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छूआछूत पाप नहीं है तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है: पाटिल

Sun, 15 Sep 2019 01:54 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 15 Sep 2019 01:54 AM IST
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gorakhnath mandir and seminar news
गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजय एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में मंचासीन प्रो
सामाजिक समरसता के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी: पाटिल
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जातिवाद, प्रांतवाद, अमीरी, गरीबी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं
गोरखपुर। पूर्व सांसद वसाराव पाटिल ने कहा कि हम उस आध्यात्मिक संस्कृति के वारिस हैं जिसके कण-कण में परमात्मा का वास होता है। ऐसे में जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद सहित अमीरी-गरीबी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकते हैं। हम समरसता की शिक्षा परिवार से सिखते हैं। सामाजिक समरसता में ही हमारी संस्कृति का प्राण बसता है। सामाजिक समरसता के बगैर भारतीय संस्कृति अधूरी एवं मृत प्राय है।
पाटिल महंत दिग्विजयनाथ एवं महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी ‘सामाजिक समरसता एवं संत समाज’ पर बतौर मुख्य अतिथि अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हम सामाजिक समरसता की शिक्षा परिवार से सीखते हैं। सामाजिक समरसता में हमारी संस्कृति का प्राण बसता है। वनवासियों, ग्रामवासियों से हमें सामाजिक समरसता का मंत्र सीखना होगा। वनवासियों, गिरिवासियों में आज भारत की परंपरा जीवित है। वहां समाज का हर व्यक्ति एक दूसरे का पूरक है। उन्होंने कहा कि जो समाज गो ग्रास निकालता हो, पंक्षियों को दाना खिलाता हो, चीटियों को आटा खिलाता हो वह समाज अपनों को अछूत कैसे मान सकता है। महापुरुषों ने तभी तो कहा कि यदि छूआछूत पाप नहीं है तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।
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पाटिल ने संतों को परिभाषित करते हुए कहा कि जो सकल जीवात्मा को प्यार करते हैं, सभी जीवों को एक साथ सम्मान दे, जाति से ऊपर उठकर सभी मानव को समानता का भाव दे, विपरीत परिस्थितियों में भी सामाजिक भावना को न छोड़े वही संत है। समर्थ गुरु रामदास, तुकाराम रामानुजाचार्य, पुरंदरदास, रामानंद, मीराबाई, कबीर, रविदास, संत रामसुखदास, महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवेद्यनाथ, जैसे संतों ने सामाजिक समरसता के लिए न केवल स्वयं आगे आए बल्कि अपने जीवन में समरसता का भाव जगाए रखा तथा औरों को समरस होने की प्रेरणा दी। भारत में यदि सामाजिक समरसता कायम है तो इसका श्रेय इसी संत समाज को जाता है।
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हिंदू समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं: शेरनाथ
गोरखपुर। जूनागढ़ गुजरात के संत शेरनाथ ने कहा कि दुनिया की श्रेष्ठतम हिंदू संस्कृति, श्रेष्ठतम जीवन पद्धति, एवं श्रेष्ठतम सामाजिक व्यवस्था में जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना और छुआछूत एक कोढ़ है। धार्मिक संकीर्णता भी हमारे समाज को रूढ़िगत बनाता है। संत महात्माओं ने स्वतंत्रता के बाद से ही सामाजिक समरसता का अभियान छेड़ दिया था। दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ ने तो व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया था।
संत शेरनाथ गोरखनाथ मंदिर में चल रहे श्रद्धांजलि समारोह में ‘सामाजिक समरसता एवं संत समाज’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हम वसुधैव कुटुंबकम के वाहक हैं। हिंदू संस्कृति तो कण-कण में भगवान का दर्शन कराती है। कहा कि जहां अद्वैत वेदांत का दर्शन गूंजा, उस संस्कृति में छुआछूत एवं धार्मिक संकीर्णता जैसी अमानवीय रूढ़ीगत व्यवस्था की स्वीकृति कैसे की जा सकती है। हिंदू समाज में छुआछूत ऊंच नीच, अमीर-गरीब, नारी-पुरुष जैसी किसी भी विषमता का कोई स्थान नहीं है।
दिगंबर अखाड़ा अयोध्या के महंत सुरेशदास महराज ने कहा कि छुआछूत मिटाओं और देश बचाओं का मंत्र फूंकना होगा। छुआछूत की भावना और धार्मिक संकीर्णता से हिंदू समाज कमजोर होता है। सामाजिक समरसता को व्यवस्था परिवर्तन का हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए शिक्षण संस्थाओं को आगे आना होगा। कहा कि सनातन हिंदू धर्म ने कभी भी सामाजिक विषमता को स्थान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि भारत में छुआछूत के खिलाफ सबसे सशक्त अभियान गोरक्षपीठ ने चलाया।

प्रो. यूपी सिंह ने कहा कि हिंदू समाज को अपने व्यवहार से सिद्ध करना होगा कि हम दुनिया के श्रेष्ठतम समाज की स्थापना में सक्षम हैं। उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि आधुनिक भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है कि समरस अथवा छुआछूत विहिन समाज की रचना हो। गुरु गोरखनाथ ने हजारों साल पहले सामाजिक क्रांति का उद्घोष किया था। आज भी गोरक्षपीठ उस सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाने में लगी है। इस अवसर पर शिवनाथ जी महराज, शांतिनाथ जी, धर्मदास, कमलनाथ, गंगादास, मिथलेशनाथ, जयबक्शदास, राममिलनदास आदि लोग मौजूद थे।
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