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सैनिकों ने डटकर किया मुकाबला
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 25 Jul 2015 11:40 PM IST
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कश्मीर के कारगिल का टाइगर हिल्स गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज रहा था। रह-रहकर पाक सेना बम बरसा रही थी। बम कभी हिल्स पर तो कभी जवानों की लाइन (बंकर) पर गिर रहे थे। बम और गोलियों से बचते हुए पाक सेना के मुंहतोड़ जवाब में कारगिल के जवान भी फायरिंग कर रहे थे।
टाइगिर हिल्स पर युद्ध के पहले दिन 16 सैनिकों में से 13 जवान शहीद हो गए। दूसरी फौज पहुंचने से पहले सिर्फ तीन जवान लड़ रहे थे। ऐसा मंजर भी सेना के जवानों को नहीं डिगा सका। वे देश पर मर मिटने का जज्बा लिए लड़ते रहे। मगर जवानों के शहीद होने का मंजर याद कर लोग आज भी सिहर उठते हैं।
शहर के आनंदधाम निकट दीवानी चौराहा सिविल लाइंस के रहने वाले पूर्व सैनिक विजय सिंह का जन्म 3 मई 1970 में उनके पैतृक गांव थाना उमरीबेगमगंज क्षेत्र के ऐली परसौली में हुआ था। 17 साल की उम्र में ही सेना में जाने के जज्बे ने आखिरकार वर्ष 1988 में थल सेना में पहुंचा दिया।
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वह लखनऊ में थल सेना में भर्ती हुए। विजय सिंह को प्रशिक्षण के लिए मध्य प्रदेश के जबलपुर भेज दिया गया। ट्रेनिंग के दौरान उनमें दुश्मनों से लड़ने का जज्बा था। वह कारगिल युद्ध में काम आया। 16 ग्रेनेडियर अल्फा कंपनी के जवान विजय सिंह शुरुआती दौर में देहरादून व पुंछ में तैनात रहे।
इसके बाद राजौरी सेक्टर, जयपुर, बारामूला और 1999 में कारगिल में तैनात हुए। विजय बताते हैं कि इसी दौरान पाक सेना ने कारगिल में बम बरसाना शुरू कर दिया। कारगिल युद्ध के दौरान विजय 5100 टाइगिार हिल्स पर पाक सैनिकों की गोलियों का जवाब देते रहे।
पाक सेना यहां सैनिकों के बंकर पर बम बरसाती रही। इसी दौरान 18 जुलाई 1999 में फर्स्ट लाइट (गोधूलि के समय) टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लड़ते समय विजय सिंह पाक सैनिकों की गोली लगने से गिर पड़े। साथी जवान अमर बहादुर सिंह निवासी इलाहाबाद ने विजय और खुद के बैग को जोड़कर स्ट्रेचर तैयार किया और विजय को हेलीपैड तक लाया गया।
जहां से उन्हें श्रीनगर के बेस हॉस्पिटल भेज दिया गया। इसी दौरान अमर बहादुर सिंह शहीद हो गए। विजय बताते हैं कि कारगिल में टाइगर हिल्स पर पहले अटैक में 16 जवान दुश्मनों से लड़ रहे थे, जिसमें तीन जवानों को छोड़कर सभी शहीद हो गए।
नगर कोतवाली क्षेत्र के परेड सरकार नेवलगंज के रहने वाले पूर्व सैनिक जगन्नाथ बख्श यादव 18 अक्तूबर 1985 को थल सेना में बतौर सैनिक भर्ती हुए थे। जगन्नाथ के मुताबिक वह राजस्थान के सूरतगढ़, बाधा बार्डर बाड़मेर, जम्मू के उधमुपर, डोडा, किस्तवाड़ व सिकंदराबाद में तैनात रहे।
जगन्नाथ ने बताया कि बार्डर पर तैनाती के दौरान पाक सेना के जवानों ने कई बार गोलियां व बम बरसाए। जवाब में उनके रेजीमेेंट के जवानों को भी गोलियां चलानीं पड़ीं, मगर फायरिंग के दौरान कोई शहीद नहीं हुआ।
