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दलाल को थमाते पर्ची, मरीज को बताते हैं पता
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Fri, 24 Jun 2016 08:21 PM IST
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मेडिकल कालेज मे बाहर से जांच कराने के लिए दी गयी पर्ची ।
- फोटो : shivharsh
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मेडिकल कॉलेज में मरीज जांच और दवा के नाम पर ठगे जा रहे हैं। जो जांच मेडिकल कॉलेज में मौजूद है, वह भी बाहर से कराई जा रही है। मामला पकड़ में न आए इसके लिए भी बड़ा खेल हो रहा है। मेडिकल स्टोर और पैथोलॉजी सेंटर के दलाल मेडिकल कॉलेज में घूमते रहते हैं। जैसे ही डॉक्टर ब्लड सैंपल निकालते हैं, दलाल को बुलाकर थमा देते हैं और मरीज को पैथोलॉजी का रास्ता बता दिया जाता है।
मेडिकल कॉलेज की ओपीडी हो या ओटी। दोनों ही जगहों पर ये खेल खेला जा रहा है। अभी तक डॉक्टर यहां दवाओं की कमी का फायदा तो उठा ही रहे थे, अब जांच को भी लाभ का जरिया बना लिया गया है। गायनी विभाग और ट्रॉमा सेंटर के जूनियर डॉक्टर इस खेल में ज्यादा शामिल हैं। इसकी वजह भी है। पहला तो कॉलेज के एक प्रशासनिक अफसर की पैथोलॉजी से जांच कराकर उनकी नजर में खुद को बढ़ाने की कोशिश तो दूसरा कमीशन का खेल। इन दोनों के बीच गरीब जनता पिस रही है।
मरीज ने बताई गई जगह से जांच कराई है या नहीं, इसका पता तो डॉक्टर रिपोर्ट देखकर लगा ही लेते हैं। मगर दवा कहां से ली है, इसके लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर से दवा की रसीद लेने के बाद दवा डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा जाता है।
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केस 1. गायनी विभाग में सिद्धार्थनगर से आए हमीद की पत्नी नूरजहां का उपचार चल रहा है। जूनियर डॉक्टर ने ब्लड सैंपल निकाला और दलाल को थमा दिया। वहीं हमीद को पर्ची पर बाहर का पता लिखकर दे दिया गया। बाहर उन्होंने 764 रुपये में जांच कराए।
केस 2. ओपीडी में आए किशन कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। दवा और जांच दोनों बाहर से लिखी गई। यही नहीं दवा खरीदने के बाद फिर बुलाया गया था ताकि यह पड़ताल की जा सके कि दवा बताई गई जगह से ही खरीदी गई है या नहीं।
मुझे इसकी जानकारी नहीं है। जिस भी विभाग में ऐसा हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी विभागाध्यक्ष की है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. एके श्रीवास्तव, एसआईसी
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मेडिकल कॉलेज की ओपीडी हो या ओटी। दोनों ही जगहों पर ये खेल खेला जा रहा है। अभी तक डॉक्टर यहां दवाओं की कमी का फायदा तो उठा ही रहे थे, अब जांच को भी लाभ का जरिया बना लिया गया है। गायनी विभाग और ट्रॉमा सेंटर के जूनियर डॉक्टर इस खेल में ज्यादा शामिल हैं। इसकी वजह भी है। पहला तो कॉलेज के एक प्रशासनिक अफसर की पैथोलॉजी से जांच कराकर उनकी नजर में खुद को बढ़ाने की कोशिश तो दूसरा कमीशन का खेल। इन दोनों के बीच गरीब जनता पिस रही है।
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मरीज ने बताई गई जगह से जांच कराई है या नहीं, इसका पता तो डॉक्टर रिपोर्ट देखकर लगा ही लेते हैं। मगर दवा कहां से ली है, इसके लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर से दवा की रसीद लेने के बाद दवा डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा जाता है।
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केस 1. गायनी विभाग में सिद्धार्थनगर से आए हमीद की पत्नी नूरजहां का उपचार चल रहा है। जूनियर डॉक्टर ने ब्लड सैंपल निकाला और दलाल को थमा दिया। वहीं हमीद को पर्ची पर बाहर का पता लिखकर दे दिया गया। बाहर उन्होंने 764 रुपये में जांच कराए।
केस 2. ओपीडी में आए किशन कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। दवा और जांच दोनों बाहर से लिखी गई। यही नहीं दवा खरीदने के बाद फिर बुलाया गया था ताकि यह पड़ताल की जा सके कि दवा बताई गई जगह से ही खरीदी गई है या नहीं।
मुझे इसकी जानकारी नहीं है। जिस भी विभाग में ऐसा हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी विभागाध्यक्ष की है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. एके श्रीवास्तव, एसआईसी