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‘गाय का दूध मां जैसा’

Mon, 16 Sep 2019 01:24 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 16 Sep 2019 01:24 AM IST
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ब्रम्हलीन महन्त दिग्विजयनाथ एंव ब्रम्हलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में ?
‘गाय का दूध मां जैसा’
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गोरखपुर। गो सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रो. श्यामनंदन ने कहा कि न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया के पशु वैज्ञानिकों ने जर्सी और भारतीय गायों पर शोध कर जो निष्कर्ष निकाला है वह हमारी आंखें खोलने वाला है। जर्सी गायों का दूध उत्तेजना पैदा करता है। रक्तचाप बढ़ाता है, जबकि भारतीय नस्ल की गायों का दूध मां के दूध जैसा, मानव स्वास्थ्य के लिए अमृत समान है।
प्रो. श्यामनंदन गोरखनाथ मंदिर में चल रहे श्रद्धांजलि समारोह के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में ‘भारत की सनातन संस्कृति में गो-सेवा का महत्व’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत के ऋषियों ने यह शोध हजारों साल पहले कर लिया था। वेद के रचयिता ने लिखा कि गाय विश्व की माता है। गाय के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि मां की तरह यह भी 9 माह 10 दिन में बच्चा देती है।
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एक साल में उसर भूमि को उपजाऊ बना देगा गोबर और गोमूत्र
प्रो. श्यामनंदन ने गौवंश पर आधारित कृषि और कृषि उत्पादों पर नए शोध एवं स्वयं के द्वारा किए जा रहे प्रयोगों के बारे में विस्तार से बताया। कहा कि इधर 30 से 40 सालों में हमने रासायनिक खादों के माध्यम से खाद्यन्न में जहर घोला है। इससे चिकित्सालय मरीजों से भरे पड़े हैं। जैविक खेती के लिए एक एकड़ में 300 क्विंटल खाद की जरूरत होगी। उसके लिए 18 से 20 गायें चाहिए। जबकि पद्मश्री सुभाष कालेकर ने जीरो बजट आधारित प्राकृतिक खेती का तरीका खोजा है। वह भारत के खेतों और किसानों की काया पलट देगी। कहा कि गाय के गोबर और मूत्र में ही वह ताकत है कि उसर भूमि को एक साल में उपजाऊ बना देगी। समय आ गया है कि गौवंश पर आधारित खेती की जाए।
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गो माता हमारी यज्ञ संस्कृति की प्रतीक: गोपालदास
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। गोरखनाथ मंदिर में चल रहे श्रद्धांजलि समारोह में ‘ भारत के सनातन संस्कृति में गो-सेवा का महत्व’ विषय पर मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार रखते हुए अरौल आश्रम प्रयागराज से पधारे स्वामी गोपालदास जी महराज ने कहा कि गो माता हमारी यज्ञ संस्कृति की प्रतीक हैं। यह हमारे सामाजिक-आर्थिक व धार्मिक जीवन की धुरी हैं। भारत का बोध वाक्य है ‘भारत देश से नाता है गो हमारी माता है। ऐसे देश में गो हत्या महापाप है। धर्म रक्षा, स्वास्थ्य रक्षा, आर्थिक लाभ तथा पर्यावरण की दृष्टि से गोवंश का संरक्षण एवं संवर्धन आवश्यक है। हमारे वैदिक ग्रंथों से लेकर पौराणिक ग्रंथों तक में गाय की महिमा बताई गई है। हनुमान प्रसाद पोद्दार, बाबा राघवदास, स्वामी करपात्री महराज, लालाहरदेव सहाय जैसे महापुरुषों के नेतृत्व में गो हत्या पर प्रतिबंध को लेकर आंदोलन चलाए गए। दुर्भाग्य की बात है कि अहिंसा के पुजारी के इस देश में आज भी भारी संख्या में गो हत्याएं होती हैं।
पूर्व कुलपति यूपी सिंह ने कहा कि जिस गाय को हम माता मानते हैं उसी गोवंश का अस्तित्व खतरे में है। स्वामी रामानुजाचार्य ने कहा कि 33 करोड़ देवी देवता जितना मानव पर उपकार नहीं कर सकते उतना गो माता अकेले कर सकती हैं। इस अवसर पर अतुल सिंह, प्रहलाद ब्रह्मचारी, वरूण वैरागी, अयोध्या राय, रंगनाथ त्रिपाठी, डॉ. शैलेंद्र प्रताप सिंह, डॉ अरविंद चतुर्वेदी, डॉ. सुमीत्रा सिंह, बृजेश मणि त्रिपाठी, अरूणेश शाही, सुरेशदास, शिवनाथ दास , मिथिलेशनाथ, सहित अन्य बहुत से लोग थे।

वैरागी ने भेंट किया गो-माता साहित्य
गो सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के गोरखनाथ मंदिर आगमन पर पशु पक्षी सेवाश्रम नौसड़ के गो सेवक वरूण वैरागी ने गीता प्रेस, गायत्री परिवार, की गो माता साहित्य एवं स्व लिखित लेख दुग्ध पिये सौ वर्ष जिये की प्रति भेंट की। इस अवसर पर यूपी सिंह, द्वारिका तिवारी, मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. डी के शर्मा, डॉ. राजेश त्रिपाठी, उपस्थित थे।
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