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चूड़ी वाले हाथ दे रहे चीन को मात, चीनी झालर उतार गांव में बनी लाइटों से सज गया बाजार

Sat, 26 Oct 2019 04:43 PM IST
Prachi Priyam न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर Published by: Prachi Priyam Updated Sat, 26 Oct 2019 04:43 PM IST
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Diwali celebrations with indian lights rather than chinese in gorakhpur UP
दिवाली

इस दिवाली उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के खजनी और आसपास के बाजार में खुटभार गांव की बनी एलईडी झालरें और एलईडी बल्ब ग्राहकों की पसंद बने हुए हैं। नतीजा यह हुआ कि दुकानदारों ने चीनी झालरें किनारे करके दुकान में गांव की झालरें और बल्ब सजा दिए हैं। यह झालरें और बल्ब चीन के उत्पाद को मात दे रहे हैं। यह चीनी उत्पाद से सस्ते भी हैं और टिकाऊ भी। बिक्री के बाद मरम्मत की गारंटी होने के कारण उपभोक्ता यह स्वदेशी उत्पाद खरीद रहे हैं।

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खजनी के खुटभार की संगीता देवी ने गांव की पांच महिलाओं के साथ मिलकर स्वदेशी एलईडी बल्ब और लड़ियां बनाने का काम दो माह पहले शुरू किया। मां कोटही देवी स्वयं सहायता समूह बनाकर यह पांच महिलाएं प्रतिदिन करीब चार सौ मीटर एलईडी लड़ियां और सात वाट के दो सौ से अधिक एलईडी बल्ब तैयार कर रहीं हैं।
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समूह की लीडर संगीता के अनुसार दिवाली पर एलईडी लड़ियों की बहुत मांग है। चीन के उत्पाद की कोई गारंटी नहीं है जबकि वह लड़ी और बल्ब की एक साल की गारंटी और उसके बाद नाम मात्र शुल्क पर मरम्मत की सुविधा दे रही हैं। यही कारण है कि स्थानीय दुकानदार भी उनके उत्पाद में दिलचस्पी ले रहे हैं। चीन की लड़ियां और बल्ब से मूल्य भी कम है।
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चीन की दस मीटर की लड़ी 120 से 150 रुपये मीटर मिलती है, लेकिन उनकी कोई वारंटी नहीं होती। एक भी बल्ब खराब हुआ तो पूरी झालर बुझ जाती है। इसके विपरीत उनकी दस मीटर की झालर मात्र सौ रुपये की है। कोई बल्ब खराब होने पर भी झालर जलती रहती है, एक साल के भीतर बल्ब खराब होने पर उसे निशुल्क बदल दिया जाता है। सात वाट का बल्ब बाजार में सत्तर रुपये में दिया जा रहा है। एक साल वारंटी की समयसीमा समाप्त होने के बाद अधिकतम तीस रुपये में बल्ब की मरम्मत की जाती है।  

गीडा से लेती हैं कच्चा माल 

संगीता बताती हैं  कि उन्हें स्टेट बैंक आफ इंडिया की आरसेटी योजना के तहत एलईडी बल्ब और झालर बनाने की ट्रेनिंग दिलाई गई थी। इसके बाद समूह को बैंक ने लोन और कच्चा माल दिलाया। वर्तमान में गीडा से कच्चा माल लाकर बल्ब और लड़ियां तैयार की जा रही हैं। उनके साथ सुनीता, अनीता, निशा और रेनू उत्पादन में सहयोग कर रही हैं। ये महिलाएं प्रति माह पांच हजार रुपये तक कमा रही हैं।

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