शहर के साहबगंज मोहल्ले के रहने वाले पूर्व सैनिक शशिकांत पांडेय मार्च वर्ष 1982 में सेना में हवलदार के पद पर भर्ती हुए थे। शशिकांत ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद वह नागालैंड के जखामा, रुड़की, जम्मू के उधमपुर, पंजाब के पटियाला, पश्चिम बंगाल के न्यूजलपाईगुड़ी, श्रीनगर के तलवाड़ा में तैनात रहे।
शशिकांत बताते हैं कि उधमुपर, तलवाड़ा में कई बार पाक सैनिकों ने फायरिंग की। जवाब में यहां से भी फायरिंग करनी पड़ी, मगर दुश्मनों को सीमा में घुसने नहीं दिया गया।
छपिया थाना क्षेत्र के नगरा बुजुर्ग गांव के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित गया प्रसाद पांडेय ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए वर्ष 1941 में सत्याग्रह किया था।
वर्ष 1942 में उन्होंने 80 फीट का कांग्रेसी झंडा लगाकर अंग्रेजों देश छोड़ो हिंदुतान हमारा है का नारा दिया। इस बीच छपिया के थानेदार ने उन्हें पीटा और जेल भेज दिया। अंग्रेजों से लड़ते वह कई बार जेल गए।
कौड़िया थाना क्षेत्र के बिछुड़ी गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामअशीष मिश्र ने वर्ष 1940 में बहराइच जनपद के गंगवल बाजार में अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह किया था। इस दौरान अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर 9 माह की सजा सुना दी।
रामअशीष बताते हैं कि जब वह सजा काटकर जेल से निकले तो बहराइच के चाकूजोज बाजार व कटका मरौठा में अंग्रेजों के खिलाफ सभा की। सभा के दौरान वह दोबारा गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें दो साल की सजा व 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। मगर जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने 1942 में रेल रोककर एक बार फिर अंग्रेजी हुकूमत को चैलेंज किया।
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टाइगिर हिल्स पर युद्ध के पहले दिन 16 सैनिकों में से 13 जवान शहीद हो गए। दूसरी फौज पहुंचने से पहले सिर्फ तीन जवान लड़ रहे थे। ऐसा मंजर भी सेना के जवानों को नहीं डिगा सका। वे देश पर मर मिटने का जज्बा लिए लड़ते रहे। मगर जवानों के शहीद होने का मंजर याद कर लोग आज भी सिहर उठते हैं।
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शहर के आनंदधाम निकट दीवानी चौराहा सिविल लाइंस के रहने वाले पूर्व सैनिक विजय सिंह का जन्म 3 मई 1970 में उनके पैतृक गांव थाना उमरीबेगमगंज क्षेत्र के ऐली परसौली में हुआ था। 17 साल की उम्र में ही सेना में जाने के जज्बे ने आखिरकार वर्ष 1988 में थल सेना में पहुंचा दिया।
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वह लखनऊ में थल सेना में भर्ती हुए। विजय सिंह को प्रशिक्षण के लिए मध्य प्रदेश के जबलपुर भेज दिया गया। ट्रेनिंग के दौरान उनमें दुश्मनों से लड़ने का जज्बा था। वह कारगिल युद्ध में काम आया। 16 ग्रेनेडियर अल्फा कंपनी के जवान विजय सिंह शुरुआती दौर में देहरादून व पुंछ में तैनात रहे।
इसके बाद राजौरी सेक्टर, जयपुर, बारामूला और 1999 में कारगिल में तैनात हुए। विजय बताते हैं कि इसी दौरान पाक सेना ने कारगिल में बम बरसाना शुरू कर दिया। कारगिल युद्ध के दौरान विजय 5100 टाइगिार हिल्स पर पाक सैनिकों की गोलियों का जवाब देते रहे।
