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मंहगाई से आम से खास सभी बेहाल
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Thu, 16 Jun 2016 08:58 PM IST
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महंगाई
- फोटो : अमर उजाला
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एक महीने में खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई पांच से दस फीसदी की वृद्धि ने आम-आदमी की कमर तोड़ दी है। आम हो या खास, सभी बेहाल हैं। ऊपर से जिस तरह से डीजल और पेट्रोल के दाम महीने में दो बार बढ़े हैं। उसने भी लोगों की जेबें ढीली करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसके लिए विशेषज्ञ सरकारी तंत्र के आपसी तालमेल में कमी को कारण बता रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को जमाखोरों और मध्यस्थों पर अंकुश लगाना पड़ेगा, तभी जनता को कुछ राहत मिल सकती है। महंगाई को लेकर जब ‘अमर उजाला’ ने शहर के लोगों से बात की तो लोगों ने अपना दुख इस तरह व्यक्त किया।
मंहगाई के बारे में तो पूछो ही मत। मैं 500 रुपये लेकर बाजार जाती हूं तो महज चार दिन की सब्जी आ पाती है। अब 500 रुपये 100 रुपये की तरह लगते हैं। महंगाई रोकने के लिए सरकार को ठोस रणनीति बनानी चाहिए।
- आरती पांडेय, सरकारी कर्मी, दाउदपुर
मंहगाई की मार सबसे अधिक मसालों पर पड़ी है। मसाले के दाम बहुत तेजी के साथ बढ़े हैं। सबसे ज्यादा मिर्ची, हल्दी और धनिया की कीमतों में उछाल आया है। इससे रसोई का बजट गड़बड़ होना लाजमी है।
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- हेमलता चौधरी, गृहणी, कूड़ाघाट
सरकार कोई ऐसी योजना बनाए, जिससे खाद्य सामग्री के दामों पर अंकुश लगे। दाल, आटा, चावल और चीनी को खुले बाजार में कंट्रोल रेट पर बिकवाना चाहिए। इससे काफी हद तक मंहगाई पर काबू पाया जा सकता है।
- शाहिनबानो, गृहणी, बिलंदपुर
डीजल और पेट्रोल के दाम तो महीने में दो बार बढ़ाए जा चुके हैं। ऐसी नीतियों से अच्छे दिन नहीं आने वाले। केंद्र और राज्य सरकारें दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय आम पब्लिक की सुध लें तो बेहतर होगा।
- बुद्धिसागर मिश्रा, प्राइवेट कर्मचारी, पैडलेगंज
दरअसल महंगाई का सबसे ज्यादा असर श्रमसाध्य सामानों पर पड़ा है। टेक्निकल सामानों की कीमतों पर यह ज्यादा प्रभावी नहीं है। यही वजह है कि रोजमर्रा के सामानों के दामों में ज्यादा वृद्धि हुई है। हालांकि इससे विकास की गति पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है लेकिन आम जनजीवन प्रभावित हो गया है। मेरी नजर में सरकारी तंत्र का आपस में तालमेल न होना महंगाई की मुख्य वजह है। सरकारी तंत्र में महंगाई दूर करने की मंशा कहीं नहीं दिखती। हां एक बात और, यदि रोजमर्रा की चीजों के दामों पर नियंत्रण रखना है तो पहले जमाखोरों और मध्यस्थों पर नियंत्रण करना होगा।
- डॉ. संजीत गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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मंहगाई के बारे में तो पूछो ही मत। मैं 500 रुपये लेकर बाजार जाती हूं तो महज चार दिन की सब्जी आ पाती है। अब 500 रुपये 100 रुपये की तरह लगते हैं। महंगाई रोकने के लिए सरकार को ठोस रणनीति बनानी चाहिए।
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- आरती पांडेय, सरकारी कर्मी, दाउदपुर
मंहगाई की मार सबसे अधिक मसालों पर पड़ी है। मसाले के दाम बहुत तेजी के साथ बढ़े हैं। सबसे ज्यादा मिर्ची, हल्दी और धनिया की कीमतों में उछाल आया है। इससे रसोई का बजट गड़बड़ होना लाजमी है।
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- हेमलता चौधरी, गृहणी, कूड़ाघाट
सरकार कोई ऐसी योजना बनाए, जिससे खाद्य सामग्री के दामों पर अंकुश लगे। दाल, आटा, चावल और चीनी को खुले बाजार में कंट्रोल रेट पर बिकवाना चाहिए। इससे काफी हद तक मंहगाई पर काबू पाया जा सकता है।
- शाहिनबानो, गृहणी, बिलंदपुर
डीजल और पेट्रोल के दाम तो महीने में दो बार बढ़ाए जा चुके हैं। ऐसी नीतियों से अच्छे दिन नहीं आने वाले। केंद्र और राज्य सरकारें दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय आम पब्लिक की सुध लें तो बेहतर होगा।
- बुद्धिसागर मिश्रा, प्राइवेट कर्मचारी, पैडलेगंज
दरअसल महंगाई का सबसे ज्यादा असर श्रमसाध्य सामानों पर पड़ा है। टेक्निकल सामानों की कीमतों पर यह ज्यादा प्रभावी नहीं है। यही वजह है कि रोजमर्रा के सामानों के दामों में ज्यादा वृद्धि हुई है। हालांकि इससे विकास की गति पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है लेकिन आम जनजीवन प्रभावित हो गया है। मेरी नजर में सरकारी तंत्र का आपस में तालमेल न होना महंगाई की मुख्य वजह है। सरकारी तंत्र में महंगाई दूर करने की मंशा कहीं नहीं दिखती। हां एक बात और, यदि रोजमर्रा की चीजों के दामों पर नियंत्रण रखना है तो पहले जमाखोरों और मध्यस्थों पर नियंत्रण करना होगा।
- डॉ. संजीत गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, गोरखपुर यूनिवर्सिटी