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मुन्नू मियां की मेहनत से जलेगा बुराई का रावण

Thu, 21 Sep 2017 01:39 AM IST
Updated Thu, 21 Sep 2017 01:39 AM IST
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मुन्नू मियां की मेहनत से जलेगा बुराई का रावण

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आशुतोष मिश्र/गोरखपुर।
‘भजन गाने कभी मंदिर में जब रसखान आते हैं, मंजर देखने ऐसे वहां भगवान आते हैं। फिरकापरस्ती उस गांव को छू नहीं सकती, बनाने राम की मूरत जहां रहमान आते हैं।’ कुशीनगर के शायर राजेश राही की ये लाइनें बेनीगंज के मुन्नू मियां पर खूब फबती हैं। अंतर बस इतना कि ये राम की मूरत बनाते नहीं बल्कि उसे सजाते हैं। बचपन से अपनी कला के जरिए शहर को भाईचारे का पाठ पढ़ाने वाले मुन्नू पेंटर की मेहनत दशहरे में भी कौमी एकता के रंग भरने जा रही है। मुन्नू मियां अपने परिवार के साथ पूरी शिद्दत से रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं।
घंटाघर, अलीनगर और धर्मशाला बाजार में इनकी कलाकारी त्योहार को उल्लास से सराबोर करने के साथ इसका असली संदेश देगी। बता दें विजय पर्व बुराई के प्रतीक इन पुतलों के दहन के बिना अधूरा माना जाता है। मुन्नू मियां की कला में जैसी सफाई है वैसी ही उनकी शख्सियत भी है। साफगोई से बताते हैं कि बचपन से यह काम करते आए हैं। इसमें बेटों के साथ पूरा परिवार हाथ बंटाता है। हम जात-पात नहीं देखते। परिवार और रिश्तेदारों में कभी किसी ने इस पर ऐतराज भी नहीं किया। रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले ही नहीं रामलीला के लिए लंका भी दशकों से बनाते आए हैं। मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को रंग देने के लिए भी अक्सर बुलावा आता रहता है। गीताप्रेस से लेकर गोरखनाथ मंदिर तक की मूर्तियों को रंग चुका हूं।
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ताजिया परिवार बनाता है पर पुतला सिर्फ मुन्नू मियां
कलाकारी मुन्नू मियां के परिवार का पुश्तैनी पेशा है। बेटे एहसानुल्लाह, आसिफ, शाजिद, अफजल और आरिफ भी मुन्नू मियां के साथ इस पेशे में हाथ बंटाते हैं। ये सभी इन दिनों ताजिये बनाने में मशगूल हैं, लेकिन रावण के पुतले बनाने के हुनर में बस मुन्नू माहिर हैं।
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दादा जहूर के हुनर ने दिया था इलाके को नाम
आरिफ अपने पिता के दादा जहूर का नाम फक्र से लेते हैं। कहने लगते हैं कि वह मशहूर कलाकार थे। उन्हें गुड़िया बनाने के लिए जाना जाता था। उनकी बनाई गई गुड़ियों के बाल काफी आकर्षक होते थे। बेनी (स्त्रियों की चोटी) वाली इस गुड़िया के चलते ही इलाके का नाम बेनीगंज पड़ा था।
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