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अधूरे ‘सपने’ के साथ खत्म होने जा रहा नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल
Updated Sat, 29 Jul 2017 01:38 AM IST
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गोरखपुर।
आठ अगस्त को नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। पांच साल के दौरान नगर निगम बोर्ड के सभी सदस्यों ने शहर को खूबसूरत बनाने, लोगों को सुविधाजनक लाइफ देने के लिए ढेरों फैसले लिए, लेकिन इनमें से अधिकांश कागजी साबित हुए। शहर के लोगों को शुभचिंतक बताने वाले अधिकांश पार्षद, मेयर की अध्यक्षता में आयोजित बैठकों में बस हंगामा मचाने में मशगूल रहे। मेयर डॉ. सत्या पांडेय के पांच साल के दौरान शहर में कोई भी ऐसा काम नहीं हो सका है, जिनको लेकर नगर निगम बोर्ड अपनी पीठ थपथपा सकें।
पिछले साल नगर निगम का बजट तीन अरब के आंकड़े को पार कर गया। आय में बढ़ोतरी के साथ शहर को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाओं को नगर निगम बोर्ड बैठक में लिए गए, लेकिन पांच साल के दौरान चुने गए 70 और मनोनीत 10 पार्षदों के अलावा मेयर को इस मूर्तरूप दिलाने में कामयाबी हासिल नहीं हो सकी।
ये काम रह गए अधूरे
- शहर को पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराना
- जाम से निजात का कोई रास्ता ढूंढना
- राजघाट पर आधुनिक विद्युत शवदाह गृह का निर्माण
- शास्त्रीचौक से रेलवे स्टेशन तक हजरतगंज की तर्ज पर लाइटिंग की व्यवस्था
- नगर निगम सदन एवं पार्किंग निर्माण
- राप्तीनगर और मोहद्दीपुर क्षेत्र में नगर निगम जोनल कार्यालय का निर्माण
- शहर में प्रवेश मार्गों व वार्डों के प्रवेश द्वार बनाने का निर्णय
- शहीद पार्क के नीचे अंडर पार्किंग का निर्माण
- राजघाट पर शहीद स्तूप का निर्माण
- अग्रसेन तिराहा से विजय चौक तक मार्ग चौड़ीकरण
- रिलायंस कंपनी द्वारा चार पार्कों का सौंदर्यीकरण
- नगर निगम लाइब्रेरी का डिजिटाइजेशन
- सुभाष चंद्र बोस नगर में मिनी स्टेडियम
- शहर के बाहर पशुबाड़ा का निर्माण।
- सांड़ के हमले में मृतकों के परिजनों को और घायलों को मुआवजा
- नगर निगम स्थित पोखरे में लाइट एंड साउंड सिस्टम युक्त करना
उपलब्धियां गिनाने को कुछ खास नहीं
नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल मिलाजुला ही रहा। अपेक्षाएं तो काफी थीं। नगर निगम के सीमित संसाधनों से जितना संभव हो सका, उसे करने का प्रयास किया गया। सड़कें, नालियां ही बनाई जा सकीं। जाम से निजात का कोई हल नहीं ढूंढा जा सका। पार्किंग व्यवस्था, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, सीवर सिस्टम, पशुबाड़ा समेत कई महत्वपूर्ण निर्णय मूर्त रूप नहीं ले सकें। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि पांच साल के कार्यकाल के दौरान कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे गिनाई जा सके।
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- संजय सिंह, सपा पार्षद दल के नेता
संतोषजनक रहा निगम बोर्ड का कार्यकाल
