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बड़कू-छोटकू को भूले नहीं हैं थिएटर के शौकीन
Gorakhpur
Updated Tue, 23 Sep 2014 05:30 AM IST
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गोरखपुर। मंच पर खड़े हों या चहलकदमी कर रहते हों या फिर आपस में झगड़ा, दर्शकों के हिस्से में तो बस ठहाके होते थे। पांच से दस मिनट के लिए मंच पर मौजूदगी भर से महफिल पर उनका कब्जा तय था। और उस पर खासियत यह कि कोई स्क्रिप्ट नहीं, जो गढ़ लिया और कह दिया, वह स्क्रिप्ट बन जाता। जुड़वा भाइयों बड़कू-छोटकू की यह जोड़ी थिएटर के शौकीनों को अब भी याद है। उनके कई मुरीदीनों ने उन्हें लॉरेल-हार्डी के भारतीय संस्करण की उपाधि दे डाली थी। बड़कू (ओम प्रकाश श्रीवास्तव) और छोटकू (ज्ञान प्रकाश श्रीवास्तव) ने पूर्वांचल में रंगमंच की ठोस बुनियाद रखी और रंगकर्म के लिए समर्पण की बेमिसाल नज़ीर भी पेश की। 60 और 70 के दशक में यह जोड़ी किसी नाटक की लोकप्रियता की गारंटी बन गई थी।
रुढ़िवादी सोच और रंगकर्म के हिकारत भरी तल्खी-ताने और घर वालों की उपेक्षा के भाव के बीच रंगमंच की अलख जगाना आसान नहीं था। कभी रात को घर से चुपके से निकल जाना तो कभी खिड़की के रास्ते आधी रात को घर में दाखिल होकर खाली पेट सो जाना और फिर सुबह घरवालों की फटकार, अपने रंगमंच प्रेम के लिए बड़कू-छोटकू ने यह सब कुछ किया-सहा। यह भी संयोग था कि रंगमंच पर हमेशा साथ दिखने वाले बड़कू-छोटकू जिंदगी के रंगमंच पर भी एक साथ ही आए। साथ जन्म, साथ पढ़ाई, साथ नौकरी, साथ रिटायरमेंट और एक ही तिथि पर इस दुनिया से रुखसत होना दोनों कलाकारों के अनूठे साथ की बानगी है।
उनकी रंगयात्रा की शुरुआत 1948 में हुई, लेकिन रंग जमाने का सिलसिला 1953 से शुरू हुआ। मशहूर रंगकर्मी हसन अब्बास रिज़वी बताते हैं कि पूर्वोत्तर रेलवे की शताब्दी मनाई जा रही थी, कई दिनों का समारोह था। ‘रेलवे आर्ट सोसायटी’ ‘शाहजहां’ नाटक का मंचन कर रही थी। एक सीन से दूसरे के सीन के बोझिल अंतराल को भरने की जिम्मेदारी इस जोड़ी को सौंपी गई। पांच अंतराल में उन्होंने पांच अलग विषयों पर तरह-तरह की भाव-भंगिमाओं के साथ चुटीली प्रस्तुति से इस कदर गुदगुदाया कि उसके बाद दर्शक उन्हें हर नाटक के बीच तलाशने लगे। ऐसी स्थिति भी आई जब लघु नाटिकाएं मुख्य नाटक पर भारी पड़ने लगीं। उस समय के प्रख्यात रंगकर्मी वीरेंद्र नाथ बनर्जी ने एक बार तो मजाक में यह भी कह डाला कि ‘मेरा बस चले तो इन दोनों भाइयों को मंच पर चढ़ने ही न दूं।’
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पृथ्वीराज कपूर का न्योता
1955 में पृथ्वीराज कपूर अपनी नाट्य मंडली के साथ गोरखपुर आए थे। उनके कुछ हास्य कलाकार साथ नहीं आ सके थे सो उन्होंने विजय थिएटर के मालिक से शहर के हास्य कलाकारों के बारे में पूछा। उन्होंने बड़कू-छोटकू की प्रतिभा के बारे में बताया। दोनों भाइयों को बुलाया गया। हफ्ते भर तक दोनों ने बिना कोई पारिश्रमिक लिए पूरी शिद्दत से पृथ्वी थिएटर के नाटकों में काम किया। जाते हुए पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया, लेकिन अपनी रेलवे की नौकरी और घर की जिम्मेदारियों के चलते दोनों का मुंबई जाना कभी संभव नहीं हो सका। 1958 में भोपाल में ़ड्रामा कम्पीटिशन में रेलवे आर्ट सोसायटी की टीम गई और निर्णायक मंडल में थे पृथ्वीराज कपूर। उन्होंने दोनों को पकड़ा और पूछा कि बंबई क्यों नहीं आए तो जवाब मिला, ‘फिर हमारे शहर के नाटकों क्या होता?’
