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नगर निगम की लापरवाही से रैन बसेरे बदहाल
Gorakhpur
Updated Mon, 13 Jan 2014 05:44 AM IST
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गोरखपुर। नगर निगम की लापरवाही से शहर के रैन बसेरे बदहाल हैं। किसी में ताला बंद है तो कुछ खाली पडे़ हैं। इनके देख-रेख की जिम्मेदारी स्वयंसेवी संस्थाओं के ऊपर है मगर इनके रख-रखाव पर आने वाले खर्च की आधी राशि का भुगतान नगर निगम को करना होता है लेकिन निगम ने दो साल से बकाए का भुगतान नहीं किया है। नतीजतन इनमें ताले लगने लगे जबकि लोग कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर रात गुजार रहे हैं।
2011 में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने शहर के रैन बसेरों में बेहतर इंतजाम की कवायद शुरू की थी। इसके लिए तीन स्वयंसेवी संस्थाओं (मातृछाया, श्रेयस और मानव सेवा संस्थान) को अपने साथ जोड़ा। कमिश्नर के रविंद्र नायक की मौजूदगी में नगर निगम और इन स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ करार हुआ। इसमें इनके रख-रखाव पर हर माह करीब 8400 रुपये का खर्च तय किया गया। नगर निगम और स्वयंसेवी संस्थाओं को आधा-आधा खर्च वहन करने की सहमति बनी। 2011 से आज तक नगर निगम की ओर से इन स्वयंसेवी संस्थाओं को एक भी पैसे का भुगतान नहीं किया गया। मानव सेवा संस्थान के संचालक राजेश मणि त्रिपाठी का कहना है कि कई बार इस भुगतान के लिए नगर निगम के अधिकारियों से बात की गई, लेकिन कोई भी भुगतान नहीं किया गया है। इस वजह से उन्होंने मोहरीपुर रैन बसेरा को नगर निगम को वापस कर दिया है। श्रेयस संस्था के अजीत नायक का कहना है कि रैन बसेरों के संचालन के दौरान उन्हें साफ-सुथरा रखने के लिए प्रति दिन तीन शिफ्ट में लोग रखे जाते हैं। उन्हें कम से कम मनरेगा मजदूरों इतनी तो मजदूरी तो देना जरूरी है। मातृछाया संस्था के चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी का कहना है कि इन सबके बावजूद सभी रैन बसेरों का संचालन किया जा रहा है। 2011 में करार के बाद से नगर निगम ने अब तक एक भी पैसा नहीं दिया है। उधर, नगर निगम के मुख्य अभियंता जितेंद्र केन ने माना कि अभी तक रैन बसेरा संचालकों को कोई भी भुगतान नहीं किया गया, साथ ही कहा कि तीन स्वयंसेवी संस्थाओं से सत्यापन रिपोर्ट देने को कहा गया है।
तीमारदारों का आसरा भी बदहाल
गोरखपुर। जिला अस्पताल में इस कड़ाके की ठंड से निपटने के इंतजाम नाकाफी है। रैन बसेरा किचन बन चुका है और सामुदायिक किचन में एक सिलिंडर और चूल्हा बचा हुआ है। मरीजों को कंबल तो मिले है लेकिन उसकी धुलाई कब हुई है यह किसी को पता ही नहीं। चादरों का भी बुरा हाल है। अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों को अस्पताल की ओर से कंबल दिए जाते हैं, लेकिन यह इतने पतले हैं कि ठंड की रात गुजारना मुश्किल होता है। कुछ मरीजों को दो कंबल तो उपलब्ध करा दिए जाते हैं लेकिन गंदा होने की वजह से लोग अपने कंबल के भरोसे ही काम चला रहे हैं। बताया जाता है कि चार साल पहले 1400 कंबल खरीदे गए थे लेकिन अब 