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एम्स: शीशे की दीवारों को नहीं भेद पाएगी जगुआर की आवाज
Sun, 21 Jul 2019 02:36 AM IST
Abhishek Singh
रोहित सिंह, गोरखपुर
रोहित सिंह, गोरखपुर
Published by: Abhishek Singh
Updated Sun, 21 Jul 2019 02:36 AM IST
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एम्स
- फोटो : Social Media (File Photo)
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एयरपोर्ट के पास बन रहा एम्स का मुख्य भवन पूरी तरह साउंडप्रूफ होगा। ऐसे में यहां दाखिल होने वाले लोगों के कानों में हवाईजहाज, प्लेन यहां तक की फाइटर प्लेन जगुआर तक की आवाज नहीं पहुंचेगी। इसके लिए मुख्य भवन में विशेष प्रकार के शीशे (अक्वास्टिक ग्लास) लगाए जा रहे हैं।
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ये शीशे अंतर्राष्ट्रीय कंपनी सेंट गोबिन चेन्नई स्थित फैक्ट्री में बने है। लगभग 80 फीसदी शीशे लगाए जा चुके हैं। इससे ओपीडी, इमरजेंसी के अलावा वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों और डॉक्टरों को राहत मिलेगी।
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कूड़ाघाट में गन्ना शोध संस्थान की जमीन पर 112 एकड़ जमीन पर एम्स का निर्माण कराया जा रहा है। परिसर से थोड़ी दूरी पर ही एअरफोर्स स्टेशन है। यहीं पर घरेलू उड़ानों के लिए एअरपोर्ट भी बना है। यहां से सैन्य लड़ाकू विमान जगुआर और घरेलू विमानन कंपनियों के जहाज उड़ान भरते हैं। कार्यदाई संस्था के इंजीनियरों ने बताया कि अक्वास्टिक में शीशे की दो परतों को एक ही सांचे में ढाला जाता है। दोनों परतों के बीच पारदर्शी ग्लेज पेपर रहता है। जिससे इस शीशे से टकराने वाली 90 फीसदी ध्वनि तरंग परावर्तित हो जाती है।
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कई मरीजों के लिए जानलेवा हो सकती है तेज आवाज
एम्स में 750 बेड की व्यवस्था की गई है। 100 बेड का आईसीयू संचालित किया जाएगा। आईसीयू में भर्ती मरीजों के लिए तेज आवाज जानलेवा हो सकती है। इसके अलावा नवजात, दिल, दिमाग और मानसिक रोग के मरीजों के लिए भी तेज आवाज हानिकारक या जानलेवा तक हो सकता है। ऐसे में शासन ने तय किया कि एम्स के भवन साउंड प्रूफ बनाए जाएंगे।
मरीजों की सहूलियत के लिए मुख्य भवन में अक्वास्टिक ग्लास लगाए जा रहे हैं। इससे तेज आवाज अंदर नहीं आ सकेगी। एम्स में कई तरह के गंभीर मरीज इलाज के लिए आएंगे। उन्हें तेज आवाज से परेशानी होने का खतरा होता है - एचएल प्रसाद, प्रोजेक्ट इंचार्ज हाइट्स