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सिसई की मिट्टी में लहलहा रही सपनों की फसल
अमर उजाला/गाोरख्ापुर
Updated Sat, 03 Nov 2018 12:53 AM IST
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सत्येंद्र भारद्वाज
गोपालपुर। वे मंच पर हों तो श्रोताओं को खूब हंसाते हैं। अपने चुटीले व्यंग्य की मजमेबाजी से देश ही नहीं दुनिया के कई देशों तक चर्चित कवि दिनेश बावरा लेकिन जब अपने गांव गोला ब्लॉक के सिसई आते हैं तो अपनी पैतृक जमीन पर सपने बोते हैं। यह सपना है, पूर्वांचल के इस इलाके को जैविक खेती का अगुआ बनाना। शहरों की ओर भाग रहे युवाओं को गांव में रोकना और इस युवा ताकत की बदौलत गांवों की तकदीर बदलना।
दिनेश मिश्र बावरा ने जैवकि पद्धति से अरहर की ऐसी फसल तैयार की है जिसे एक बार बोकर पांच साल उपज हासिल की जा सकती है। रसायनमुक्त और किसानों के लिए बेहद फायदेमंद व्यवसायिक खेती की यह नजीर नील के बाद हल्दी, गन्ना आदि फसलों से मुंह मोड़ रहे इलाके के किसानों के लिए नई राह दिखा रही है। दिनेश ने तीन माह पहले एक एकड़ खेत में अरहर के पौधों की नर्सरी लगवाकर बेरोजगार युवाओं को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि कृषि वैज्ञानिक आकाश चौरसिया के निर्देश में अरहर की बुवाई की गई। रोजगार के लिए युवाओं का पलायन को रोकना इस पहल का उद्देश्य है।
वह खुद मुंबई से नियमित यहां आते हैं। खेत में काम करते हैं ताकि युवाओं का रुझान व्यवसायिक खेती में बढ़े।
दिनेश बावरा का मानना है कि जैविक खेती आज राष्ट्रीय और वैश्विक आवश्यकता है। भविष्य का सबसे बड़ा रोजगार भी यही होगा। यूरिया, डीएपी और फास्फेट जैसे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल को भले हरित क्रांति कहा गया लेकिन खेत बंजर होने लगे। फसलों के साथ ये रसायन इंसानी शरीर में प्रवेश कर बीमारियों का कारण बनने लगे। तब दुनिया जैविक खेती की ओर देखने लगी। भारत की तो यह प्राचीनतम थाती है। इसलिए उन्होंने इसे चुना।
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गोपालपुर। वे मंच पर हों तो श्रोताओं को खूब हंसाते हैं। अपने चुटीले व्यंग्य की मजमेबाजी से देश ही नहीं दुनिया के कई देशों तक चर्चित कवि दिनेश बावरा लेकिन जब अपने गांव गोला ब्लॉक के सिसई आते हैं तो अपनी पैतृक जमीन पर सपने बोते हैं। यह सपना है, पूर्वांचल के इस इलाके को जैविक खेती का अगुआ बनाना। शहरों की ओर भाग रहे युवाओं को गांव में रोकना और इस युवा ताकत की बदौलत गांवों की तकदीर बदलना।
दिनेश मिश्र बावरा ने जैवकि पद्धति से अरहर की ऐसी फसल तैयार की है जिसे एक बार बोकर पांच साल उपज हासिल की जा सकती है। रसायनमुक्त और किसानों के लिए बेहद फायदेमंद व्यवसायिक खेती की यह नजीर नील के बाद हल्दी, गन्ना आदि फसलों से मुंह मोड़ रहे इलाके के किसानों के लिए नई राह दिखा रही है। दिनेश ने तीन माह पहले एक एकड़ खेत में अरहर के पौधों की नर्सरी लगवाकर बेरोजगार युवाओं को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि कृषि वैज्ञानिक आकाश चौरसिया के निर्देश में अरहर की बुवाई की गई। रोजगार के लिए युवाओं का पलायन को रोकना इस पहल का उद्देश्य है।
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वह खुद मुंबई से नियमित यहां आते हैं। खेत में काम करते हैं ताकि युवाओं का रुझान व्यवसायिक खेती में बढ़े।
दिनेश बावरा का मानना है कि जैविक खेती आज राष्ट्रीय और वैश्विक आवश्यकता है। भविष्य का सबसे बड़ा रोजगार भी यही होगा। यूरिया, डीएपी और फास्फेट जैसे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल को भले हरित क्रांति कहा गया लेकिन खेत बंजर होने लगे। फसलों के साथ ये रसायन इंसानी शरीर में प्रवेश कर बीमारियों का कारण बनने लगे। तब दुनिया जैविक खेती की ओर देखने लगी। भारत की तो यह प्राचीनतम थाती है। इसलिए उन्होंने इसे चुना।
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