460 कंबल बचे है। एक कर्मचारी ने बताया कि कंबल की यदि तीन बार धुलाई कर दी जाए तो वह फट जाता है। वहीं एचआईवी पीड़ित और जले मरीजों को दिए जाने वाले कंबल को जला दिया जाता है। हर साल 100 से ज्यादा कंबल खराब हो जा रहे है। ज्यादा गंदे कंबल की ठंड खत्म होने के बाद धुलाई कराकर रख दिया जाता है फिर वहीं कंबल मरीजों को दिया जाता है। गंदे कंबल होने की वजह से मरीज इसका इस्तेमाल कम ही कर रहे हैं। मरीजों के लिए अस्पताल में हीटर की भी व्यवस्था है, लेकिन वह स्टोर में ही बंद है। जबकि कुछ दिनों पूर्व अस्पताल प्रशासन की ओर से यह दावा किया गया था कि दस हीटर बनवाने का आदेश दिया गया है और जरूरतमंदों को हीटर उपलब्ध करा दिया जाएगा। तीमारदारों के लिए बना रैन बसेरा बदहाल पड़ा हुआ है। लोग उसका इस्तेमाल किचन के रूप में कर रहे हैं जिस कारण वहां पर काफी गंदगी फैली हुई है।
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बरामदे में बना रहे भोजन
गोरखपुर। सामुदायिक किचन में एक सिलिंडर होने की वजह से तीमारदारों की लाइन लग जाती है। इस कारण मरीज बरामदे में अपने छोटे सिलिंडर का इस्तेमाल करके ही भोजन बना रहे हैं। जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। जबकि बरामदे में भोजन बनने की वजह से गंदगी और हादसे का भी डर होता है। बच्चों को दूध और गर्म पानी की जरूरत पड़ने पर बाहर चाय बेचने वालों से ही मदद लेनी पड़ती है। संचालक ने बताया कि पांच सिलिंडर व चूल्हा होता है। चार चूल्हा खराब होने की वजह से हटाया गया है, जल्द ही उसे लगा दिया जाएगा।
मरीजों को दो कंबल दिया जा रहा है। कंबल की धुलाई होने के बाद ही मरीजों को दिया जाता है। हीटर बन गया है और जिस मरीज को इसकी जरूरत होगी उसे उपलब्ध कराया जाएगा। रैन बसेरा की सफाई होती है।
डॉ. सुधाकर मिश्रा, एसआईसी, जिला अस्पताल
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2011 में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने शहर के रैन बसेरों में बेहतर इंतजाम की कवायद शुरू की थी। इसके लिए तीन स्वयंसेवी संस्थाओं (मातृछाया, श्रेयस और मानव सेवा संस्थान) को अपने साथ जोड़ा। कमिश्नर के रविंद्र नायक की मौजूदगी में नगर निगम और इन स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ करार हुआ। इसमें इनके रख-रखाव पर हर माह करीब 8400 रुपये का खर्च तय किया गया। नगर निगम और स्वयंसेवी संस्थाओं को आधा-आधा खर्च वहन करने की सहमति बनी। 2011 से आज तक नगर निगम की ओर से इन स्वयंसेवी संस्थाओं को एक भी पैसे का भुगतान नहीं किया गया। मानव सेवा संस्थान के संचालक राजेश मणि त्रिपाठी का कहना है कि कई बार इस भुगतान के लिए नगर निगम के अधिकारियों से बात की गई, लेकिन कोई भी भुगतान नहीं किया गया है। इस वजह से उन्होंने मोहरीपुर रैन बसेरा को नगर निगम को वापस कर दिया है। श्रेयस संस्था के अजीत नायक का कहना है कि रैन बसेरों के संचालन के दौरान उन्हें साफ-सुथरा रखने के लिए प्रति दिन तीन शिफ्ट में लोग रखे जाते हैं। उन्हें कम से कम मनरेगा मजदूरों इतनी तो मजदूरी तो देना जरूरी है। मातृछाया संस्था के चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी का कहना है कि इन सबके बावजूद सभी रैन बसेरों का संचालन किया जा रहा है। 2011 में करार के बाद से नगर निगम ने अब तक एक भी पैसा नहीं दिया है। उधर, नगर निगम के मुख्य अभियंता जितेंद्र केन ने माना कि अभी तक रैन बसेरा संचालकों को कोई भी भुगतान नहीं किया गया, साथ ही कहा कि तीन स्वयंसेवी संस्थाओं से सत्यापन रिपोर्ट देने को कहा गया है।
