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सावन माह का पहला सोमवार आज, सजे मंदिर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sun, 09 Jul 2017 09:27 PM IST
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मुक्तेश्वर नाथ शिव मंदिर में पूजा करते श्रद्धालु।
- फोटो : Amar Ujala
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सावन सोमवार से शुरू होगा। इसके मद्देनजर शिव मंदिरों में रविवार को देर रात तक साफ-सफाई और सजावट का काम चलता रहा। मंदिरों के आसपास माला-फूल और प्रसाद की दुकानें लग गई थीं। श्रद्धालु सुगमता से दर्शन और जलाभिषेक कर सकें, इसके लिए बैरिकेडिंग भी कर दी गई है। मंदिर के आसपास महिला पुलिस की भी तैनाती की जाएगी।
बाबा मुक्तेश्वर नाथ और महादेव झारखंडी मंदिर में जुटने वाली भीड़ को देखते हुए रविवार को ही मंदिर के आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई। है। यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। दूसरी तरफ मंदिरों में भक्तों की ओर से शिव भजन, कीर्तन वगैरह की भी तैयारी चलती रही। मोहद्दीपुर स्थित शिवाला नगर सिद्धपीठ मंदिर, बेतियाहाता श्री महाकाली मंदिर और अन्य मंदिरों में जहां भी शिवलिंग हैं, वहां साफ-सफाई का काम रविवार की देर रात तक चलता रहा। आसपास बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल-माला और गंगाजल की भी दुकानें सज गई थीं। खासकर महादेव झारखंडी के आसपास रविवार को ही मेले जैसा माहौल दिखने लगा। फूल-माला और शृंगार सामग्री की अस्थाई दुकानें सज गई थीं। खानपान,, खिलौने और घरेलू सामान की दुकानों के स्टॉल लग रहे थे।
चार सौ साल पुराना है महादेव झारखंडी मंदिर
महादेव झारखंडी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि 400 वर्ष पहले झारखंडी में एक सूखा वृक्ष था। यहां एक लकड़हारा भी रहता था। एक बार जब वह वृक्ष काट रहा था तो उसकी कुल्हाड़ी वृक्ष से सटे से शिवलिंग पर जा लगी और वहां से रक्त बहने लगा। जब इसकी चर्चा क्षेत्र में फैली तो लोग देखने के लिए इकट्ठा हुए। इसके बाद लोगों ने महसूस किया कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसी के बाद लोगों ने यहां पूजा अर्चना शुरू कर दी। लगातार जल और दूध से अभिषेक करने पर रक्त बहना बंद हुआ। उस दिन से झारखंडी को महादेव झारखंडी मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
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तड़के ही शुरू हो जाएगा जलाभिषेक
शहर के मंदिरों में सोमवार को तड़के जलाभिषेक शुरू हो जाएगा। झारखंडी शिव मंदिर में 25-30 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। दूर-दराज से भी लोग यहां जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।
- अयोध्या मिश्रा, अध्यक्ष शिव सेवा समिति, महादेव झारखंडी
संत ने की मुक्तेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना
गोरखपुर। वर्षों पहले महाराष्ट्र के एक संत ने ट्रांसपोर्ट नगर स्थित मंदिर स्थल पर बाबा मुक्तेश्वर नाथ की मूर्ति और भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित किया था। तब से लेकर अब तक पुजारी की चौथी पीढ़ी मंदिर में सेवा करती आ रही है। पुजारी कृष्ण पांडेय के अनुसार मंदिर के स्थापना काल से लोग यहां भगवान शिव को जलाभिषेक करने आ रहे हैं। अब तो दूर-दराज से भी भक्त यहां पहुंचने लगे हैं।
