के साथ-साथ कैदी रोजेदारों को भी न भूलें।