पाक सेना यहां सैनिकों के बंकर पर बम बरसाती रही। इसी दौरान 18 जुलाई 1999 में फर्स्ट लाइट (गोधूलि के समय) टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लड़ते समय विजय सिंह पाक सैनिकों की गोली लगने से गिर पड़े। साथी जवान अमर बहादुर सिंह निवासी इलाहाबाद ने विजय और खुद के बैग को जोड़कर स्ट्रेचर तैयार किया और विजय को हेलीपैड तक लाया गया।
जहां से उन्हें श्रीनगर के बेस हॉस्पिटल भेज दिया गया। इसी दौरान अमर बहादुर सिंह शहीद हो गए। विजय बताते हैं कि कारगिल में टाइगर हिल्स पर पहले अटैक में 16 जवान दुश्मनों से लड़ रहे थे, जिसमें तीन जवानों को छोड़कर सभी शहीद हो गए।
नगर कोतवाली क्षेत्र के परेड सरकार नेवलगंज के रहने वाले पूर्व सैनिक जगन्नाथ बख्श यादव 18 अक्तूबर 1985 को थल सेना में बतौर सैनिक भर्ती हुए थे। जगन्नाथ के मुताबिक वह राजस्थान के सूरतगढ़, बाधा बार्डर बाड़मेर, जम्मू के उधमुपर, डोडा, किस्तवाड़ व सिकंदराबाद में तैनात रहे।
जगन्नाथ ने बताया कि बार्डर पर तैनाती के दौरान पाक सेना के जवानों ने कई बार गोलियां व बम बरसाए। जवाब में उनके रेजीमेेंट के जवानों को भी गोलियां चलानीं पड़ीं, मगर फायरिंग के दौरान कोई शहीद नहीं हुआ।
शहर के साहबगंज मोहल्ले के रहने वाले पूर्व सैनिक शशिकांत पांडेय मार्च वर्ष 1982 में सेना में हवलदार के पद पर भर्ती हुए थे। शशिकांत ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद वह नागालैंड के जखामा, रुड़की, जम्मू के उधमपुर, पंजाब के पटियाला, पश्चिम बंगाल के न्यूजलपाईगुड़ी, श्रीनगर के तलवाड़ा में तैनात रहे।
शशिकांत बताते हैं कि उधमुपर, तलवाड़ा में कई बार पाक सैनिकों ने फायरिंग की। जवाब में यहां से भी फायरिंग करनी पड़ी, मगर दुश्मनों को सीमा में घुसने नहीं दिया गया।
छपिया थाना क्षेत्र के नगरा बुजुर्ग गांव के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित गया प्रसाद पांडेय ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए वर्ष 1941 में सत्याग्रह किया था।
वर्ष 1942 में उन्होंने 80 फीट का कांग्रेसी झंडा लगाकर अंग्रेजों देश छोड़ो हिंदुतान हमारा है का नारा दिया। इस बीच छपिया के थानेदार ने उन्हें पीटा और जेल भेज दिया। अंग्रेजों से लड़ते वह कई बार जेल गए।
कौड़िया थाना क्षेत्र के बिछुड़ी गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामअशीष मिश्र ने वर्ष 1940 में बहराइच जनपद के गंगवल बाजार में अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह किया था। इस दौरान अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर 9 माह की सजा सुना दी।
रामअशीष बताते हैं कि जब वह सजा काटकर जेल से निकले तो बहराइच के चाकूजोज बाजार व कटका मरौठा में अंग्रेजों के खिलाफ सभा की। सभा के दौरान वह दोबारा गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें दो साल की सजा व 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। मगर जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने 1942 में रेल रोककर एक बार फिर अंग्रेजी हुकूमत को चैलेंज किया।