शहर की बेहतरी के लिए लगातार प्रयास किया गया। प्रदेश में सपा की सरकार रहने की वजह से केंद्र की योजनाओं को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। इसके बावजूद शहर के सड़कों के चौड़ीकरण, चौराहों के सौंदर्यीकरण, रिलायंस के सहयोग से पार्कों का सौंदर्यीकरण, शवदाह गृह का काम शुरू कराने समेत अन्य कई ऐसे काम कराए गए जो शहर को स्वच्छ और सुुंदर बनाने में सहायक रहे हैं। हां कुछ चीजें नहीं हो सकी हैं, लेकिन यह प्रदेश की सपा सरकार के सहयोग नहीं मिलने की वजह से हुआ है। अब योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सारी योजनाएं पूरी होने की संभावना है।
- डॉ. सत्या पांडेय, मेयर
नाटकीय रहा मनु जायसवाल का उपसभापति चुना जाना
सपा खेमे के पार्षद गिरिजेश पाल ‘मंदिर’ का आशीर्वाद पाकर भाजपा की ओर से उपसभापति के प्रत्याशी बनाए गए, लेकिन सपा ने ऐसा दांव लगाया कि गिरिजेश पाल चारों खाने चित्त हो गए। सपा ने भाजपा के मनु जायसवाल को अपने पाले में लाकर उपसभापति का प्रत्याशी बनाया और जीत दिला दी। वहीं मनु जायसवाल के दो साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद भी बोर्ड बैठक नहीं होने से ‘अवैध’ ढंग उपसभापति बने हुए हैं। अब भी उनके नाम की पट्टिका उपसभापति के कक्ष में लटकी हुई है।
कुछ कड़वी यादें भी रहीं
इस कार्यकाल के साथ कई कड़वी यादें भी जुड़ी रहेंगी। बोर्ड बैठक के दौरान महिला पार्षदों की मौजूदगी में पार्षद विजेंद्र अग्रहरि शर्ट उतार सदन में बैठ गए और काफी देर तक हंगामा करते रहे। इससे असहज होकर कई महिला पार्षद सदन छोड़कर चली गईं। पार्षद मंतालाल यादव ने बोर्ड बैठक के दौरान तत्कालीन मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी पर चप्पल चला दी। यहीं नहीं, नगर निगम के चीफ इंजीनियरिंग को थप्पड़ जड़ दिए गए। इसे लेकर कुछ दिन हंगामा चला और फिर मामला ठंडा पड़ गया।
आठ अगस्त को नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। पांच साल के दौरान नगर निगम बोर्ड के सभी सदस्यों ने शहर को खूबसूरत बनाने, लोगों को सुविधाजनक लाइफ देने के लिए ढेरों फैसले लिए, लेकिन इनमें से अधिकांश कागजी साबित हुए। शहर के लोगों को शुभचिंतक बताने वाले अधिकांश पार्षद, मेयर की अध्यक्षता में आयोजित बैठकों में बस हंगामा मचाने में मशगूल रहे। मेयर डॉ. सत्या पांडेय के पांच साल के दौरान शहर में कोई भी ऐसा काम नहीं हो सका है, जिनको लेकर नगर निगम बोर्ड अपनी पीठ थपथपा सकें।
पिछले साल नगर निगम का बजट तीन अरब के आंकड़े को पार कर गया। आय में बढ़ोतरी के साथ शहर को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाओं को नगर निगम बोर्ड बैठक में लिए गए, लेकिन पांच साल के दौरान चुने गए 70 और मनोनीत 10 पार्षदों के अलावा मेयर को इस मूर्तरूप दिलाने में कामयाबी हासिल नहीं हो सकी।
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ये काम रह गए अधूरे
- शहर को पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराना
- जाम से निजात का कोई रास्ता ढूंढना
- राजघाट पर आधुनिक विद्युत शवदाह गृह का निर्माण
- शास्त्रीचौक से रेलवे स्टेशन तक हजरतगंज की तर्ज पर लाइटिंग की व्यवस्था
- नगर निगम सदन एवं पार्किंग निर्माण
- राप्तीनगर और मोहद्दीपुर क्षेत्र में नगर निगम जोनल कार्यालय का निर्माण
- शहर में प्रवेश मार्गों व वार्डों के प्रवेश द्वार बनाने का निर्णय
