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जवानी में धोखा दे रही आंखें
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Thu, 28 Dec 2017 12:48 AM IST
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मोतियाबिंद अब बुजुर्गों का ही रोग नहीं रहा। युवा भी इसकी जद में आने लगे हैं। आलम यह है कि 40-45 साल की उम्र में ही उन्हें ऑपरेशन कराना पड़ रहा है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. बीएन तिवारी प्रदूषण और बिगड़ी जीवनशैली को इसका कारण बता रहे हैं।
लंबे समय से यह मान्यता रही है कि मोतियाबिंद बुजुर्गों का रोग है। 50 साल की अवस्था के बाद 40 फीसदी लोगों इसके शिकार होते हैं। लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है। जिला अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वाले 10 में से एक की उम्र औसतन 40 से 50 के बीच की होती है। डॉ. बीएन तिवारी के मुताबिक इससे पता चलता है कि उसे युवावस्था में ही मोतियाबिंद शुरू हुआ था। 40 साल की उम्र लांघने तक बीमारी इतनी बढ़ी जिससे ऑपरेशन की स्थिति आ गई।
अर्ली ऐज मोतियाबिंद का बड़ा कारण डायबिटीज
इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. एसपी सिंह ने डायबिटीज को अर्ली ऐज मोतियाबिंद का बड़ा कारण बताया। कहा कि बिगड़ी जीवनशैली से लोग तेजी से डायबिटीज की जद में आ रहे हैं। इससे युवावस्था में ही मोतियाबिंद की समस्या सामने आ रही है। मेडिकल कॉलेज में इन दिनों हर रोज 100 मोतियाबिंद मरीजों की सर्जरी हो रही है। इनमें करीब सात फीसदी रोगी 50 की उम्र के नीचे के हैं। आंखों में छोटी दिक्कत पर खुद से ड्राप खरीदकर इस्तेमाल करना भी इसका एक बड़ा कारण है।
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सर्वाधिक पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद
युवाओं में पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। डॉ. बीएन तिवारी ने बताया कि जिला अस्पताल में 40 से 50 साल के बीच के कई मरीजों पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद इतना बढ़ गया था कि ऑपरेशन करना पड़ा।
ऑपरेशन ही इलाज
मोतियाबिंद ऐसी बीमारी है कि ऑपरेशन के अलावा उसका अन्य कोई इलाज नहीं। हालांकि शुरुआती स्थिति में कुछ दवाओं से इसके विस्तार को रोका जा सकता है। नेत्र चिकित्सक ऐसी ड्राप आंखों में डालने को देते हैं, जो लेंस में क्रिस्टलीन प्रोटीन जमने से रोकती है। इससे लेंस की पारदर्शिता बढ़ती है। इसके साथ ही देखने की क्षमता बढ़ाने के लिए चश्मा भी दिया जाता है।
सावधानी जरूरी
डॉ. बीएन तिवारी के मुताबिक थोड़ी सावधानी से युवा इस बीमारी से आंखों की रोशनी खोने से बचा सकते हैं। आंखों की रोशनी में समस्या महसूस हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। जिससे शुरुआती चरण में इसे दवाओं से कंट्रोल किया जा सके। इसके साथ ही हरी सब्जियां, फल और एंटी ऑक्सीडेंट वाले आहार लेने चाहिए। चश्मा लगा है, तो समय-समय पर नंबर की जांच करानी चाहिए। इसके साथ ही तेज धूप में धूप के चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए। हाइपर टेंशन और मधुमेह है, तो इसे नियंत्रित रखना जरूरी है। शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूरी भी जरूरी है।
ये हैं लक्षण
धुंधला दिखना, दोहरा दिखना, रंग फीके नजर आना, हल्की रोशनी का तेज प्रतीत होना, रोशनी के चारों ओर गोल घेरा महसूस होना, रात या कम रोशनी में दृष्टी बेहद कम हो जाना और बार-बार चश्मे का नंबर बदलना इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है।
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लंबे समय से यह मान्यता रही है कि मोतियाबिंद बुजुर्गों का रोग है। 50 साल की अवस्था के बाद 40 फीसदी लोगों इसके शिकार होते हैं। लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है। जिला अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वाले 10 में से एक की उम्र औसतन 40 से 50 के बीच की होती है। डॉ. बीएन तिवारी के मुताबिक इससे पता चलता है कि उसे युवावस्था में ही मोतियाबिंद शुरू हुआ था। 40 साल की उम्र लांघने तक बीमारी इतनी बढ़ी जिससे ऑपरेशन की स्थिति आ गई।
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अर्ली ऐज मोतियाबिंद का बड़ा कारण डायबिटीज
इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. एसपी सिंह ने डायबिटीज को अर्ली ऐज मोतियाबिंद का बड़ा कारण बताया। कहा कि बिगड़ी जीवनशैली से लोग तेजी से डायबिटीज की जद में आ रहे हैं। इससे युवावस्था में ही मोतियाबिंद की समस्या सामने आ रही है। मेडिकल कॉलेज में इन दिनों हर रोज 100 मोतियाबिंद मरीजों की सर्जरी हो रही है। इनमें करीब सात फीसदी रोगी 50 की उम्र के नीचे के हैं। आंखों में छोटी दिक्कत पर खुद से ड्राप खरीदकर इस्तेमाल करना भी इसका एक बड़ा कारण है।
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सर्वाधिक पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद
युवाओं में पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। डॉ. बीएन तिवारी ने बताया कि जिला अस्पताल में 40 से 50 साल के बीच के कई मरीजों पोस्टेरियर सबकैप्सुलर मोतियाबिंद इतना बढ़ गया था कि ऑपरेशन करना पड़ा।
ऑपरेशन ही इलाज
मोतियाबिंद ऐसी बीमारी है कि ऑपरेशन के अलावा उसका अन्य कोई इलाज नहीं। हालांकि शुरुआती स्थिति में कुछ दवाओं से इसके विस्तार को रोका जा सकता है। नेत्र चिकित्सक ऐसी ड्राप आंखों में डालने को देते हैं, जो लेंस में क्रिस्टलीन प्रोटीन जमने से रोकती है। इससे लेंस की पारदर्शिता बढ़ती है। इसके साथ ही देखने की क्षमता बढ़ाने के लिए चश्मा भी दिया जाता है।
सावधानी जरूरी
डॉ. बीएन तिवारी के मुताबिक थोड़ी सावधानी से युवा इस बीमारी से आंखों की रोशनी खोने से बचा सकते हैं। आंखों की रोशनी में समस्या महसूस हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। जिससे शुरुआती चरण में इसे दवाओं से कंट्रोल किया जा सके। इसके साथ ही हरी सब्जियां, फल और एंटी ऑक्सीडेंट वाले आहार लेने चाहिए। चश्मा लगा है, तो समय-समय पर नंबर की जांच करानी चाहिए। इसके साथ ही तेज धूप में धूप के चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए। हाइपर टेंशन और मधुमेह है, तो इसे नियंत्रित रखना जरूरी है। शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूरी भी जरूरी है।
ये हैं लक्षण
धुंधला दिखना, दोहरा दिखना, रंग फीके नजर आना, हल्की रोशनी का तेज प्रतीत होना, रोशनी के चारों ओर गोल घेरा महसूस होना, रात या कम रोशनी में दृष्टी बेहद कम हो जाना और बार-बार चश्मे का नंबर बदलना इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है।