भजन-कीर्तन से गूंजेगा मंदिर
सुबह चार जलाभिषेक शुरू होगा। एक घंटे बाद आरती-पूजन के साथ ही भजन कीर्तन शुरू हो जाएगा। शाम को फिर आरती-पूजन होगा। यहां भी हजारों भक्तों का जमावड़ा होता है। भक्त आसानी से जलाभिषेक कर सकें, इसके लिए कतारें लगवाई जाएंगी।
- रामकृष्ण पांडेय, पुजारी, बाबा मुक्तेश्वर नाथ मंदिर
सावन माह का महत्व
मान्यताओं के मुताबिक जब समुद्र मंथन हो रहा था तब भगवान शिव ने विष का पान किया था। इसके बाद उनके शरीर में जलन होने लगी और उनका स्वभाव अशांत हो गया। उन्हें शांत करनेे के लिए सभी देवी-देवताओं ने गंगाजल, दूध, शहद, बेल पत्र, फूल-पत्तियों से उनका जलाभिषेक किया तब जाकर वह शांत हुए। इसी सावन माह में ही माता पार्वती ने विशेष पूजा अर्चना कर शिव को पाया था।
रुद्राभिषेक के लिए अलग-अलग विधियां
सावन में अलग-अलग कामनाओं के लिए रुद्राभिषेक की अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। मान्यता के मुताबिक संतान सुख के लिए दूध एवं घी से, धन और विद्या के लिए गाय के दूध और शक्कर से, शत्रु परायज के लिए सरसों के तेल से, रोग से मुक्ति के लिए गंगाजल में कुश डालकर, आकर्षण और सम्मोहन के लिए शहद से अभिषेक करना फलदायक बताया गया है।
विवाह से जुड़ी अड़चनें दूर होंगी
ऐसा भी मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत रखने से कन्याओं के विवाह की अड़चनें दूर होती हैं। उन्हें इच्छानुसार वर मिलता है। इसके लिए दूध, दही, शहद, गंगाजल आदि से रुद्राभिषेक करना उत्तम बताया गया है। भगवान शिव बेलपत्र, भांग, धतूरा, मदार और बेर से प्रसन्न होते हैं।
26 वर्ष बाद मिले पांच सोमवार
सोमवार से सावन के शुरू होने और इसी दिन समापन को शुभ माना जा रहा है। यह योग 26 वर्ष बाद आया है। सावन शिव को अतिप्रिय है। प्रथम सोमवार 10 जुलाई को है, जबकि अंतिम एवं पंचम सोमवार सात अगस्त को। इसी दिन रक्षाबंधन भी है। ऐसी मान्यता है कि सावन में शिव को जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के बराबर फल मिलता है।
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बाबा मुक्तेश्वर नाथ और महादेव झारखंडी मंदिर में जुटने वाली भीड़ को देखते हुए रविवार को ही मंदिर के आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई। है। यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। दूसरी तरफ मंदिरों में भक्तों की ओर से शिव भजन, कीर्तन वगैरह की भी तैयारी चलती रही। मोहद्दीपुर स्थित शिवाला नगर सिद्धपीठ मंदिर, बेतियाहाता श्री महाकाली मंदिर और अन्य मंदिरों में जहां भी शिवलिंग हैं, वहां साफ-सफाई का काम रविवार की देर रात तक चलता रहा। आसपास बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल-माला और गंगाजल की भी दुकानें सज गई थीं। खासकर महादेव झारखंडी के आसपास रविवार को ही मेले जैसा माहौल दिखने लगा। फूल-माला और शृंगार सामग्री की अस्थाई दुकानें सज गई थीं। खानपान,, खिलौने और घरेलू सामान की दुकानों के स्टॉल लग रहे थे।
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चार सौ साल पुराना है महादेव झारखंडी मंदिर
