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शैल पुत्री की आराधना कर की गई कलश की स् थापन

Fri, 22 Sep 2017 01:32 AM IST
Updated Fri, 22 Sep 2017 01:32 AM IST
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शैल पुत्री की आराधना कर की गई कलश की स्
थापन

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गोरखपुर।
गोलघर और दाउदपुर की काली मंदिर वैसे तो साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है लेकिन नवरात्र में देवी की उपासना के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। गुरुवार को नवरात्र के पहले दिन दोनों मंदिरों में सुबह से लेकर देर शाम तक श्रद्धालुओं ने पूजन कर मां का आशीर्वाद लिया। दाउदपुर स्थित प्राचीन काली मंदिर की मान्यता है कि अगर भक्त सच्चे मन से कोई मुराद मांग ले तो वह मां काली अवश्य पूरा करती हैैं। वहीं गोलघर में काली माता मंदिर की मान्यता है कि जो भी यहां आया और मां की पूजा कर मन्नत मांगी, वह कभी निराश नहीं लौटा। यही कारण है कि मां के दरबार में हर साल दूर-दूर से लोग पूजन के लिए आते हैं।

हलवा, पूड़ी चढ़ाने से होती हैं मन्नत पूरी
दाउदपुर काली मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है। मंदिर के अभिलेखों में निर्माण 1870 दर्ज है। पहले मंदिर में मां काली का पिंड था, जिसे भक्त पूजते थे। जैसे-जैसे भक्तों की भीड़ बढ़ी वैसे-वैसे मंदिर का रूप बदलता गया। 2003 में भक्तों की मदद से मूर्ति का जीर्णोद्घार हुआ। पुजारी विजय शंकर पांडेय बताते हैं कि मंदिर में जो भी भक्त नौ दिनों तक मां काली की सच्चे मन से पूजा करता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। सप्तमी, अष्टमी व नवमी में भक्त हलुवा, पूड़ी की कढ़ाई चढ़ाते हैं। यही प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है। नौ दिनों तक सुबह शाम दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है। अखंड की ज्योति हमेशा जलती रहती है। मां का शृंगार रोज होता है। मौजूदा समय में माता काली के अलावा दुर्गा, शीतला, काल भैरव आदि की मूर्तियां है।
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नारियल पानी चढ़ाने से सब कष्ट दूर
गोलघर के काली मंदिर में आमतौर पर भी भक्तों की भीड़ होती है लेकिन नवरात्र में मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। पुजारी श्रवण साहनी बताते हैं मंदिर की नींव कब पड़ी। यह जानकारी तो नहीं है लेकिन मेरे परिवार की पांच पीढ़ियां मंदिर की सेवा करती आ रही हैं। पुराने समय में माता का पिंड था, जिसे मंडप का रूप देकर बनाया गया। बाद में भक्तों की मदद से मंदिर का नया रूप दिया गया। माता के पिंड पर नारियल का पानी चढ़ाकर भक्त पानी को प्रसाद के रूप में रखते हैं। मान्यता ऐसी है कि पानी पीने से सब कष्ट दूर हो जाते है। यही वजह है कि मंदिर में नारियल, पेड़ा, चुनरी, कपूर, अगरबत्ती व सिंदूर चढ़ाया जाता है। बताते हैं कि दोपहर में 12 से एक बजे के बीच में मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है। नवरात्र में सुबह पांच बजे व शाम को सात बजे आरती होती है। काली माता के अलावा मंदिर में शीतला, दुर्गा, संतोषी माता की मूर्तियां है। वहीं बगल में हनुमान की भी पूजा होती है।
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