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खीस्त राजा का पर्व मनाया
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sun, 20 Nov 2016 08:16 PM IST
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खीस्त राजा के पर्व पर कार्मल स्कूल मे प्रार्थना करते लोग ।
- फोटो : Rajesh Kumar
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सेंट जोसेफ चर्च में कैथोलिक डायसिस के तत्वावधान में खीस्त राजा का पर्व मनाया गया। कैथोलिक समुदाय में इसे बलिदान की स्थापना के त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। इस मौके पर फादर बिशप थॉमस, बिशप डोमिनिक एवं धर्मप्रांतीय पुरोहितों ने यूखीस्तीय बलिदान चढ़ाया। शाम को कॉर्मल गर्ल्स कॉलेज से कैंडल जुलूस निकालकर मसीही समाज के लोगों ने खीस्त राजा के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।
बिशप थॉमस ने बताया कि हर यूखीस्तीय बलिदान प्रभु मसीह के बलिदान और राजत्व की वर्तमान वास्तविकता एवं हमारे जीवन के विश्वास की घोषणा है। उन्होंने कहा कि बलिदान के इस त्योहार को 1264 में संत फादर ऊर्बन चतुर्थ ने औपचारिक तौर पर घोषित किया था। इस पर्व की विशेषता यह है कि विश्वासियों द्वारा पवित्र परमप्रसाद को जुलूस में ले जाया जाता है और भक्तिपूर्वक आशीष ग्रहण किया जाता है। खीस्त राजा का पर्व लैटिन वार्षिक पूजन विधि क्रम का मुकुट भी माना जाता है। इस पर्व की स्थापना संत फादर पीयूस ग्यारहवें ने 1925 में की थी। इस संबंध में सेंट फादर बेनेडिक्ट सोलहवें का कहना है कि हमें क्रूस के बलिदान की केंद्रीय घटना से शुरुआत करनी है, यहां इस घटना में खीस्त अपने राजकीय महिमा और महत्ता प्रकट करते हैं।
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सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी भी अच्छी खासी थी। बरैला बेंजमन, सुजैना जोसवा, शर्मिला हारुन आदि ने आत्मिक सम्मेलन को अध्यात्मिक शांति देने वाला बताया। इस दौरान रेव्हरन डॉ. जेके लाल, रेव्हरन डॉ. पीएम थॉमस, वीपी एलेक्जेंडर, रोशन लाल, डॉ. ईश्वर दयाल, डी. अंद्रियास आदि मौजूद रहे।
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बिशप थॉमस ने बताया कि हर यूखीस्तीय बलिदान प्रभु मसीह के बलिदान और राजत्व की वर्तमान वास्तविकता एवं हमारे जीवन के विश्वास की घोषणा है। उन्होंने कहा कि बलिदान के इस त्योहार को 1264 में संत फादर ऊर्बन चतुर्थ ने औपचारिक तौर पर घोषित किया था। इस पर्व की विशेषता यह है कि विश्वासियों द्वारा पवित्र परमप्रसाद को जुलूस में ले जाया जाता है और भक्तिपूर्वक आशीष ग्रहण किया जाता है। खीस्त राजा का पर्व लैटिन वार्षिक पूजन विधि क्रम का मुकुट भी माना जाता है। इस पर्व की स्थापना संत फादर पीयूस ग्यारहवें ने 1925 में की थी। इस संबंध में सेंट फादर बेनेडिक्ट सोलहवें का कहना है कि हमें क्रूस के बलिदान की केंद्रीय घटना से शुरुआत करनी है, यहां इस घटना में खीस्त अपने राजकीय महिमा और महत्ता प्रकट करते हैं।
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प्रभु के साथ मानव सेवा भी जरूरी : आशीष
डायसिस ऑफ लखनऊ की ओर से सेंट जॉन्स चर्च बशारतपुर में पांच दिन से चल रहे आत्मिक सम्मेलन का रविवार को प्रार्थना के साथ समापन हो गया। इलाहाबाद से आए रेव्हरन आशीष खंडेलवाल ने बाइबल के प्रेरितों का काम पढ़कर विश्वासियों को इसके भेद समझाए। उन्होंने कहा कि प्रभु यीशु मसीह ने हमें धरती पर मानव रूप में भेजा है। जिस रूप में भेजा है हमें उसी रूप में प्रभु की सेवा के साथ ही मानव सेवा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रभु के साथ मानव सेवा भी जरूरी है। चर्च के क्वायर ने भक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर माहौल को भक्तिमय कर दिया।
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सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी भी अच्छी खासी थी। बरैला बेंजमन, सुजैना जोसवा, शर्मिला हारुन आदि ने आत्मिक सम्मेलन को अध्यात्मिक शांति देने वाला बताया। इस दौरान रेव्हरन डॉ. जेके लाल, रेव्हरन डॉ. पीएम थॉमस, वीपी एलेक्जेंडर, रोशन लाल, डॉ. ईश्वर दयाल, डी. अंद्रियास आदि मौजूद रहे।