बलराज साहनी और आईएस जौहर ने सराहा था
1958 में रेलवे आर्ट सोसायटी की टीम के साथ बड़कू-छोटकू का ड्रामा कंपटीशन के लिए भोपाल जाना हुआ। वहां जज की भूमिका में बलराज साहनी व आईएस जौहर थे। दोनों ही जज बड़कू-छोटकू से इस कदर प्रभावित हुए बुलाकर कहा कि ‘अच्छे कलाकार हो, मुंबई क्यों नहीं आए?’। बड़कू का दो-टूक जवाब था- हमारे शहर के नाटकों का क्या होगा।
बड़कू व छोटकू की साझी जीवन यात्रा
जन्म तिथि : एक मार्च 1925
जन्म स्थान : नगवां जैतपुर, सहजनवां, गोरखपुर
नौकरी : पोस्ट ऑफिस, शिक्षण, पूर्वोत्तर रेलवे
मृत्यु : 10 नवंबर 1999(छोटकू) व 10 दिसंबर 2001(बड़कू)
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रुढ़िवादी सोच और रंगकर्म के हिकारत भरी तल्खी-ताने और घर वालों की उपेक्षा के भाव के बीच रंगमंच की अलख जगाना आसान नहीं था। कभी रात को घर से चुपके से निकल जाना तो कभी खिड़की के रास्ते आधी रात को घर में दाखिल होकर खाली पेट सो जाना और फिर सुबह घरवालों की फटकार, अपने रंगमंच प्रेम के लिए बड़कू-छोटकू ने यह सब कुछ किया-सहा। यह भी संयोग था कि रंगमंच पर हमेशा साथ दिखने वाले बड़कू-छोटकू जिंदगी के रंगमंच पर भी एक साथ ही आए। साथ जन्म, साथ पढ़ाई, साथ नौकरी, साथ रिटायरमेंट और एक ही तिथि पर इस दुनिया से रुखसत होना दोनों कलाकारों के अनूठे साथ की बानगी है।
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उनकी रंगयात्रा की शुरुआत 1948 में हुई, लेकिन रंग जमाने का सिलसिला 1953 से शुरू हुआ। मशहूर रंगकर्मी हसन अब्बास रिज़वी बताते हैं कि पूर्वोत्तर रेलवे की शताब्दी मनाई जा रही थी, कई दिनों का समारोह था। ‘रेलवे आर्ट सोसायटी’ ‘शाहजहां’ नाटक का मंचन कर रही थी। एक सीन से दूसरे के सीन के बोझिल अंतराल को भरने की जिम्मेदारी इस जोड़ी को सौंपी गई। पांच अंतराल में उन्होंने पांच अलग विषयों पर तरह-तरह की भाव-भंगिमाओं के साथ चुटीली प्रस्तुति से इस कदर गुदगुदाया कि उसके बाद दर्शक उन्हें हर नाटक के बीच तलाशने लगे। ऐसी स्थिति भी आई जब लघु नाटिकाएं मुख्य नाटक पर भारी पड़ने लगीं। उस समय के प्रख्यात रंगकर्मी वीरेंद्र नाथ बनर्जी ने एक बार तो मजाक में यह भी कह डाला कि ‘मेरा बस चले तो इन दोनों भाइयों को मंच पर चढ़ने ही न दूं।’
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पृथ्वीराज कपूर का न्योता
1955 में पृथ्वीराज कपूर अपनी नाट्य मंडली के साथ गोरखपुर आए थे। उनके कुछ हास्य कलाकार साथ नहीं आ सके थे सो उन्होंने विजय थिएटर के मालिक से शहर के हास्य कलाकारों के बारे में पूछा। उन्होंने बड़कू-छोटकू की प्रतिभा के बारे में बताया। दोनों भाइयों को बुलाया गया। हफ्ते भर तक दोनों ने बिना कोई पारिश्रमिक लिए पूरी शिद्दत से पृथ्वी थिएटर के नाटकों में काम किया। जाते हुए पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें मुंबई आने का न्योता दिया, लेकिन अपनी रेलवे की नौकरी और घर की जिम्मेदारियों के चलते दोनों का मुंबई जाना कभी संभव नहीं हो सका। 1958 में भोपाल में ़ड्रामा कम्पीटिशन में रेलवे आर्ट सोसायटी की टीम गई और निर्णायक मंडल में थे पृथ्वीराज कपूर। उन्होंने दोनों को पकड़ा और पूछा कि बंबई क्यों नहीं आए तो जवाब मिला, ‘फिर हमारे शहर के नाटकों क्या होता?’
बलराज साहनी और आईएस जौहर ने सराहा था
1958 में रेलवे आर्ट सोसायटी की टीम के साथ बड़कू-छोटकू का ड्रामा कंपटीशन के लिए भोपाल जाना हुआ। वहां जज की भूमिका में बलराज साहनी व आईएस जौहर थे। दोनों ही जज बड़कू-छोटकू से इस कदर प्रभावित हुए बुलाकर कहा कि ‘अच्छे कलाकार हो, मुंबई क्यों नहीं आए?’। बड़कू का दो-टूक जवाब था- हमारे शहर के नाटकों का क्या होगा।
बड़कू व छोटकू की साझी जीवन यात्रा
जन्म तिथि : एक मार्च 1925
जन्म स्थान : नगवां जैतपुर, सहजनवां, गोरखपुर
नौकरी : पोस्ट ऑफिस, शिक्षण, पूर्वोत्तर रेलवे
मृत्यु : 10 नवंबर 1999(छोटकू) व 10 दिसंबर 2001(बड़कू)