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तीमारदारों का आसरा भी बदहाल
गोरखपुर। जिला अस्पताल में इस कड़ाके की ठंड से निपटने के इंतजाम नाकाफी है। रैन बसेरा किचन बन चुका है और सामुदायिक किचन में एक सिलिंडर और चूल्हा बचा हुआ है। मरीजों को कंबल तो मिले है लेकिन उसकी धुलाई कब हुई है यह किसी को पता ही नहीं। चादरों का भी बुरा हाल है। अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों को अस्पताल की ओर से कंबल दिए जाते हैं, लेकिन यह इतने पतले हैं कि ठंड की रात गुजारना मुश्किल होता है। कुछ मरीजों को दो कंबल तो उपलब्ध करा दिए जाते हैं लेकिन गंदा होने की वजह से लोग अपने कंबल के भरोसे ही काम चला रहे हैं। बताया जाता है कि चार साल पहले 1400 कंबल खरीदे गए थे लेकिन अब 460 कंबल बचे है। एक कर्मचारी ने बताया कि कंबल की यदि तीन बार धुलाई कर दी जाए तो वह फट जाता है। वहीं एचआईवी पीड़ित और जले मरीजों को दिए जाने वाले कंबल को जला दिया जाता है। हर साल 100 से ज्यादा कंबल खराब हो जा रहे है। ज्यादा गंदे कंबल की ठंड खत्म होने के बाद धुलाई कराकर रख दिया जाता है फिर वहीं कंबल मरीजों को दिया जाता है। गंदे कंबल होने की वजह से मरीज इसका इस्तेमाल कम ही कर रहे हैं। मरीजों के लिए अस्पताल में हीटर की भी व्यवस्था है, लेकिन वह स्टोर में ही बंद है। जबकि कुछ दिनों पूर्व अस्पताल प्रशासन की ओर से यह दावा किया गया था कि दस हीटर बनवाने का आदेश दिया गया है और जरूरतमंदों को हीटर उपलब्ध करा दिया जाएगा। तीमारदारों के लिए बना रैन बसेरा बदहाल पड़ा हुआ है। लोग उसका इस्तेमाल किचन के रूप में कर रहे हैं जिस कारण वहां पर काफी गंदगी फैली हुई है।
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बरामदे में बना रहे भोजन
गोरखपुर। सामुदायिक किचन में एक सिलिंडर होने की वजह से तीमारदारों की लाइन लग जाती है। इस कारण मरीज बरामदे में अपने छोटे सिलिंडर का इस्तेमाल करके ही भोजन बना रहे हैं। जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। जबकि बरामदे में भोजन बनने की वजह से गंदगी और हादसे का भी डर होता है। बच्चों को दूध और गर्म पानी की जरूरत पड़ने पर बाहर चाय बेचने वालों से ही मदद लेनी पड़ती है। संचालक ने बताया कि पांच सिलिंडर व चूल्हा होता है। चार चूल्हा खराब होने की वजह से हटाया गया है, जल्द ही उसे लगा दिया जाएगा।
मरीजों को दो कंबल दिया जा रहा है। कंबल की धुलाई होने के बाद ही मरीजों को दिया जाता है। हीटर बन गया है और जिस मरीज को इसकी जरूरत होगी उसे उपलब्ध कराया जाएगा। रैन बसेरा की सफाई होती है।
डॉ. सुधाकर मिश्रा, एसआईसी, जिला अस्पताल