महादेव झारखंडी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि 400 वर्ष पहले झारखंडी में एक सूखा वृक्ष था। यहां एक लकड़हारा भी रहता था। एक बार जब वह वृक्ष काट रहा था तो उसकी कुल्हाड़ी वृक्ष से सटे से शिवलिंग पर जा लगी और वहां से रक्त बहने लगा। जब इसकी चर्चा क्षेत्र में फैली तो लोग देखने के लिए इकट्ठा हुए। इसके बाद लोगों ने महसूस किया कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसी के बाद लोगों ने यहां पूजा अर्चना शुरू कर दी। लगातार जल और दूध से अभिषेक करने पर रक्त बहना बंद हुआ। उस दिन से झारखंडी को महादेव झारखंडी मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
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तड़के ही शुरू हो जाएगा जलाभिषेक
शहर के मंदिरों में सोमवार को तड़के जलाभिषेक शुरू हो जाएगा। झारखंडी शिव मंदिर में 25-30 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। दूर-दराज से भी लोग यहां जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।
- अयोध्या मिश्रा, अध्यक्ष शिव सेवा समिति, महादेव झारखंडी
संत ने की मुक्तेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना
गोरखपुर। वर्षों पहले महाराष्ट्र के एक संत ने ट्रांसपोर्ट नगर स्थित मंदिर स्थल पर बाबा मुक्तेश्वर नाथ की मूर्ति और भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित किया था। तब से लेकर अब तक पुजारी की चौथी पीढ़ी मंदिर में सेवा करती आ रही है। पुजारी कृष्ण पांडेय के अनुसार मंदिर के स्थापना काल से लोग यहां भगवान शिव को जलाभिषेक करने आ रहे हैं। अब तो दूर-दराज से भी भक्त यहां पहुंचने लगे हैं।
भजन-कीर्तन से गूंजेगा मंदिर
सुबह चार जलाभिषेक शुरू होगा। एक घंटे बाद आरती-पूजन के साथ ही भजन कीर्तन शुरू हो जाएगा। शाम को फिर आरती-पूजन होगा। यहां भी हजारों भक्तों का जमावड़ा होता है। भक्त आसानी से जलाभिषेक कर सकें, इसके लिए कतारें लगवाई जाएंगी।
- रामकृष्ण पांडेय, पुजारी, बाबा मुक्तेश्वर नाथ मंदिर
सावन माह का महत्व
मान्यताओं के मुताबिक जब समुद्र मंथन हो रहा था तब भगवान शिव ने विष का पान किया था। इसके बाद उनके शरीर में जलन होने लगी और उनका स्वभाव अशांत हो गया। उन्हें शांत करनेे के लिए सभी देवी-देवताओं ने गंगाजल, दूध, शहद, बेल पत्र, फूल-पत्तियों से उनका जलाभिषेक किया तब जाकर वह शांत हुए। इसी सावन माह में ही माता पार्वती ने विशेष पूजा अर्चना कर शिव को पाया था।
रुद्राभिषेक के लिए अलग-अलग विधियां
सावन में अलग-अलग कामनाओं के लिए रुद्राभिषेक की अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। मान्यता के मुताबिक संतान सुख के लिए दूध एवं घी से, धन और विद्या के लिए गाय के दूध और शक्कर से, शत्रु परायज के लिए सरसों के तेल से, रोग से मुक्ति के लिए गंगाजल में कुश डालकर, आकर्षण और सम्मोहन के लिए शहद से अभिषेक करना फलदायक बताया गया है।
विवाह से जुड़ी अड़चनें दूर होंगी
ऐसा भी मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत रखने से कन्याओं के विवाह की अड़चनें दूर होती हैं। उन्हें इच्छानुसार वर मिलता है। इसके लिए दूध, दही, शहद, गंगाजल आदि से रुद्राभिषेक करना उत्तम बताया गया है। भगवान शिव बेलपत्र, भांग, धतूरा, मदार और बेर से प्रसन्न होते हैं।
26 वर्ष बाद मिले पांच सोमवार
सोमवार से सावन के शुरू होने और इसी दिन समापन को शुभ माना जा रहा है। यह योग 26 वर्ष बाद आया है। सावन शिव को अतिप्रिय है। प्रथम सोमवार 10 जुलाई को है, जबकि अंतिम एवं पंचम सोमवार सात अगस्त को। इसी दिन रक्षाबंधन भी है। ऐसी मान्यता है कि सावन में शिव को जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के बराबर फल मिलता है।