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Exclusive: सीएम योगी के शहर में 22 साल से बोतलों में दफन है 15 हजार लोगों की मौत की वजहें
Sat, 07 Dec 2019 10:49 AM IST
विजय जैन
ब्यूरो, अमर उजाला, गोरखपुर
ब्यूरो, अमर उजाला, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sat, 07 Dec 2019 10:49 AM IST
सार
- पुलिस लगातार करती है पैरवी तब साल भर में आ पाती है रिपोर्ट
- कई बार रिपोर्ट आने के बाद भी मौत का कारण नहीं होता स्पष्ट
- लावारिस शव मिलने और खुदकुशी के मामलों में लटक जाती है रिपोर्ट
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बंद किया गया है कॉलेज
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ के शहर गोरखपुर में स्थित मेडिकल कॉलेज के पोस्टमार्टम हाउस के पास बने तीन कमरों में करीब 15 हजार लोगों की मौत की वजह जानने के लिए रखा गया विसरा बंद है। करीब 22 सालों से न ही इसे नष्ट किया गया है और न ही उसकी जांच कराकर रिपोर्ट मंगाने की कोई सुध ली गई।
जो मामले सुर्खियों में होते हैं उसकी पुलिस पैरवी कर विसरा को जांच के लिए भेजवाती है। लगातार पैरवी के बाद कहीं एक साल में रिपोर्ट आ पाती है। वह भी बीच में अफसर बदले तो जांच की फाइल भी धीरे से बंद हो जाती है।
जिन मामलों में मौत की वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं होती उसमें डॉक्टर मृतक का विसरा सुरक्षित कर देते हैं। यहीं से शुरू होता है इंतजार। चर्चित मामलों में ही रिपोर्ट आने में साल भर तक लग जाता है। लावारिस मिलने वाले शवों की तो दशक गुजर जाने के बाद भी रिपोर्ट नहीं आ पाती है।
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विडंबना यह भी है कि जांच के लिए विसरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजने के बाद पुलिस की पड़ताल भी अटकी रहती है। वहीं, कई ऐसे भी मामले होते हैं जिनमें विधि विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट तो आ जाती है लेकिन मौत की वजह स्पष्ट नहीं होती है। ऐसी रिपोर्ट ज्यादातर आत्महत्या और अज्ञात शव मिलने के मामलों में आती है।
पुलिस के अनुसार, जिन व्यक्तियों के शरीर पर चोट आदि का निशान नहीं होता और पोस्टमार्टम में उनकी मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता। डॉक्टर उनका विसरा सुरक्षित कर देते है। इसके बाद विसरा को बोतल में बंद कर रख दिया जाता है, जिस मामले में पुलिस पैरवी करती है सिर्फ उन्हीं विसरा को जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा जाता है।
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जो मामले सुर्खियों में होते हैं उसकी पुलिस पैरवी कर विसरा को जांच के लिए भेजवाती है। लगातार पैरवी के बाद कहीं एक साल में रिपोर्ट आ पाती है। वह भी बीच में अफसर बदले तो जांच की फाइल भी धीरे से बंद हो जाती है।
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जिन मामलों में मौत की वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं होती उसमें डॉक्टर मृतक का विसरा सुरक्षित कर देते हैं। यहीं से शुरू होता है इंतजार। चर्चित मामलों में ही रिपोर्ट आने में साल भर तक लग जाता है। लावारिस मिलने वाले शवों की तो दशक गुजर जाने के बाद भी रिपोर्ट नहीं आ पाती है।
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विडंबना यह भी है कि जांच के लिए विसरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजने के बाद पुलिस की पड़ताल भी अटकी रहती है। वहीं, कई ऐसे भी मामले होते हैं जिनमें विधि विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट तो आ जाती है लेकिन मौत की वजह स्पष्ट नहीं होती है। ऐसी रिपोर्ट ज्यादातर आत्महत्या और अज्ञात शव मिलने के मामलों में आती है।
पुलिस के अनुसार, जिन व्यक्तियों के शरीर पर चोट आदि का निशान नहीं होता और पोस्टमार्टम में उनकी मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता। डॉक्टर उनका विसरा सुरक्षित कर देते है। इसके बाद विसरा को बोतल में बंद कर रख दिया जाता है, जिस मामले में पुलिस पैरवी करती है सिर्फ उन्हीं विसरा को जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा जाता है।
देरी की वजह से नहीं आ पाती सटीक रिपोर्ट
विसरा जांच यदि छह महीने के भीतर कराई जाए तभी मौत की असल वजह सामने आती है। गोरखपुर में होने वाले मामलों में इसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। ज्यादातर मामलों में पुलिस विसरा जांच के लिए तभी भेजती है जब मृतक के परिवार वाले पुलिस पर दबाव बनाते हैं। इसमें देर होने पर रिपोर्ट में भी मौत का सही कारण पता नहीं चल पाता।
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विसरा में यह रखा जाता है सुरक्षित
लीवर का टुकड़ा, छोटी आंत का बीस इंच का टुकड़ा, दोनों तरफ की किडनी का टुकड़ा, पेट का हिस्सा बोतल में सुरक्षित कर जांच को भेजा जाता है।
पहले विसरा दस साल तक सुरक्षित रखने का नियम था लेकिन पांच साल पहले हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद विसरा तुरंत ही पुलिस को जांच के लिए भेजने को सौंप दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज के कमरों में बंद विसरा को निस्तारित कराया जाएगा।
- डॉ. श्रीकांत तिवारी, सीएमओ
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विसरा में यह रखा जाता है सुरक्षित
लीवर का टुकड़ा, छोटी आंत का बीस इंच का टुकड़ा, दोनों तरफ की किडनी का टुकड़ा, पेट का हिस्सा बोतल में सुरक्षित कर जांच को भेजा जाता है।
पहले विसरा दस साल तक सुरक्षित रखने का नियम था लेकिन पांच साल पहले हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद विसरा तुरंत ही पुलिस को जांच के लिए भेजने को सौंप दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज के कमरों में बंद विसरा को निस्तारित कराया जाएगा।
- डॉ. श्रीकांत तिवारी, सीएमओ