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विकलांग व्यवस्था में फंसा इंसेफेलाइटिस पीड़ित दिव्यांग का हक
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Wed, 25 Oct 2017 01:50 AM IST
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बेटे को मुआवजा दिलाने के लिए प्रमाण पत्र लेकर सीएमओ दफ्तर पहुंचे रामसजीवन।
- फोटो : Amar Ujala
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तीन बरस पहले नियति की मार झेली थी। अब वह व्यवस्था की मार झेल रहे हैं। तब बीमार बेटे की जान सांसत में देखकर वह रोए थे। अब जिंदा बेटे के लिए वह फूट-फूटकर रो रहे हैं। सीएमओ कार्यालय के आगे रामसजीवन की बरसती आंखों और लरजती आवाज जिसने सुनी-देखी, भावुक हो गया। आम लोगों ने उन्हें ढांढस बंधाया, मगर उस ‘साहब’ से दिलासा भी न मिला, जिसके पास बड़ी आस लिए आए थे। इंसेफेलाइटिस से दिव्यांग बेटे के मुआवजे के लिए तीन वर्ष से भटक रहे इस पिता की पीड़ा जस की तस रह गई। लोगों ने आंसू पोंछे तो वह विकलांग व्यवस्था में फंसे दिव्यांग बेटे को हक दिलाने के लिए ‘बड़े साहब’ से मिलने को निकल गए।
गोरखनाथ इलाके के रामपुर नया गांव निवासी रामसजीवन भारती मजदूरी छोड़कर मंगलवार को सीएमओ कार्यालय आए थे। पिछले तीन वर्षों में 10 वर्षीय बेटे रितीश कुमार के हक के लिए न जाने कितनी बार इस गरीब की दिहाड़ी छूटी है। तीन वर्ष पहले बेटे को इंसेफेलाइटिस ने जकड़ा। रामसजीवन उसे बचाने के लिए मेडिकल कॉलेज ले गए। जान तो बच गई, लेकिन रितीश शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हो गया। हालत ऐसी कि वह शंका आने पर भी बता न सके। ऐसे में रामसजीवन को दिन-रात बेटे के भविष्य की चिंता सताती रहती है। अनपढ़ रामसजीवन तीन साल से बेटे को इंसेफेलाइटिस पीड़ित दिव्यांगों को दिया जाने वाला मुआवजा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। मंगलवार को उन्हें सीएमओ कार्यालय से एडी हेल्थ कार्यालय जाने को कह दिया गया। रोते हुए रामसजीवन ने कहा कि कभी मेडिकल कॉलेज से ब्लॉक कार्यालय तो कभी ब्लॉक कार्यालय से सीएमओ दफ्तर भेज दिया जाता है।
छोटे बेटे की भी चिंता
इस वर्ष रामसजीवन के दो वर्षीय बेटे प्रतीक को भी इंसेफेलाइटिस हो गया। मेडिकल कॉलेज में इलाज के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन रामसजीवन उसे लेकर अब भी डरे हुए हैं। बताया कि रितीश को भी इसी तरह एक बार डिस्चार्ज कर दिया गया था, लेकिन कुछ ही रोज बाद उसे दोबारा इंसेफेलाइटिस का अटैक आया। इसके बाद वह शरीर और दिमाग दोनों से दिव्यांग हो गया।
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गांववालों ने कराया पत्नी का इलाज
रामसजीवन के परिवार की माली हालत काफी खराब है। तीन में से दो बेटे बीमार हैं। इस बीच पत्नी प्रेमलता को एक आंख से दिखना बंद हो गया। गांववालों ने मदद की और चंदा लगाकर प्रेमलता की आंख का ऑपरेशन कराया।
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गोरखनाथ इलाके के रामपुर नया गांव निवासी रामसजीवन भारती मजदूरी छोड़कर मंगलवार को सीएमओ कार्यालय आए थे। पिछले तीन वर्षों में 10 वर्षीय बेटे रितीश कुमार के हक के लिए न जाने कितनी बार इस गरीब की दिहाड़ी छूटी है। तीन वर्ष पहले बेटे को इंसेफेलाइटिस ने जकड़ा। रामसजीवन उसे बचाने के लिए मेडिकल कॉलेज ले गए। जान तो बच गई, लेकिन रितीश शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हो गया। हालत ऐसी कि वह शंका आने पर भी बता न सके। ऐसे में रामसजीवन को दिन-रात बेटे के भविष्य की चिंता सताती रहती है। अनपढ़ रामसजीवन तीन साल से बेटे को इंसेफेलाइटिस पीड़ित दिव्यांगों को दिया जाने वाला मुआवजा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। मंगलवार को उन्हें सीएमओ कार्यालय से एडी हेल्थ कार्यालय जाने को कह दिया गया। रोते हुए रामसजीवन ने कहा कि कभी मेडिकल कॉलेज से ब्लॉक कार्यालय तो कभी ब्लॉक कार्यालय से सीएमओ दफ्तर भेज दिया जाता है।
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छोटे बेटे की भी चिंता
इस वर्ष रामसजीवन के दो वर्षीय बेटे प्रतीक को भी इंसेफेलाइटिस हो गया। मेडिकल कॉलेज में इलाज के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन रामसजीवन उसे लेकर अब भी डरे हुए हैं। बताया कि रितीश को भी इसी तरह एक बार डिस्चार्ज कर दिया गया था, लेकिन कुछ ही रोज बाद उसे दोबारा इंसेफेलाइटिस का अटैक आया। इसके बाद वह शरीर और दिमाग दोनों से दिव्यांग हो गया।
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गांववालों ने कराया पत्नी का इलाज
रामसजीवन के परिवार की माली हालत काफी खराब है। तीन में से दो बेटे बीमार हैं। इस बीच पत्नी प्रेमलता को एक आंख से दिखना बंद हो गया। गांववालों ने मदद की और चंदा लगाकर प्रेमलता की आंख का ऑपरेशन कराया।