- शहीद पार्क के नीचे अंडर पार्किंग का निर्माण
- राजघाट पर शहीद स्तूप का निर्माण
- अग्रसेन तिराहा से विजय चौक तक मार्ग चौड़ीकरण
- रिलायंस कंपनी द्वारा चार पार्कों का सौंदर्यीकरण
- नगर निगम लाइब्रेरी का डिजिटाइजेशन
- सुभाष चंद्र बोस नगर में मिनी स्टेडियम
- शहर के बाहर पशुबाड़ा का निर्माण।
- सांड़ के हमले में मृतकों के परिजनों को और घायलों को मुआवजा
- नगर निगम स्थित पोखरे में लाइट एंड साउंड सिस्टम युक्त करना
उपलब्धियां गिनाने को कुछ खास नहीं
नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल मिलाजुला ही रहा। अपेक्षाएं तो काफी थीं। नगर निगम के सीमित संसाधनों से जितना संभव हो सका, उसे करने का प्रयास किया गया। सड़कें, नालियां ही बनाई जा सकीं। जाम से निजात का कोई हल नहीं ढूंढा जा सका। पार्किंग व्यवस्था, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, सीवर सिस्टम, पशुबाड़ा समेत कई महत्वपूर्ण निर्णय मूर्त रूप नहीं ले सकें। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि पांच साल के कार्यकाल के दौरान कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे गिनाई जा सके।
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- संजय सिंह, सपा पार्षद दल के नेता
संतोषजनक रहा निगम बोर्ड का कार्यकाल
शहर की बेहतरी के लिए लगातार प्रयास किया गया। प्रदेश में सपा की सरकार रहने की वजह से केंद्र की योजनाओं को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। इसके बावजूद शहर के सड़कों के चौड़ीकरण, चौराहों के सौंदर्यीकरण, रिलायंस के सहयोग से पार्कों का सौंदर्यीकरण, शवदाह गृह का काम शुरू कराने समेत अन्य कई ऐसे काम कराए गए जो शहर को स्वच्छ और सुुंदर बनाने में सहायक रहे हैं। हां कुछ चीजें नहीं हो सकी हैं, लेकिन यह प्रदेश की सपा सरकार के सहयोग नहीं मिलने की वजह से हुआ है। अब योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सारी योजनाएं पूरी होने की संभावना है।
- डॉ. सत्या पांडेय, मेयर
नाटकीय रहा मनु जायसवाल का उपसभापति चुना जाना
सपा खेमे के पार्षद गिरिजेश पाल ‘मंदिर’ का आशीर्वाद पाकर भाजपा की ओर से उपसभापति के प्रत्याशी बनाए गए, लेकिन सपा ने ऐसा दांव लगाया कि गिरिजेश पाल चारों खाने चित्त हो गए। सपा ने भाजपा के मनु जायसवाल को अपने पाले में लाकर उपसभापति का प्रत्याशी बनाया और जीत दिला दी। वहीं मनु जायसवाल के दो साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद भी बोर्ड बैठक नहीं होने से ‘अवैध’ ढंग उपसभापति बने हुए हैं। अब भी उनके नाम की पट्टिका उपसभापति के कक्ष में लटकी हुई है।
कुछ कड़वी यादें भी रहीं
इस कार्यकाल के साथ कई कड़वी यादें भी जुड़ी रहेंगी। बोर्ड बैठक के दौरान महिला पार्षदों की मौजूदगी में पार्षद विजेंद्र अग्रहरि शर्ट उतार सदन में बैठ गए और काफी देर तक हंगामा करते रहे। इससे असहज होकर कई महिला पार्षद सदन छोड़कर चली गईं। पार्षद मंतालाल यादव ने बोर्ड बैठक के दौरान तत्कालीन मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी पर चप्पल चला दी। यहीं नहीं, नगर निगम के चीफ इंजीनियरिंग को थप्पड़ जड़ दिए गए। इसे लेकर कुछ दिन हंगामा चला और फिर मामला ठंडा पड़ गया।