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लोकरंग की खबर
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लोकरंग के बहाने विसंगतियों पर प्रहार
इंद्रधनुषी रंगों से किसान, स्त्री तो कहीं मेट्रो शहर पर विमर्श
गाजीपुर के कलाकारों ने मानवीय मूल्यों को किया चित्रित
सुनील कुमार सुमन
तुर्कपट्टी(कुशीनगर)। चित्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी वर्तमान का आईना होते हैं। इनकी कलम, इनके रंग, इनका अभिनय वर्तमान की कहानी बयां करता है। इसे ही परिभाषित कर रहा है जोगिया जनुबीपट्टी का लोकरंग-2019। वर्तमान परिवेश में स्त्री और किसान की दशा, संसद, मेट्रो शहर जैसे भित्ति चित्र कहीं न कहीं खुद से ढेरों सवाल पूछने पर विवश कर रहे हैं।
कार्यक्रम स्थल पर बनें विशाल रंगमंच पर सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरुद्ध जनसंस्कृति के संवर्धन की बात तो की गई है, लेकिन गिरमिटिया मजदूरों के पुरबिया संबंध के बहाने आज तेज रफ्तार जिंदगी के पीछे छूट रहे मानवीय मूल्यों को संभावना कला गाजीपुर के कलाकारों ने उजागर कर दिया है। मंच के चारों तरफ दीवारों पर विविध रंगों से झांकती तस्वीरें कार्यक्रम की संवेदनशीलता को बयां कर रही हैं। भारतीयों की लाइफ लाइन कही जाने वाली देश की कृषि व्यवस्था और उससे जुड़े किसानों की परेशानियों का चित्र चित्रकार चंदन की कूूंची से निकला है। देश की आधी आबादी के अधिकार की बात आज भले ही संसद से सड़क तक, घरों से सामाजिक मंचों तक हो रहा है, लेकिन सपना सिंह के चित्र विवाह के बाद मुठ्ठी भर लोगों तक स्त्री अधिकार सिमट जाने पर आक्रोश जाहिर करते हैं। मीडिया जगत द्वारा आम लोगों से बेरुखी को भी लोकरंग का विषय बनाया गया है। रवि चौहान की यह समसामयिक कला कहीं न कहीं अभिजात्य वर्ग द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को प्रभावित करने का आरोप लगाती दिख रही है। देश की संसद पर आठ पैरों वाले ऑक्टोपस का चित्र खींच कर कृष्णा पासवान ने एक नए समसामयिक बहस को जन्म देने का प्रयास किया है। कूड़े के ढेर पर बसाई जा रही मेट्रो सिटी में मानवीय मूल्यों को कितना स्थान मिल पाता है। इस तथ्य को भी कलाकारों ने स्थान दिया है। लोकरंग-2019 कहीं न कहीं देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की बात करते-करते समाज के वर्तमान हालात पर चिंता जाहिर करते हुए एक नई बहस की बुनियाद खड़ा कर रहा है, जो कहीं न कहीं प्रासंगिक भी है।
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इंद्रधनुषी रंगों से किसान, स्त्री तो कहीं मेट्रो शहर पर विमर्श
गाजीपुर के कलाकारों ने मानवीय मूल्यों को किया चित्रित
सुनील कुमार सुमन
तुर्कपट्टी(कुशीनगर)। चित्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी वर्तमान का आईना होते हैं। इनकी कलम, इनके रंग, इनका अभिनय वर्तमान की कहानी बयां करता है। इसे ही परिभाषित कर रहा है जोगिया जनुबीपट्टी का लोकरंग-2019। वर्तमान परिवेश में स्त्री और किसान की दशा, संसद, मेट्रो शहर जैसे भित्ति चित्र कहीं न कहीं खुद से ढेरों सवाल पूछने पर विवश कर रहे हैं।
कार्यक्रम स्थल पर बनें विशाल रंगमंच पर सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरुद्ध जनसंस्कृति के संवर्धन की बात तो की गई है, लेकिन गिरमिटिया मजदूरों के पुरबिया संबंध के बहाने आज तेज रफ्तार जिंदगी के पीछे छूट रहे मानवीय मूल्यों को संभावना कला गाजीपुर के कलाकारों ने उजागर कर दिया है। मंच के चारों तरफ दीवारों पर विविध रंगों से झांकती तस्वीरें कार्यक्रम की संवेदनशीलता को बयां कर रही हैं। भारतीयों की लाइफ लाइन कही जाने वाली देश की कृषि व्यवस्था और उससे जुड़े किसानों की परेशानियों का चित्र चित्रकार चंदन की कूूंची से निकला है। देश की आधी आबादी के अधिकार की बात आज भले ही संसद से सड़क तक, घरों से सामाजिक मंचों तक हो रहा है, लेकिन सपना सिंह के चित्र विवाह के बाद मुठ्ठी भर लोगों तक स्त्री अधिकार सिमट जाने पर आक्रोश जाहिर करते हैं। मीडिया जगत द्वारा आम लोगों से बेरुखी को भी लोकरंग का विषय बनाया गया है। रवि चौहान की यह समसामयिक कला कहीं न कहीं अभिजात्य वर्ग द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को प्रभावित करने का आरोप लगाती दिख रही है। देश की संसद पर आठ पैरों वाले ऑक्टोपस का चित्र खींच कर कृष्णा पासवान ने एक नए समसामयिक बहस को जन्म देने का प्रयास किया है। कूड़े के ढेर पर बसाई जा रही मेट्रो सिटी में मानवीय मूल्यों को कितना स्थान मिल पाता है। इस तथ्य को भी कलाकारों ने स्थान दिया है। लोकरंग-2019 कहीं न कहीं देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की बात करते-करते समाज के वर्तमान हालात पर चिंता जाहिर करते हुए एक नई बहस की बुनियाद खड़ा कर रहा है, जो कहीं न कहीं प्रासंगिक भी है।
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